Thursday, December 9, 2021
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Homeसंवादरविवाणीबदली हुई दुनिया में कहानी कहने का ‘विवेक’

बदली हुई दुनिया में कहानी कहने का ‘विवेक’

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सुधांशु गुप्त

ज्ञानप्रकाश विवेक हिंदी के वरिष्ठ कहानीकार, उपन्यासकार, गजलकार और कवि हैं। उनके पास हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं के संस्कार हैं। आज के समय में ऐसे लोग कम ही बचे हैं जो दोनों जुबानों को एक साथ साध सकें। बेहद सहज, सरल ज्ञानप्रकाश विवेक कहने में कम लिखने में ज्यादा यकीन रखते हैं। पिछले दिनों उनकी कहानियां पढ़कर भी यह साफ हो गया कि उनके पास कहन, शिल्प, कथ्य अलग ढंग का है। विवेक अपनी कहानियों से यह भी साबित करते हैं कि भाषा का वैभव बिना शब्दकोष के भी हासिल किया जा सकता है। छोटे-छोटे वाक्यों से परिवेश के जरिए कहानी को आगे बढ़ाने की कला में माहिर ज्ञानप्रकाश विवेक अपनी कहानियों के विषय बाहर की दुनिया से नहीं तलाशते। वे अपने आसपास की दुनिया को, बदल रही दुनिया को खुली आंखों से देखते हैं और वहीं से विषय चुनते हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियों में, उनकी भाषा में, उनके शिल्प में किसी तरह की बनावट दिखाई नहीं देती।

हिंदी में कम ही ऐसे लेखक हैं जो बेहद सहजता से कहानी को फैंटेसी का रास्ता दिखा देते हैं। ज्ञानप्रकाश विवेक का कहानी संग्रह ‘बदली हुई दुनिया’ (हार्परकालिंस पब्लिशर्स इंडिया) पढ़ते हुए कुछ बातें साफ हो गर्इं। पहली बात, कहानी बड़ी और आकर्षक घटनाओं से ही नहीं लिखी जाती। दूसरी बात, कहानी का प्रभाव निजी ना होकर व्यापक होता है तो कहानी महत्वपूर्ण हो जाती है। तीसरी बात, कहानी के लिए जीवन के छोटे-छोटे अनुभव अधिक सार्थक होते है बजाय इसके कि आप उधार के अनुभवों पर कहानी लिखें। चौथी और अंतिम बात, परिवेश की सघनता से भी जादू क्रिएट किया जा सकता है। संग्रह में कुल 18 कहानियां हैं। सभी कहानियां आकार के हिसाब से छोटी हैं। लेकिन ये छोटी-छोटी कहानियां बड़ा प्रभाव पाठकों पर छोड़ती हैं। अकेलापन, उपभोक्तावाद, अजनबीयत, आंतरिक सौंदर्य, अनुपस्थिति के दुख, स्मृतियां, डेथ विश, पुत्र द्वारा पिता का मोहभंग और दुनिया के बदलाव को चित्रित करता मोबाइल फोन, इन कहानियों के विषय हैं। ‘किसी अनुभव की तरह’ कहानी रूमानियत की एक काल्पनिक तस्वीर दिखाती है। इसी कहानी में नायिका एक जगह कहती है-नदी में रवानी, हवा में वेग, पैरों में यात्रा, किवाड़ों पर दस्तक, पानी में बिम्ब, शब्दों में अर्थ, गुंबदों में गूंज, प्रार्थनाओं  में विनम्रता और हथेली पर घर। किसी अनुभव की तरह ही एक युवक और युवती की मुलाकात होती है। युवक युवती को कॉफी पिलाने अपने घर ले जाता है। दोनों के बीच काल्पनिक-सा संवाद होता है। प्रेम यहां ठोस रूप में नहीं दिखाई पड़ता बल्कि वायवीय रूप में नजर आता है। इसलिए खूबसूरत है। कहानी के अंत में युवती कहती है, किसी दिन मैं फिर आऊंगी, हवा की तरह, किसी अनुभव की तरह। दोनों विदा हो जाते हैं। यह कहानी बिना किसी घटना के भी पाठक को छूती है।

संग्रह में कई कहानियां ऐसी हैं, जो सादगी से पाठक को कब फैंटेसी की दुनिया में ले जाती हैं, पता ही नहीं चलता। ‘चाबी’,  ‘कुर्सी’ और ‘गुस्सा’ ऐसी ही कहानियां हैं। ‘चाबी’ कहानी में एक व्यक्ति अपनी गुम हो गई चाबी को तलाश रहा है। उसे एक व्यक्ति मिलता है। दोनों के बीच संवाद होता है। वह व्यक्ति कहता है कि क्या विडंबना है कि तुम चाबी तलाश रहे हो और मैं ताला। इस कहानी में दोनों का अकेलापन शिद्दत से चित्रित हुआ है। कहानी के अंत में व्यक्ति यह कहकर चला जाता है, आप चाबी ढूंढ़िए, चलता हूं बहुत सारे काम हैं। वास्तव में दोनों ही जहीन हैं लेकिन व्यर्थ। ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानियां बाहर नहीं भीतर चलती हैं। यही इन कहानियों की खूबसूरती है।

‘कुर्सी’ कहानी में कुर्सी के बहाने बदल गई या बदल रही दुनिया के दर्शन होते हैं, जहां संवाद के लिए इंसान के पास केवल कुर्सी बची है। विवेक ने कुर्सी को भी एक जीवित किरदार में बदल दिया है। ‘गुस्सा’ कहानी में एक मध्यवर्गीय व्यक्ति अपना गुस्सा उतारने के लिए बाहर किसी को तलाशता है। जब उसे कोई नहीं मिलता तो वह हार कर घर लौट आता है। गुस्सा थूक कर पत्नी के साथ दिन सेलिब्रेट करने के लिए निकल जाता है। लेखक की कहानियों में विभिन्न रूपों में जो खलनायक आते हैं, लेखक उन्हें बेहद सादगी से नायक में कन्वर्ट कर देते हैं।

‘गवर्नेस’ कहानी में वृद्ध दीनानाथ को एक गवर्नेस की तलाश है। वह एक स्थानीय अखबार में नर्स के लिए विज्ञापन देते हैं। मारिया नाम की एक नर्स उनके पास आती है। दीनानाथ मारिया को बदसूरत पाते हैं, लेकिन वह यह सोचकर उसे रख लेते हैं कि कुछ दिन बाद उसे निकाल देंगे। लेकिन मारिया उनकी इतनी सेवा करती है कि वह ठीक होने लगते हैं। कहानी में आत्मा के सौंदर्य को चित्रित किया गया है। कहानी के अंत में दीनानाथ कहते हैं, मारिया तुम हमेशा इस घर में रहोगी, इस घर को अपना समझकर।

ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानियों में पारिवारिक जीवन और उसके तनाव भी दिखाई पड़ते हैं। ‘मोड़’ कहानी में पति पत्नी के बीच छोटी-सी बात के लिए तलाक की नौबत आ जाती है। दोनों अपनी अपनी जिदों के चलते अदालत पहुंच जाते हैं। लेकिन जब उन्हें तलाक के पेपर मिलते हैं तो उन्हें कुछ खोने का अहसास होता है। वे दोनों तलाक के पेपर फाड़कर फिर से साथ रहने का फैसला करते हैं। क्लब, दश्त-ए-तन्हाई और तहरीर कहानियां अकेलेपन का आख्यान हैं। क्लब में उपभोक्तावादी संस्कृति पर भी धीमें से चोट की गई है। कहानी में नैरेटर एक जगह कहता है, उपभोक्तावाद जिस रास्ते से आया, लोगों ने उसी रास्ते से रिश्तों को नंगे पांव जाते देखा। ये बुरे दिन की शुरूआत थी। लोगों के सिमटने, रिश्तों के खत्म होने और संवादहीनता से पैदा हुई बेचैनी के न महसूस होने की शुरुआत। ‘पिता का घर’ कहानी में पिता की अनुपस्थिति आपको बेचैन करती दिखाई देती है तो ‘आपका होना’ कहानी में एक पत्नी अपने पति की अनुपस्थिति को महसूस करती है। ज्ञानप्रकाश विवेक की इन कहानियों को पढ़ना नए मिजाज, नये शिल्प, हिन्दी-उर्दू जुबानों के इस्तेमाल से बना नया मुहावरा और नये लबो लहजे को जानना और समझना है। ये कहानियां बिना किसी ताम-झाम, बिना शोर शराबे के अपनी बात कहती हैं। इसलिए इनका प्रभाव देर तक रहता है। बदली हुई और बदल रही दुनिया में कहानी लेखन का नया विवेक हैं ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानियां।


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