
बोर्ड परीक्षा के प्राप्तांक कहीं न कहीं बच्चों के भविष्य की दिशा तय करते हैं, किंतु हमें अच्छे और बुरे दोनों ही परीक्षा परिणामों के लिए मानसिक रूप से तैयार रहने की जरूरत है। प्राय: देखा जाता है कि भारत जैसे देश में कोई भी परीक्षा का परिणाम निकलता है, तो किशोरों के आत्महत्या का प्रतिशत भी बढ़ जाता है। एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो) की रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच वर्षों में परीक्षा में असफलता के कारण आत्महत्याओं की दर सबसे ज्यादा रही है, क्योंकि हमारे समाज में बोर्ड में प्राप्त किए अच्छे प्राप्तांक ही विद्यार्थियों के मेधावी होने का मानक माना जाता हैं। डब्ल्यूएचओ ने अपने रिपोर्ट में दावा किया है कि दुनिया में दस से उन्नीस वर्ष की आयु के हर सात में से एक विद्यार्थी, अपने शैक्षणिक वर्षों के दौरान अवसाद का अनुभव करता है।