
मुझे मार दिया जाए, मेरी यूनिवर्सिटी में बुलडोजर चला दिया जाए फिर भी एक यूनिवर्सिटी के फाउंडर के रूप में मेरी शिनाख्त होगी। मुझ पर किताबों की चोरी का आरोप लगाया गया है, अगर चोरी करके कोई गरीब बच्चों को पढ़ाता है तो ऐसे चोरों की जरूरत हिन्दुस्तान को है। ये शब्द किसी और के नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश के सबसे चर्चित दिग्गज नेता आजम खान के हैं। मुहम्मद आजम खान एक तेजतर्रार नेता आपातकाल की छाया से निकलकर उत्तर प्रदेश की सबसे मजबूत राजनीतिक आवाजों में से एक बनकर उभरे थे। आजम खान मुल्क के दिग्गज नेताओ की फेहरिस्त में शामिल रहे, जिन्होंने लंबा दौर सियासत के आंगन में जिया, परंतु उनके हिस्से लंबा संघर्ष भी आया।
आपातकाल में इंदिरा गांधी के मुखर विरोध में नेतागिरी में कूद जाने वाले आजम खान ने कभी भी राजनीतिक समझौता नहीं किया, कीमत चाहे जो भी रही हो। आजम खान ने गरीबों की उंगली थामकर नवाबों के राजनीतिक किले की प्राचीर को ध्वस्त कर दिया था। इंदिरा गांधी के विरुद्ध आवाज बुलन्द करने वाले आजम खान को काल कोठरी में ठूंस दिया गया था, जहां इंसानो को रखने की मनाही थी जो बिल्कुल जायज नहीं था। जहां उनके साथी नेताओ को आरामदायक जगह में रखा गया था, वहीं आजम खान ने तमाम ज्यादतियां झेलीं। आपातकाल के दौरान 17 महीनों की लम्बी कैद झेलने के बाद पहला चुनाव जनता पार्टी की टिकिट पर लड़ गए हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन राजनीति से जूझते रहे।
इस हार ने उनके इरादों को और मजबूत कर दिया और उन्होंने रामपुर के नवाब परिवार के प्रभुत्व को खुली चुनौती देने का फैसला किया। नवाब परिवार ने ऐतिहासिक रूप से अंग्रेजों का साथ दिया था और बाद में राजनीति में अपना दबदबा बनाए रखा था। जुल्फिकार अली खान ने 1967 से 1989 तक रामपुर से संसद की सीट पर कब्जा किया, और उनकी पत्नी नूर बानो ने 1996 और 1999 में जीत हासिल की। आजम ने इस नवाबी दबदबे को चुनौती देने का बीड़ा उठाया, और खुद को एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित किया। 1980 में, आजम ने रामपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की, उन्होंने मजदूरों और निचले तबके के बीच अपना समर्थन मजबूत करना शुरू किया। 2003 में, समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान, आजम खान ने मौलाना अली जौहर ट्रस्ट की स्थापना की और रामपुर में एक विश्वविद्यालय की नींव रखी। विश्वविद्यालय के उद्घाटन में सपा कैबिनेट की उपस्थिति खान के प्रभाव को दर्शाती थी। लेकिन 2017 में राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद, एक यूनिवर्सिटी के चांसलर को किताब चोर कहकर चिढ़ाया जाने लगा। ये भी राजनीति का क्रूर चेहरा है।
मुलायम सिंह यादव के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले आजम खान हमेशा उनके बाद वाली मजबूत पोजीशन वाले लीडर रहे, परंतु समाजवादी पार्टी में पीढ़ी परिवर्तन होता गया, खुद को आजम खान परिस्थितयों में ढालते रहे, परंतु मुलायम सिंह यादव ने हमेशा आजम खान को अपने भाई के बराबर स्नेह दिया। उन्हीं आजम खान को मुलायम सिंह के निधन के बाद दरकिनार कर दिया गया था। समाजवादी पार्टी से सीमित समर्थन के बावजूद, आजम खान की मुश्किलें बढ़ती चली गर्इं, जेल में रहने के दौरान अखिलेश यादव और पार्टी ने उन्हें दरकिनार कर दिया था। भाजपा के प्रभुत्व और उनके खिलाफ 100 से अधिक कानूनी मामलों के बावजूद, उनका प्रभाव और रामपुर में चुनावों को प्रभावित करने की क्षमता बनी हुई है। अदालत के फैसले इस बात की तस्दीक करते हैं कि उनके खिलाफ राजनीतिक विद्वेष के कारण तमाम मुकदमे लादे गए। हालांकि बात मुकदमों की नहीं है, बात उनकी विश्वसनीयता की है, एक पूर्व मंत्री कई बार के सांसद, एक यूनिवर्सिटी के फाउंडर ने मुर्गी चुराई, बकरी चुराई, भैंस चुराई, उनकी पत्नी ने कुछ पैसे चुराए, उनके बेटे ने शराब की बोतलें लूटीं। हमारे देश की राजनीतिक द्वेष भावना को देखना हो तो इस स्तर पर जाकर समझ सकते हैं।
आजम खान में तमाम दोष हो सकते हैं, परंतु एक चेतना सम्पन्न आदमी अगर इसका मूल्यांकन करे तो समझ आएगा क्या आजम खान के लिए यही काम रह गया था कि वे मुर्गी, बकरी, चोरी करेंगे? ऐसे घिनौने आरोपों के बावजूद आजम खान की शख्सियत कभी धूमिल नहीं हुई। उनके ऊपर तमाम तरह के मुकदमे लगे, उनकी जांच विमर्श कोर्ट करेगा, परंतु इस तरह राजनीतिक द्वेष के तहत जेल में ठूंस देना क्या यही भारतीय राजनीति का स्तर है? आजम खान की शख्सियत बेजोड़ है, आप उनसे सहमत असहमत हो सकते हैं परंतु अनदेखा नहीं कर सकते। आजम खान ने अपराध किए या नहीं ये तो कोर्ट तय करेगा, परंतु ये तय हो गया है कि भारत की राजनीति का स्तर बहुत घिनौना है।

