Thursday, March 19, 2026
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बसंत ऋतु बनाम ऋतुराज

Sanskar 7


राजेंद्र कुमार शर्मा |

बसंत पंचमी, बसंत ऋतु के आगमन का उदघोष करती है। ग्रीष्म ऋतु धीरे धीरे कड़ाके की ठंड का स्थान ले रही होती है। मौसम न ठंडा, न बहुत गर्म होता है। बसंत ऋतु सब ओर नव जीवन व नव उत्साह का संचार कर जाती हैं। पूरे उत्तर भारत में खेतों में पीली पीली सरसों की चादर बिछ जाती है, पुष्प खिल उठते हैं। बसंत को इसकी सर्वश्रेष्ठता के कारण ही ऋतुओं का राजा कहा गया है। इस समय प्राकृतिक पंच-तत्त्व- जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहक और सौंदर्य रूप दिखाते हैं। ठंड में अपने खोकरों में छिपे विहंग स्वच्छ आकाश में उड़ चलते हैं , किसान लहलहाती फसलों विशेषकर, सरसों के फूलों को देखकर उत्साह और ऊर्जा से भर जाते है। पूरी प्रकृति उन्मादी हो जाती है। यही तो प्रकृति का पुनर्जन्म है।

बसंत और पंचमी का संबंध
हिन्दू तिथि के अनुसार माघ माह के शुक्ल पक्ष का पांचवां दिन या अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार यह पर्व जनवरी-फरवरी में मनाया जाता है।

बसंत पंचमी का इतिहासिक महत्व
बसंत पंचमी हिन्दुओं का प्रसिद्ध त्योहार है। इस पावन दिवस को वीर हकीकत राय के बलिदान दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। वीर हकीकत राय ने मात्र दस वर्ष की आयु में धर्म की रक्षा हेतु फांसी के फंदे को गले लगा लिया । बसंत पंचमी के दिन , धर्म के इस योद्दा को श्रद्धांजलि देकर , उनकी शहादत के लिए याद किया जाता है।

बसंत पंचमी का पौराणिक महत्व
स्कंद पुराण के अनुसार संपूर्ण संस्कृति की देवी के रूप में दूध के समान श्वेत रंग वाली सरस्वती के रूप को अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। बसंत पर्व का आरंभ बसंत पंचमी से होता है। इसी दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती का जन्मदिन मनाया जाता है। सरस्वती ने अपने चातुर्य से देवों को राक्षसराज कुंभकर्ण से बचाया। वाल्मिकी रामायण के उत्तरकांड के एक प्रसंग के अनुसार , कहते हैं देवी वर प्राप्त करने के लिए कुंभकर्ण ने दस हजार वर्षों तक घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा वर देने को तैयार हुए तो देवों को चिंता हुई कि यह राक्षस पहले से ही है, वर पाने के बाद तो और भी शक्तिशाली और उन्मादी हो जाएगा तब ब्रह्मा ने सरस्वती का स्मरण किया। सरस्वती राक्षस की जीभ पर विराजमान हुईं। जिसके प्रभाव से कुंभकर्ण ने ब्रह्मा से कहा, स्वप्न वर्षाव्यनेकानि। देव देव ममाप्सिनम। यानी मैं कई वर्षों तक सोता रहूं, यही मेरी इच्छा है। और ब्रह्मा ने यही वर उसे दिया।

बसंत पंचमी का ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिषीय दृष्टि से सूर्य को ब्रह्माण्ड की आत्मा, पद, प्रतिष्ठा, भौतिक समृद्धि, औषधि तथा ज्ञान और बुद्धि का कारक ग्रह माना गया है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवताओं का एक अहोरात्र (दिन-रात) मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है, अर्थात् उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन रात्रि कही जाती है।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 22 दिसंबर से सूर्य उत्तरायण शनि हो जाते हैं। 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं और अगले 6 माह तक उत्तरायण रहते हैं। सूर्य का मकर से मिथुन राशियों के बीच भ्रमण उत्तरायण कहलाता है। देवताओं का दिन माघ के महीने में मकर संक्रांति से प्रारंभ होकर आषाढ़ मास तक चलता है। चूंकि बसंत पंचमी का पर्व इतने शुभ समय में पड़ता है, अत: यह पर्व का स्वत: ही आध्यात्मिक, धार्मिक, वैदिक आदि सभी दृष्टियों से अति विशिष्ट महत्व दिखाता है।

सरस्वती पूजन तथा ज्ञान का महापर्व
ब्राह्मण-ग्रंथों के मतानुसार मां सरस्वती ब्रह्मस्वरूपा, कामधेनु तथा समस्त देवों का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये ही विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा-आराधना के लिए माघ मास की पंचमी तिथि को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती हैं। यह विद्यार्थियों का भी दिन है, इस दिन विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की पूजा आराधना की जाती है।बसंत पंचमी को इनका आविर्भाव दिवस माना जाता है। जिनकी जिव्हा पर सरस्वती देवी का वास होता है, वे अत्यंत ही विद्वान् व कुशाग्र बुद्धि होते हैं। शास्त्रों में भगवती सरस्वती की आराधना व्यक्तिगत रूप में करने का विधान है, किंतु आजकल सार्वजनिक सामूहिक रूप से देवी सरस्वती की मूर्ति स्थापना और सामूहिक पूजन चलन में है। यह ज्ञान का त्योहार है, समारोह का आरम्भ और समापन सरस्वती वन्दना से होता है।

सरस्वती व्रत का विधान
इस दिन भक्तिपूर्वक ब्राह्मण के द्वारा स्वस्ति वाचन कराकर गंध, अक्षत, श्वेत पुष्प माला, श्वेत वस्त्रादि उपचारों से वीणा, अक्षमाला, कमण्डल, तथा पुस्तक धारण की हुई सभी अलंकारों से अलंकृत भगवती गायत्री का पूजन किया जाता है। फिर हाथ जोड़कर मंत्रोच्चार करते है कि : “देवि! जिस प्रकार ब्रह्मा आपका कभी परित्याग नहीं करते, उसी प्रकार हमारा भी कभी अपने परिवार के लोगों से वियोग न हो। हे देवि! सभी विद्याएँ आपके अधिष्ठान में ही रहती हैं, वे सभी मुझे प्राप्त हों।
उपरोक्त विधि से पूजन कर मौन होकर भोजन करना चाहिए। व्रत की समाप्ति पर ब्राह्मण को चावलों से भरा पात्र, श्वेत वस्त्र, श्वेत चंदन, घंटा, अन्न आदि पदार्थ भी दान करें। यदि हो तो अपने गुरु देव का भी वस्त्र, धन, धान्य और माला आदि से पूजन करें।

देवी सरस्वती पूजन से शुभ फलों की प्राप्ति
इस विधि से जो भी सरस्वती पूजन करता है वह विद्वान, धनी और मधुर वाणी से युक्त हो जाता है। भगवती सरस्वती की कृपा से उसे महर्षि वेदव्यास के समान ज्ञान प्राप्त हो जाता है। स्त्रियाँ यदि इस प्रकार सरस्वती पूजन करती हैं तो उनका अपने पति से कभी वियोग नहीं होता। बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन और व्रत करने से वाणी मधुर होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है, प्राणियों को सौभाग्य प्राप्त होता है, विद्या में कुशलता प्राप्त होती है। पति-पत्नी और बंधुजनों का कभी वियोग नहीं होता है तथा दीघार्यु एवं निरोगता प्राप्त होती है।

बसंत पंचमी शुभ मूहर्त
पंचांग के अनुसार बसंत पंचमी का शुभारंभ 13 फरवरी को दोपहर 2.40 बजे होगा और समापन 14 फरवरी को दोपहर 12.10 बजे होगा। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार , 14 फरवरी को ही सरस्वती पूजन किया जाएगा। तथा इस पूजन का शुभ समय 14 फरवरी को प्रात: 10.30 बजे से दोपहर 1.30 बजे तक रहेगा।


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