- 24 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी दीपावली
- व्यापारियों को होगा कई गुना लाभ
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: इस वर्ष विक्रम संवत 2079 में कार्तिक कृष्ण अमावस्या सोमवार 24 अक्टूबर को सायंकाल 5 बजकर 27 मिनट से आरंभ होकर अगले दिन 25 अक्टूबर मंगलवार को सायंकाल 4 बजकर 16 मिनट तक विद्यमान रहेगी। हस्त नक्षत्र अपराह्न 2 बजकर 41 मिनट तक होगा। इसके उपरांत दीपावली पूजा में विहित चित्रा नक्षत्र होगा। हस्त चित्रा नक्षत्र में वैधृति योग का संयोग सुखद रहेगा। हस्त नक्षत्र लघु छित्र संज्ञक और चित्रा मृदु मैत्र संज्ञक है। ये दोनों नक्षत्र व्यापारी और उद्योगपति जगत को नई ऊर्जा प्रदान करेंगे।
बता दें कि दिवाली इस वर्ष दिवाली 24 अक्टूबर को मनाई जाएगी। धर्मशास्त्र के अनुसार प्रदोष काल और निशीथकाल व्यापिनी अमावस्या में यह पर्व मनाया जाएगा। कई वर्षों बाद इस बार चित्रा नक्षत्र से युक्त दीपमाला पड़ रही है, जो समग्र राष्ट्र और समाज के लिए सुख समृद्धि लाने वाली सिद्ध होगी। दीपावली महापर्व में प्रदोषकाल में लक्ष्मी पूजन का सर्वाधिक महत्व है। प्रदोषकाल गृहस्थियों और व्यापारियों के लिए तथा नीशीथकाल आगमशास्त्र विधि से पूजन के लिए उपयुक्त है।

ब्रह्मपुराण में प्रदोष काल से लेकर निशीथकाल तक रहने वाली अमावस्या को श्रेष्ठ कहा गया है। अत: दीपावली पर्व दिनांक 24 अक्टूबर सोमवार को ही निर्विवाद रूप से सारे देश में मनाया जाएगा। इस दिन प्रात: 8 बजकर 20 मिनट से 10 बजकर 38 मिनट तक वृश्चिक उपरांत 12 बजकर 40 मिनट तक धनु: लग्न रहेगा। वृश्चिक लग्न पर देवगुरु बृहस्पति की नवम दृष्टि और धनु: को ग्रह मंगल संपूर्ण दृष्टि से देखता है। वृश्चिक लग्न में आॅटो-मोबाइल वर्कशॉप, तांबा, पीतल, कांसा एवं स्टील का व्यवसाय करने वाले व्यक्ति महालक्ष्मी पूजन करें तो विशेष लाभ होगा।
कुछ व्यापारी दीपावली पूजन के लिए धनु: लग्न को श्रेष्ठ मानते हैं। क्योंकि धनु: लग्न का स्वामी शुभ ग्रह है। पूर्वाह्न 12 बजकर 43 मिनट से 2 बजकर 26 मिनट तक मकर लग्न रहेगा। मकर लग्न में ही अभिजित मुहूर्त भी है। मकर लग्न में स्वगृही शनि और तृतीय स्वगृही देवगुरु बृहस्पति विराजमान होने से लग्न अत्यन्त बलवती समझी जाएगी। इसमें लाभ का चौघड़िया और भी उत्तम है।
समुद्र मंथन का सबसे विशिष्ट रत्न
ज्योतिषाचार्य राहुल अग्रवाल के अनुसार समुद्र-मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक सबसे विशिष्ट रत्न हैं लक्ष्मी। यह अनुपम सुंदरी, सुवर्णमयी, तिमिरहारिणी वर दात्री, प्रसन्नवदना, शुभा और क्षमादायी हैं। भगवान विष्णु ने इस अनुपमा को पत्नी के रूप में स्वयं वरण किया।

यह प्रकाशमयी देवी अमावस की रात्रि के घटाघोप अंधकार को अपने प्रकाशपुंज से चिरती हुईं समुद्र से प्रकट हुईं और समस्त वातावरण को ज्योतिर्मय कर दिया। इसी काली अमावस्या की रात्रि से हम प्रतिवर्ष जूझते हैं और समस्त वातावरण को दीपकों की कतारों से आलौकित कर मां लक्ष्मी का स्वागत और पूजन करते हैं।

