- मदरसा आधुनिकीकरण स्कीम क्या आई सरकारी खजाने की लगा दी वाट
- सेटिंग-गेटिंग का खुला खेल, कोई कहने सुनने वाला नहीं
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: मदरसों के नाम पर सरकारी धन लूट का खुला खेल मेरठ में खेला जा रहा है। देखने वाले सब देख रहे हैं और जानने वाले भी सब जानते हैं लेकिन इन सब के बावजूद देखने और जानने वाले सब चुप हैं। क्यों? क्योंकि शायद फायदा सबका है! आरोप गंभीर हैं लेकिन जब इन आरोपों की सरकारी जांच हुई तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। चोर और चोरी दोनों पकड़ में आ गए।
दरअसल, सरकार ने मदरसों, वहां के छात्र छात्राओं और स्टाफ को सहुलियतें देने के उद्देश्य से मदरसा आधुनिकीकरण स्कीम लागू की। मदरसे में पढ़ाने वाले शिक्षकों का वेतन हो या फिर मदरसे के छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, सब कुछ सरकारी खजाने से जारी होने लगा। इसके तहत यहां पढ़ाने वाले शिक्षकों का जो वेतन (मानदेय) तय हुआ उसमें ग्रेजुएट (स्नातक) अध्यापक को आठ हजार रुपए और पोस्ट ग्रेजुएट (स्नातकोत्तर) को 15 हजार रुपए तय किए गए। इन दोनों वेतन श्रेणियों में केन्द्र व राज्य सरकार दोनों का कॉन्ट्रीब्यूशन था। हांलाकि यह बात अलग है कि इसमें केन्द्र का कॉन्ट्रीब्यूशन ज्यादा था।
मेरठ में इस प्रकार के कुल 118 मदरसे हैं जो सरकारी आकंड़ों में भी दर्ज हैं। इन सभी 118 मदरसों के स्टाफ का वेतन सरकारी खजाने से जारी होता है। फर्जी मदरसों का भंडाफोड़ करने वाले सामाजिक संगठन अल खिदमत फाउंडेशन को जब मदरसों में फर्जीवाड़े की शिकायतें लगातार प्राप्त होने लगी तो उसने भी इन फर्जी मदरसों के खिलाफ मुहिम छेड़ दी।
पहली बार जब योगी सरकार सत्ता में आई तो उसने भी ऐसे मदरसों की जमीनी हकीकत जाननी चाही। उधर, अल खिदमत फाउंडेशन की मुहिम के तहत जनपद के कई मदरसों की सरकारी जांच शुरु हो गई। यह जांच 2017 में शुरु हुई थी। जांच के दौरान अधिकतर मदरसों में हेराफेरी मिली। फाउण्डेशन के अध्यक्ष तनसीर अहमद ने बताया कि कहीं मदरसे नहीं थे तो कहीं स्टाफ नाममात्र का था।
कहीं सिर्फ मदरसों के बार्ड टंगे मिले तो कहीं छात्रों की संख्या पर सवाल खड़े हो रहे थे। अल खिदमत फाउंडेशन के अनुसार जांच के दौरान पता चला कि कहीं पर स्टाफ बहुत कम है, लेकिन कागजों में ज्यादा दिखाकर फर्जी नामों के आधार पर वेतन वसूला जा रहा है तो कहीं पर छात्र कम हैं तो वहां फर्जी छात्रों के नामों से छात्रवृत्तियां हड़पी जा रही हैं।
जब इन मान्यता प्राप्त मदरसों का भौतिक सत्यापन पूरा हो गया और यह भी पता चला कि किन किन मदरसों में गड़बड़िया पाई गर्इं है तो ऐसे में फाउंडेशन ने यह सवाल उठाया कि आखिर किस आधार पर उक्त फर्जी मदरसों के फर्जी नामों पर आधारित अध्यापकों को सरकारी खजाने से आज तक भी वेतन क्यों जारी किया जा रहा है।
सरकारी मंशा भांप अलर्ट मोड पर उलेमा
योगी सरकार के पहले कार्यकाल (2017) में मान्यता प्राप्त मदरसों की सच्चाई जानने की कोशिशें की गर्इं तो सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल (2022) में गैर मान्यता प्राप्त मदरसों की हकीकत से वाबस्ता होना चाहा। इसके अलावा एनआरसी प्रकरण हो या फिर एक देश एक नियम।
इन सभी के दूरगामी विश्लेषण के बाद बड़े मुस्लिम धार्मिक संगठन अचानक एलर्ट मोड पर आ गए और उन्होंने मस्जिद एवं मदरसा कमेटियों से लेकर आम मुसलमानों तक से अपील शुरु कर दी कि वो अपने सरकारी रिकॉर्ड (डॉक्यूमेंट्स) दुरुस्त कर लें।
यह सच्चाई है कि मुस्लिम समाज में शिक्षा के महत्व पर पहले के मुकाबले अब ज्यादा जोर दिया जा रहा है। तमाम बड़े मुस्लिम धार्मिक संगठन से लेकर कई बड़े उलेमा तक इस बात को महसूस कर रहे हैं कि शिक्षा के आभाव में मुस्लिम समाज में रुढ़िवादिता का भाव डेवलप हुआ।
कई उलेमा इस हकीकत को दबे स्वरों में स्वीकार भी करते हैं। शुक्रवार को जिस प्रकार मस्जिदों में वहां के इमामों ने लोगों से मस्जिदों की जगह की रजिस्ट्री कराने के लिए आर्थिक मदद की अपीलें शुरु की वो अपने आप में बड़ी बात है।
दरअसल, शहर में ऐसी मस्जिदें भी हैं जिन पर कन्स्ट्रक्शन तो हो गया, लेकिन धनाभाव के कारण मस्जिदों की जमीनों की रजिस्ट्री नहीं हो पाई।
अब इसके लिए बाकायदा जमीयत ने लोगों को अवेयर करना शुरू कर दिया है। जमीयत अध्यक्ष व पूर्व राज्य सभा सांसद मौलाना महमूद मदनी सहित कई बड़े मुस्लिम धार्मिक नेता मुस्लिमों से यह भी अपीलें कर रहे हैं कि वो अपने अपने सरकारी कागज दुरुस्त रखें। यदि इनमें कहीं कोई कमी रह गई हो तो इसे भी फौरन दुरुस्त करवा लें।
दरअसल, उलेमाओं और मुस्लिम संगठनों की यह सक्रियता अब उनकी दूरगामी सोच कर ही परिणाम कही जाएगी और किसी हद तक यह सही भी है। गौरतलब है कि जिस समय एनआरसी वाला मुद्दा हावी हुआ था तब भी उलेमाओं के स्तर से अपीले की गर्इं थी कि वो अपने अपने सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को अपटूडेट कर लें ताकि किसी भी परेशानी से बचा जा सके।

