Wednesday, March 25, 2026
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क्या अखिलेश-जयंत से उनके चहेते ही खफा हो रहें !

जनवाणी ब्यूरो |

लखनऊ: समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्र्रीय लोकदल (रालोद) का आगामी विधानसभा के लिए चुनावी गठबंधन हो गया। सपा मुखिया अखिलेश यादव और रालोद मुखिया जयंत चौधरी ने चुनाव लड़ने वाले प्रथम चरण के प्रत्याशियों की सूची भी जारी कर दी। इसके बाद भी अखिलेश और जयंत दोनों के ही तमाम चहेते नेता टिकट ना मिलने से नाराज हैं। इन चहेतों का नाराज होना, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा के लिए गड्ढा साबित हो सकता है।

दरअसल सपा और रालोद मुखिया द्वारा चुनाव लड़ने के लिए चिन्हित किए गए उम्मीदवारों को लेकर दोनों दलों के ताकतवर और जिताऊ उम्मीदवार सकते में हैं। इन उम्मीदवारों में कई ऐसे हैं, जिन्हें अखिलेश यादव और जयंत चौधरी ने  चुनाव लड़ने का भरोसा दिया था। लेकिन ऐसे तमाम लोगों को टिकट नहीं मिला।

ऐसे में अब इन उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने की उम्मीदे खत्म हो गई। तो अब मेरठ, मुजफ्फरनगर, बुलन्दशहर, सहारनपुर, रामपुर के ऐसे तमाम रालोद और सपा के नेता पार्टी नेताओं के फैसले से खफा होकर पार्टी के घोषित उम्मीदवार के खिलाफ माहौल बनाने में जुट गए हैं।

इन खफा लोगों का कहना है कि पैसे वाले लोगों को टिकट मिला है। जिन्होंने ने एक घंटे भी पार्टी के लिए काम नहीं किया, वह एक दिन जयंत से मिलकर चुनाव लड़ने के लिए सिंबल पा गए, लेकिन दस वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वाले छपरौली और बागपत के कार्यकर्ता ओर नेताओं की अनदेखी की गई।

इसी प्रकार अखिलेश यादव के टिकट वितरण पर सवाल उठाये जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि अपने स्वार्थ के लिए अखिलेश यादव ने इमरान मसूद और भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर तक को धोखा दे दिया। इमरान मसूद ने अखिलेश यादव के कहने पर ही कांग्रेस से नाता तोड़कर सपा में आये थे, लेकिन अखिलेश यादव ने उन्हें टिकट नहीं दिया।

अब इमरान मसूद कहीं के नहीं रहे। सपा उन्हें टिकट दे नहीं रही है और जिस कांग्रेस में उनका टिकट पक्का था, उसे वह छोड़ चुके हैं। कुछ ऐसा ही व्यवहार अखिलेश यादव ने भीम आर्मी के चंद्रशेखर के साथ भी किया। अखिलेश ने उनके साथ चुनावी गठबंधन करने के मना कर दिया।

जबकि सपा की ओर से जारी उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में अपराधियों और माफिया के भरमार है। जिसके लेकर अब पश्चिम यूपी में सपा मुखिया का आलोचना की जा रही है। कहा जा रहा है कि सपा नेताओं का यह असंतोष अखिलेश -जयंत दोनों को ही नुकसान पहुंचाएगा। खासकर अखिलेश के लिए। राजनीतिक विश्लेषक भी पश्चिम यूपी में सपा नेताओं के इस असंतोष को लेकर हैरत में हैं।

इसकी वजह है। लगभग दो दशक बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान के मिल रहे साथ से उत्साहित होकर रालोद ने अपनी शर्तों पर सपा से चुनावी समझौता किया। रालोद और सपा के इस चुनावी समझौते से पश्चिम यूपी में रालोद और सपा को चुनावी लाभ दिख रहा था। जिसके आधार पर अखिलेश यादव और जयंत चौधरी ने “यूपी बदलो” का नारा बुलंद किया।

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि अखिलेश यादव के शासन में मुजफ्फरनगर में हुए दंगे के दुष्परिणामों को लेकर सपा मुखिया अखिलेश यादव अभी भी भयभीत हैं। अखिलेश नहीं चाहते हैं कि इन चुनावों में सपा के उम्मीदवारों को इसका दुष्परिणाम भोगना पड़े, इसीलिए विधानसभा चुनावों के ठीक पहले सपा मुखिया ने एक तरह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गन्ना पट्टी रालोद प्रमुख जयंत चौधरी के हवाले कर दी। लेकिन जिस तरह से जिताऊ उम्मीदवारों के नाम पर पैसे वाले और दबंग लोग टिकट पाएं है, वह पश्चिम यूपी के लोगों को पसंद नहीं आ रहा है।

लोगों की नाराजगी को देखते हुए जयंत चौधरी ने बागपत और छपरौली के नाराज लोगों को अपनी कोठी पर बुलाकर उन्हें मनाया तो अखिलेश यादव ने अपने चहेते लोगों की नाराजगी को देखते हुए गुपचुप तरीके से टिकट देना शुरू किया है। जिसके तहत उन्होंने कई उम्मीदवारों को जिले स्तर से पार्टी का सिंबल दिया है। अपने चहेतों के खफा होने पर अखिलेश तथा जयंत द्वारा अपने जा रहे तरीकों को चलते इस बार इस इलाके में चुनावी लड़ाई और भी रोचक हो गई है, क्योंकि पश्चिम उत्तर प्रदेश में चुनाव किसान आंदोलन के नाम पर लड़ा जा रहा है। इस संघर्ष में सपा मे नेताओं की अंतर्कलह सपा रालोद गठबंधन को नुकसान पहुंचाएगी।

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