- कोरोना और धातुओं की बढ़ती कीमतों का पड़ा असर
- लोहा, जस्ता, पीतल और पॉलीथीन के दाम आसमान पर पहुंचे
- कीमतें बढ़ीं, लेकिन पेट्रोमैक्स के दाम न बढ़ने से परेशानियां बढ़ीं
ज्ञान प्रकाश |
मेरठ: खेल उद्योग के बाद पूरे देश में मेरठ का पेट्रोमैक्स उद्योग हमेशा चर्चाओं में रहा है। कोरोना और धातुओं की बढ़ती कीमतों ने इस उद्योग को बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है। जनपद में पेट्रोमैक्स इकाइयों के लगातार बंद होने से निर्माण से जुड़े लोग बेहद परेशान है।
दरअसल लोहा, जस्ता, पीतल और पॉलीथिन आदि के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और लागत अधिक होने और आपूर्ति कम होने से पूरे उद्योग पर संकट के बादल छा गए हैं।
मेरठ को खेलों के सामान और पेट्रोमैक्स उद्योग के कारण पूरे देश में जाना जाता है। कैंचियों का नंबर इसके बाद आता है। पेट्रोमैक्स से जुड़े लोग मिनी गैस सिलेंडर, चूल्हा, बर्नर, रेगुलेटर, नॉब, पाइप, स्विच जैसी दो सौ से अधिक सामान बनाते हैं।
मिनी गैस सिलेंडर को लेकर इस शहर का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। गत वर्ष कोरोना के कारण पूरा उद्योग संकट में समा गया है। इस उद्योग से छह सौ इकाइंयों में लगभग बारह हजार लोग जुड़े हुए हैं। मंहगाई के कारण ढाई सौ से अधिक इकाइयां बंद हो चुकी है। इस काम से जुड़े अधिकांश लोग मजदूरी और टैम्पो चला रहे हैं।
मंहगाई ने इस उद्योग के भविष्य पर प्रश्न चिहन लगा दिया है। जो जस्ता 165 रुपये प्रति किलो बिकता था वो अब 225 रुपये प्रति किलो, पीतल का दाम 280 रुपये प्रति किलो से 430 रुपये प्रति किलो पहुंच गया। आयरन शीट साठ रुपये प्रति किलो से अस्सी रुपये प्रति किलो पहुंच गई है।
हैरानी की बात यह है कि पोलीथीन का दाम 140 रुपये प्रति किलो से 225 रुपये प्रति किलो पहुंच गया है। पेट्रोमैक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष शाहिद राणा का कहना है कि कोरोना ने गत वर्ष पूरे काम पर ब्रेक लगा दिया था। चार पांच महीने से कुछ उम्मीदें बंधी थी लेकिन एकबारगी महंगाई ने हालत खराब कर दी है। एक पेट्रोमैक्स बनाने में जितनी लागत आ रही है उस हिसाब से मार्केट में कीमत नहीं मिल रही है।
पांच किलो का जो सिलेंडर 280 रुपये में मिलता था वो अब चार सौ पार कर गया है। इसी तरह सिंगल बर्नर वाला चूल्हा 350 रुपये और डबल बर्नर वाला चूल्हा सात सौ से लेकर एक हजार तक में बिक रहा है। रेगुलेटर के काम से जुड़े जाहिद सैफी ने बताया कि अब इस उद्योग में मुनाफा कम टेंशन ज्यादा दिख रही है। रेगुलेटर हो या अन्य कोई पार्टस सभी महंगाई के मार से बर्बाद हो रहे हैं।
अब डिमांड कम हो रही है जबकि लागत लगातार बढ़ रही है। पेट्रोमैक्स उद्योग से पूर्व में जुड़े रहे और एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हाजी राशिद सैफी का कहना है एक हजार से अधिक इकाइयां काम कर रही है लेकिन हालात यह हो गए हैं कि काफी इकाइयां बंद हो चुकी है।
सिलेंडर पर पाउडर कोटिंग करने वाले अमजद मलिक का कहना है कि पूरे शहर में यह काम सिर्फ चार पांच लोग ही करते है। सिलेंडर और चूल्हों पर रंग कराने का काम पहले काफी आता था लेकिन अब तो कई दिन तक कारखाना बंद करना पड़ता है।
दरअसल मेरठ में बने पेट्रोमैक्स पश्चिमी बंगाल से होते हुए बांग्लादेश और नेपाल तक सप्लाई होते हैं। किसी जमाने में मेरठ की शान रहा यह उद्योग अब मुश्किलों में जी रहा है।

