Saturday, March 7, 2026
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कलाकार की सोच

Amritvani 18


एक बार उस्ताद आलिया और फत्तू का गायन हैदराबाद के निजाम के दरबार में होना तय हुआ। यह बात उन दिनों की है, जब देश में रेलगाड़ियों का चलन नहीं हुआ था। लिहाजा, वे दोनों करीब एक माह तक पैदल चलने के बाद निजाम के दरबार में पहुंच सके। तय समय पर उस्ताद का गायन शुरू हुआ। धीरे-धीरे रसिकजन संगीत रस के सागर में डूबने-उतरने लगे। गायन की समाप्ति पर निजाम ने उस्ताद को एक लाख रुपये भेंट किए, लेकिन कहा-उस्ताद, आज महफिल पूरे उभार पर नहीं आई। उस्ताद तो उस्ताद ठहरे, उन्होंने फौरन पुरस्कार लौटाते हुए कहा, हुजूर, बांधे बनियां बाजार नहीं लगता। गाना हमारी तबीयत से सुनिए, तभी आपको मजा आएगा। इस बात पर निजाम ने उस्ताद को शाही मेहमानखाने में ठहरा दिया। एक महीने के अंतराल के बाद एक दिन उस्ताद अपने साथी सहित तानपुरा पर राग छेड़ रहे थे। तानपुरा बजाते हुए दीन-दुनिया से बेखबर उस्ताद अपनी पूरी मस्ती के साथ गाते हुए चल दिए निजाम की तरफ। सिपाहियों ने उन्हें देखा तो हैरत में निजाम को इत्तला दी- हुजूर, लगता है मेहमानखाने में ठहरे गवैये पागल हो गए हैं। निजाम समझ गए और उन्होंने आलिया फत्तू के लिए दरबार सजवा दिया। उस्ताद की सुर लहरी में पूरा दरबार डूब गया। गायन समाप्ति पर निजाम ने माफी मांगते हुए कहा-उस्ताद फरमाइश पेश करें। उस्ताद ने निगाहें उठार्इं और बोले-कितना खूबसूरत है कबूतरों का यह जोड़ा, यही दे दें। जोड़ा उन्हें दे दिया गया। महीनों बाद दोनों फनकार घर पहुंचे। बीवियों ने पूछा-इतने बड़े निजाम से तुम्हें यही मांगते बना? उस्ताद आलिया बोले-खफा क्यों होती हो बेगम? निकाल लाया, कैद में थे बेचारे।


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