जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: वेस्ट यूपी में कोरोना की दूसरी लहर में कोहराम के बीच कालाबाजारी करने वालों ने मरीजों और उनके परिजनों की विवशता का जमकर लाभ उठाया। एक अनुमान के अनुसार ऐसे मुनाफाखोर लोगों ने वेस्ट यूपी में बीते दो माह के भीतर कई करोड़ का ‘कारोबार’ कर लिया।
इसके बावजूद इक्का-दुक्का कार्रवाई की बात तो कहीं गई, लेकिन बड़ी कार्रवाई नहीं की गई। मेरठ व गाजियाबाद में रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजरी करने वाले पकड़े भी गए, लेकिन कई अस्पतालों का स्टाफ भी इसमें शामिल पाया गया। एक सप्ताह पहले तक रेमडेसिविर सहित कोविड की दवाओं को लेकर मारामारी थी, लेकिन अब ब्लैक फंगस के मामले सामने आने के बाद इसकी दवाएं भी ब्लैक आउट हो गई है।
यह भी सामने आया है कि कई प्राइवेट अस्पतालों को दूसरे राज्यों से दवाई मंगानी पड़ी है। 14 मरीज आंनद हॉस्पिटल में ब्लैक फंगस के भर्ती हैं, जबकि 15 मरीज मेडिकल में थे। न्यूटिमा में भी तीन मरीज भर्ती थे। रेमडेसिविर 30 से 40 हजार रुपये में मार्केट में बिका है।
इस तरह से लोगों से लूट हुई है। अब ब्लैक फंगस के मरीजों को इंजेक्शन व दवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही है। कमिश्नर ने कुछ इंजेक्शन मेडिकल को उपलब्ध कराये हैं, लेकिन वो कम है। प्राइवेट अस्पतालों को ब्लैक फंगस में प्रयोग किये जाने वाले इंजेक्शन नहीं मिल रहे हैं।
आनंद हॉस्पिटल में ब्लैक फंगस के 14 मरीजों का आॅपरेशन कर दिया गया, लेकिन उन्हें इंजेक्शन नहीं मिल रहा है, जिसके चलते उनकी जान भी जा सकती है। अचानक ब्लैक फंगस में प्रयोग किया जाने वाला इंजेक्शन मार्केट से गायब हो गया है। हालांकि कमिश्नर सुरेन्द्र सिंह ने इस इंजेक्शन के लिए शासन स्तर पर बात की है, ताकि समय रहते प्राइवेट अस्पतालों को भी यह इंजेक्शन उपलब्ध कराया जा सके।

