- सिर्फ ऐतिहासिक काल की जानकारी देने तक खुद को सीमित रख रहा
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: हस्तिनापुर जिसे पूरा देश महाभारतकालीन मानता है। हस्तिनापुर जो विश्व के धार्र्मिक पटल पर इतिहास संजोए है। हस्तिनापुर जिसे महाभारतकाल के कौरवों की वैभवशाली राजधानी का दर्जा प्राप्त था। हस्तिनापुर जो आज भी पांडवों के किले से लेकर महल, मन्दिर और अन्य अवशेषों का गवाह है। वहीं, हस्तिनापुर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के लिए एक अंजान स्थान है। यहां की एतिहासिकता इस विभाग के लिए कोई मायने नहीं रखती। जो हस्तिनापुर अपने भीतर भारत का गौरवशाली इतिहास समेटे है, उसी इतिहास को भारतीय पुरातत्व विभाग नकारने पर तुला है। हांलाकि इस पूरे प्रकरण पर केन्द्रीय सूचना आयोग ने भी सख्ती दिखाते हुए विभाग से विभिन्न जानकारियां मांगी थीं।
क्या था पूरा मामला?
दरअसल पूर्व में असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियंक भारती ने विभाग से हस्तिनापुर के साथ साथ सिनौली और बरनावा उत्खनन के बाद महाभारतकाल को लेकर जानकारी मांगी थी। इस पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने यह जवाब दिया कि इन तीनों ही स्थानों पर महाभारतकालीन कोई भी प्रमाण नहीं मिलता। प्रशनकर्ता का सवाल जायज था, लेकिन जवाब इतना अटपटा मिलेगा यह खुद प्रशनकर्ता तक ने सोचा भी न होगा। हर कोई जानता है कि महाभारतकाल और हस्तिनापुर का चोली दामन का साथ है। महाभारतकालीन हस्तिनापुर पर रिसर्च तक हो चुकी है।
हस्तिनापुर का इतिहास छात्र-छात्राओं के पाठ्यक्रमों तक में भी शामिल है, लेकिन इसके बावजूद पुरातत्व विभाग ने इन सब तथ्यों को किस आधार पर खारिज किया ये काबिल ए गौर है। प्रियंक भारती के अनुसार विभाग का कहना है कि मेरठ सर्किल द्वारा अभी तक कराए गए उत्खनन में महाभारतकालीन कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं हो सका है। दरअसल नेचुरल साइंसेज ट्रस्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण उत्खनन शाखा एवं मेरठ सर्किल से हस्तिनापुर, बरनावा एवं सिनौली उत्खनन से जुड़ी जानकारियां मांगी थीं। इसके जवाब में विभाग ने सफाई देते हुए कहा कि इन स्थानों का कोई भी महाभारतकालीन इतिहास अभी तक सामने नहीं आया है।
प्रियंक भारती की अपील पर इस पूरे मामले में केन्द्रीय सूचना आयोग में पिछले साल 2 मार्च को सुनवाई हो चुकी है। इस सुनवाई के बाद आयोग ने आदेश पारित करते हुए पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को आदेश जारी किए कि वो इस पूरे मामले में तथ्यों को ध्यान में रखते हुए और रिकॉर्ड में उपलब्ध दस्तावेजों के अवलोकन के बाद संबधित प्रशनकर्ता को उचित जानकारी उपलब्ध कराए और इस जानकारी से आयोग को भी अवगत कराए। उधर प्रियंक भारती का कहना है कि पुरातत्व विभाग जो भी विवरण उपलब्ध करा रहा है वो सिर्फ एतिहासिक काल (छठीं से 10वीं शताब्दी के बीच) के आधार पर है। वो यह भी कहते हैं कि विभाग की दलील है कि कॉपी राइट एक्ट के तहत ज्यादा जानकारी नहीं दी जा सकती।

