
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर का सार्वजनिक जीवन हमेशा सामान्य और परंपराओं से हटकर था। वैसे उनमें परंपराओं की समझ और दिल में परंपराओं के लिए सम्मान हमेशा रहा। सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले किसी व्यक्ति का बिना किसी पद पर रहे सीधे प्रधानमंत्री बन जाना, ना सामान्य है ना पारंपरिक। चंद्रशेखर बने! प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा अपनी मर्जी से देने वाले कई होंगे, देकर वापस न लेने वाले ‘सिर्फ चंद्रशेखर।’ स्वभाव से ही स्वाभिमानी, अक्खड़ और फक्कड़ मिजाज। ऐसे व्यक्तित्व की कमी खलती ही है, पर उन्हें जानने वालों को बीते सालों में उनकी कमी बहुत ज्यादा खली। देश, खासकर संसद और सांसदों के हालात देखकर। सर्वश्रेष्ठ सांसद वह यूं ही नहीं आंके गए थे। संसद में पक्ष-विपक्ष दो पक्ष होते हैं चंद्रशेखर सदन में तीसरा पक्ष हमेशा रहे ‘निष्पक्ष।’ अपने अंतिम वक्त तक सदन में पक्ष, विपक्ष को हड़का लेने की हैसियत हमेशा रही भारतीय राजनीति के इस अजातशत्रु की। सरकारों में भले न रहे, असरदार हर दल की सरकार में रहे।
आपातकाल में विरोधी नेताओं को जेल जाने के अलावा कोई चारा नहीं था। चंद्रशेखर के आगे जेल जाने के अलावा इंदिरा सरकार में मंत्री बनने का भी विकल्प था, पर उन्होंने लोकतंत्र सेनानी बन 19 महीने जेल जाना कबूल किया। कांग्रेस के संगठन चुनाव में इंदिरा ने उन्हें चुनाव न लड़, मनोनीत हो सर्वोच्च समिति में आने का प्रस्ताव दिया पर लीक से हटकर ‘युवा तुर्क’ चुनाव लड़े और सर्वाधिक मतों से जीते भी। इस चुनाव में युवा शरद पवार उनके चुनाव प्रबंधक थे। शिष्य वह आचार्य नरेन्द्र देव के थे और आम धारणा के विपरीत ना तो वह जय प्रकाश नारायण से राजनीतिक तौर पर सहमत थे, न ही उनके राजनीतिक शिष्य थे, पर दोनों के लिए उनके मन में हमेशा सम्मान रहा और दोनों ने उन्हें उत्तराधिकार का आशीर्वाद दिया। वह गांधीनिष्ठ समाजवादी थे और नेहरू जी से प्रभावित भी। उनका सम्मान सशर्त या मौका परस्त कभी नहीं रहा। इंदिरा शासन काल में जेल जाने के बावजूद उनके व इंदिरा के मन में परस्पर स्नेह व सम्मान भाव रहा। चंद्रशेखर ने तो जेपी की लोकसत्ता और इंदिरा की राजसत्ता के बीच देश हित में पुल बनाने का असफल प्रयास भी किया। आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार में सर्वोच्च नेताओं ने जब इंदिरा से बेअदबी की तो आप इंदिरा जी के सम्मान में अपने दल के शीर्ष नेताओं से भिडने से पीछे नहीं हटे।
पसंद नापसंद से अलग, जनमत से चुनी सरकारों में उनका विश्वास ताउम्र कायम रहा और राजनीतिक छुआछूत के वह कभी समर्थक नहीं रहे। भारतीय जनता पार्टी के नजरिए से उनकी असहमति जग जाहिर थी पर अटल , भैरों सिंह , नानाजी देशमुख जैसे अनेक भाजपा नेताओं से उनकी घनिष्ठता भी। इन्हीं सम्बन्धों और समझ के कारण जहां उनकी अल्पमत की सरकार ने ठंडे पानी का काम कर कुछ ही दिनों में देश भर में लगी मंडल कमंडल की आग बुझाई वहीं 1-3 महीनों में ही रामजन्म भूमि-बाबरी मजिस्द विवाद के समाधान के बेहद करीब पहुंच गई। उससे पहले सरकार चली गई।
जनता से जुड़ना और जुड़े रहना उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति थी। कोई आश्चर्य नहीं की राष्ट्रीय स्तर के नेता होने के बावजूद बिना साधन वह 1983 में कन्याकुमारी से दिल्ली तक पदयात्रा पर निकल पड़े। किसी के भी फैसले हमेशा सही हों या किसी मुद्दे पर मत भिन्नता ना हो यह संभव नहीं पर अनिर्णय उनका अवगुण कभी नहीं रहा। बतौर प्रधानमंत्री आतंकवाद ग्रस्त पंजाब में चुनाव बहाली और अलगाववादियों के खिलाफ असम में ‘आॅपरेशन बजरंग’ के फैसले में उन्होंने समय नहीं गंवाया। एक निष्ठावान सच्चे राजनेता की तरह उन्होंने कई मुद्दों और मौकों पर अलोकप्रिय रुख देशहित में अख्तियार किया और कीमत चुकाई। बाद में बहुत बार उनकी दूरदर्शिता और जमीनी समझ की पुष्टि वक्त ने की पर फौरी तौर पर उन्होंने हमेशा घाटा ही उठाया। सहर्ष! कुछ लोग अपनी छवि के प्रचार में देश हित पीछे रख देते हैं, कुछ देशहित में अपनी छवि को। चंद्रशेखर दूसरे प्रकार के नेता थे!
अलगाववाद और हिंसा के खिलाफ स्वर्ण मंदिर पर हुए ‘आॅपरेशन ब्लू स्टार’ से असहमति के कारण उन्हें खालिस्तानी तक बताया गया। बोफोर्स को एक इंस्पेक्टर स्तर का मामला बताने को वीपी सिंह से उनके व्यक्तिगत विरोध से जोड़ा गया व जगमोहन को कश्मीर का राज्यपाल ना बनाने के उनके सुझाव की अनदेखी की गई। हवाला आरोपियों को फैसले से पहले दोषी न मानने की संसद में उनकी वकालत को भ्रष्टाचार समर्थन बताया गया। कई विवादित व्यक्तित्वों से अपने संबंधों से उनका किनारा ना करना उनकी सहजता, पारदर्शिता, ईमानदारी नहीं हठधर्मिता माना गया। दूसरी सरकारों के खड़े किए वित्तीय असंतुलन और विदेशी मुद्रा भुगतान संकट निवारण हेतु जब्त सोने को भी गिरवी रखे जाने के उनकी सरकार के फैसले ने बेवजह उन्हें बदनाम ही किया पर वह पीछे नहीं हटे। प्रचार की भूख और पाखंड की बीमारी उनमें कभी नहीं रही। इसीलिए पाक अधिकृत कश्मीर से आतंकवादियों के बंधकों को उन्होंने चुपचाप दृढ़ता से बिना लेनदेन छुड़ा लिया और कुवैत संकट में सवा लाख भारतीयों को घर लाना संभव हो पाया। बगैर किसी पद पर रहे सीधे प्रधानमंत्री बनने से उनके अनुभव को लेकर आशंकित अधिकारी भी उनके कार्यकाल में उनके मुरीद हुए। अपनी सरकार बनने पर आम परंपरा के विपरीत उन्होंने कोई बड़ा बदलाव नौकरशाही में नहीं किया। उनका मानना था अधिकारी पार्टियों की सरकारों के नहीं देश के हैं।
पहलगाम प्रकरण में हम कोई खास अंतरराष्ट्रीय समर्थन आज नहीं जुटा पाए। पड़ोसी देश भी दूर ही दिखे। चंद्रशेखर ने अपने छोटे से कार्यकाल में पाकिस्तान से व्यावहारिक ताल मेल कर उसे ही अपने पाले में कर लिया था, ऐसा तत्कालीन विदेश सचिव मुचकुन्द दुबे लिखते हैं। ईरान-इस्राइल झगड़े पर जहां हम आज अनिणर्य में रहे वहीं अल्पमत की अल्पकालिक चंद्रशेखर सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों के फैसले का सम्मान करते हुए गैर युद्धक अमेरिकी विमानों को जहां ईंधन उपलब्ध कराया वहीं अपने मित्र राष्ट्र इराक को मानवीय आधार पर दवाई व खाद्य सामग्री उपलब्ध करा मित्रता धर्म का भी पालन कर संतुलन साध लिया था। यही कारण है कि बेहद सौम्य, सज्जन, विद्वान तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमन जो शुरुआत में आशंकित थे, अपनी किताब में चंद्रशेखरको श्रेष्ठ प्रधानमन्त्रियों में गिनते हैं।
आज विभाजन और कटुता की गला काट राजनीति के दौर में यह सोचना भी मुश्किल है कि बहुत वक्त नहीं गुजरा देश में ऐसा भी राजनेता हुआ, जिसने अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए राजनीतिक कर्मियों की पौध को तराशा, खाद पानी दिया। ऐसे नेता तैयार किए जो भिन्न-भिन्न दलों में आज बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर रहे हैं। देश हित में चंद्रशेखर ने अपने को मिटाकर भी राजनीति की खाइयों को पाटने का काम हमेशा किया। ‘चंद्रशेखर के अपने’ इन खाईयों को गहरा होने से रोकने का काम तो कर ही सकते हैं।

