Tuesday, March 17, 2026
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खुद आत्मनिर्भर बन, दे रहीं सैकड़ों महिलाओं को रोजगार

  • रजपुरा ब्लॉक के गांव राली चौहान की सोनिका ने रोजगार स्थापित कर महिलाओं को दिया एक संदेश

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: कहते हैं कि जब एक महिला खुद के लिये खड़ी होती है तो वो पूरे नारी समाज के लिये खड़ी होती है। यही बात आत्मनिर्भरता पर भी लागू होती है, जब एक महिला आत्मनिर्भर बनती है तो अपने समाज की महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करती हैं। अंधेरे में रोशनी दिखाते हुए जो महिलाएं जीवन में कुछ करना चाहती हैं। उनके लिए नई दिशा का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

परीक्षितगढ़ रोड स्थित रजपुरा ब्लॉक के गांव राली चौहान की सोनिका ने आत्मनिर्भर होकर केवल रोजगार स्थापित ही नहीं किया, बल्कि समाज में महिलाओं को एक संदेश भी दिया है। महिलाएं भी आज रोजगार में किसी से कम नहीं हैं। कहते हैं कि हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती, बस लक्ष्य प्राप्ति में समय लगता है। सोनिका बताती हैं कि वो अपने मायके में मां, दो बेटों, पति के साथ रहती हैं।

उनके पति पेंटर का कार्य करते हैं। बढ़ती महंगाई और महंगी शिक्षा को देखते हुए स्वयं अपने कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी उठाते हुए रोजगार पाने का लक्ष्य मन में रखा। आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले बागपत, बिजनौर, सहारनपुर, मेरठ के जानी, बिजनौर के हल्दौर में महिलाओं को ट्रेनिंग दे रही है। कहते हैं कि जिसको सीखने की चाह हो वो किसी भी परिस्थिति में सीख सकता है। मुफलिसी की जिंदगी जीते हुए आत्मनिर्भर बनकर समाज में मिसाल पेश करना कोई सोनिका से सीखे।

सोनिका के पांच आॅपरेशन होने के बावजूद उन्होंने हालातों के सामने हार नहीं मानी और खुद आत्मनिर्भर होकर समाज के लिए एक उदाहरण सेट किया। सोनिका केवल 12वीं तक पढ़ी है, लेकिन जीवन में कुछ करना उनका लक्ष्य था। इसी लक्ष्य को सिद्ध करने के लिये वो इशू सहायता समूह से जुड़ी। उन्होंने आरसीटी में झाड़ू बनाने का प्रशिक्षण लिया और उसके एक महीने बाद से ही अपना लघु उद्योग शुरू किया।

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सोशल मीडिया ने जगाई उम्मीद की किरण

साल 2021 में जब घर से ही कार्य शुरू करने का फैसला लिया तो कच्चे माल को लेकर असमंजस बनी हुई थी मगर उस वक़्त फेसबुक पर वीडियो देखकर दिल्ली की एक फर्म से संपर्क करके माल मंगाया। बता दें कि झाड़ू में इस्तेमाल होने वाला फूल, जिसे फूल झाड़ू कहा जाता है, यह असम की घाटियों में पैदा होता है। सोनिका ने बताया कि दिवाली से पहले धनतेरस पर झाड़ू की बंपर डिमांड होती है। काम की शुरुआत 15,000 रुपये से की थी जो बढ़ता-बढ़ता डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच गया।

सप्लाई करने में आयी दिक्कत

किसी भी उद्योग को शुरू करने में सबसे मुश्किल पड़ाव होता है मार्केटिंग, ऐसा इसलिये क्योंकि नए उत्पाद को मार्केट में वहां जगह बनानी होती है। जहां पहले से ही एक स्थापित ब्रांड लोगों के मुंह पर चढ़ा होता है, हालांकि बड़ी कंपनियां इसके लिए स्पेशलाइज्ड लोगों को रखती हैं। मगर लघु उद्योगों में यह कार्य खुद ही करना पड़ता है। सोनिका ने बताया कि शुरुआती दिनों में बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था, लेकिन अब मार्केट काफी ठीक हो गयी है।

महिलाओं को मिला रोजगार

गांव में घरेलू एवं अनपढ़ महिलाओं के लिए झाड़ू स्वरोजगार का उत्तम माध्यम बन गया है। गांव की 35 से 50 वर्ष की महिलाएं झाड़ू बनाने का काम करती हैं। वह बताती हैं कि एक झाड़ू बनाने में 5 से 10 मिनट का समय लगता है तथा दो रुपये से छह रुपये तक एक झाड़ू बनाने में लगता है।

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