Saturday, February 28, 2026
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राष्ट्रीय चुनौती बनतीं बस हड़तालें

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त्योहार की आहट के बीच मध्य प्रदेश 2 मार्च 2026 की सुबह एक बड़े ठहराव की ओर बढ़ रहा है—सड़कों पर सन्नाटा होगा और यात्रियों की उम्मीदें अधर में लटकेंगी। मध्य प्रदेश बस ओनर्स एसोसिएशन ने नई परिवहन नीति के खिलाफ 2 मार्च 2026 को सुबह 6 बजे से प्रदेश के 55 जिलों में अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान कर दिया है—यदि सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानीं तो करीब 20 हजार बसों के पहिए थम जाएंगे और लाखों यात्री सड़कों पर अटक जाएंगे। निजी आॅपरेटर्स का आरोप है कि पीपीपी मॉडल, सात जोनों में कंपनियों को अधिकार, बढ़ा हुआ टैक्स और बदले परमिट नियम उनके व्यवसाय की कमर तोड़ देंगे। होली से ठीक पहले उठाया गया यह कदम डेढ़ लाख से अधिक यात्रियों को सीधे प्रभावित करेगा। चेतावनी साफ है—क्या सरकार अब भी तत्परता दिखाकर ठोस, समयबद्ध निर्णय ले इस टकराव को टाल पाएगी, या फिर लाखों यात्रियों को सड़कों पर उतरने का इंतजार ही करना होगा?

हड़ताल की घोषणा कई दिन पहले हो जाती है, मांगें सार्वजनिक हो जाती हैं, वार्ता के दौर भी चलते हैं, फिर भी अंतिम निर्णय टलता रहता है। यह प्रतीक्षा आखिर किसके हित में है? सरकारें तब तक निर्णायक कदम क्यों नहीं उठातीं जब तक बसें सड़कों से गायब और जनता असहाय न हो जाए? यह कोई नई स्थिति नहीं, बल्कि बार-बार दोहराया जाने वाला पैटर्न है। जब चेतावनी स्पष्ट हो, पर्याप्त समय हो और संभावित नुकसान का अंदाजा भी हो, तब भी निष्क्रियता क्यों बनी रहती है? क्या प्रशासनिक तंत्र त्वरित निर्णय लेने में असमर्थ है या राजनीतिक समीकरण समाधान पर भारी पड़ते हैं? परिणाम हर बार एक जैसा होता है—तय तारीख आते ही परिवहन व्यवस्था चरमरा जाती है और आम आदमी को अपनी जेब और समय दोनों से इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।

इस हड़ताल का सीधा और सबसे गहरा असर आमजन पर पड़ेगा। होली पर घर लौटने की तैयारी कर रहे छात्र, शहरों में काम कर रहे कामगार और परिवार से मिलने को उत्सुक लोग अचानक विकल्पहीन हो जाएंगे। बस किराए कई गुना तक बढ़ने की आशंका है, क्योंकि प्राइवेट टैक्सी और अन्य साधन महंगे तथा सीमित हैं। ट्रेनें पहले से भीड़ से जूझ रही हैं, ऐसे में अतिरिक्त दबाव हालात और बिगाड़ेगा। बुजुर्ग, बीमार और आपात स्थिति में यात्रा करने वाले लोग सबसे अधिक परेशान होंगे। छोटे व्यापारी, दिहाड़ी मजदूर और ग्रामीण क्षेत्रों के यात्री, जो बसों पर निर्भर हैं, आर्थिक झटका सहने को मजबूर होंगे। प्रतिदिन लाखों रुपये का अतिरिक्त बोझ जनता पर पड़ेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार थम जाएगी।

यह संकट केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चुनौती बन चुका है। परिवहन जैसे अनिवार्य क्षेत्र में बार-बार की हड़तालें विकासशील भारत की छवि पर सवाल खड़े करती हैं। विकसित देशों में सार्वजनिक परिवहन को आवश्यक सेवा मानकर सख्त कानून लागू हैं, जबकि यहां इसे लगभग सामान्य घटना की तरह लिया जाता है। इससे नीति-निर्माण की प्राथमिकताओं पर संदेह गहराता है। क्या संगठित दबाव समूह आम नागरिक की सुविधा पर भारी पड़ रहे हैं? जब हर राज्य में यही हाल उभर रहा हो, तो स्पष्ट है कि समाधान टुकड़ों में नहीं, व्यापक और संरचनात्मक होना चाहिए। राष्ट्रीय परिवहन नीति अब विकल्प नहीं, अपरिहार्य आवश्यकता है।

हालिया घटनाएं स्थिति की गंभीरता उजागर करती हैं। फरवरी 2026 में राजस्थान में निजी बस हड़ताल से लगभग 35,000 बसें बंद रहीं और 15 लाख से अधिक यात्री प्रभावित हुए; त्योहारों के बीच किराए कई गुना बढ़े और राज्य परिवहन पर भारी दबाव पड़ा। नवंबर 2025 में दक्षिण भारत के छह राज्यों में इंटरस्टेट लग्जरी बसों की हड़ताल से 1,500 से अधिक बसें ठप रहीं और रोज 45,000 यात्री फंसे। तीर्थयात्री और मरीज विशेष रूप से परेशान हुए। जनवरी 2018 में तमिलनाडु में छह दिन चली सरकारी बस कर्मचारियों की हड़ताल ने पूरे राज्य की रफ्तार थाम दी थी। ये उदाहरण साबित करते हैं—चेतावनियां मिलती हैं, संकट दिखता है, फिर भी समाधान आखिरी क्षण तक टलता रहता है।

सरकारों की प्रतीक्षा-नीति के पीछे राजनीतिक दबाव, चुनावी गणित, राजकोषीय बोझ और संगठित लॉबी की ताकत जैसे कारण गिनाए जाते हैं। बस मालिकों के संगठन प्रभावशाली हैं, उनकी मांगों को अनदेखा करना सरल नहीं। त्वरित निर्णय से खजाने पर भार बढ़ने की आशंका टालमटोल को जन्म देती है। पर इस रस्साकशी में सबसे कमजोर कड़ी आम यात्री बनता है—न वह नीति-निर्माण में शामिल, न वार्ता की मेज पर उसकी आवाज। परिवहन बुनियादी सेवा है; इसे दबाव की रणनीति नहीं बनने देना चाहिए। पारदर्शी संवाद शुरू हों, तो टकराव टल सकता है।

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