Wednesday, March 25, 2026
- Advertisement -

बिगड़ रही बच्चों की मेंटल हेल्थ

Samvad 52


Shambhu Sumanभारत में हर दूसरे—तीसरे बच्चे को मेटा के फेसबुक और इंस्टाग्राम की जबरदस्त लत लग चुकी है। रील्स, सेल्फी, लाइव, डेटिंग, लाइक, शेयर, वीडियो कॉलिंग आदि में वे बुरी तरह इंगेज हो चुके हैं। उनका मानसिक स्वास्थ्य तेजी से बदलने—बिगड़ने लगा है। इसके छद्मी दुष्प्रभाव की चिंता किसी को नहीं है। न समाज का और न सरकार को, और न ही इंटरनेट मीडिया के बाजार में गलाकाट प्रतिस्पर्धा करती बाहरी कंपनियों को। जबकि अमेरिका के 41 राज्यों ने मेटा पर बच्चों को अडिक्ट बनाने का आरोप लगाकर मुकदमा ठोक दिया है। सवाल है इससे निपटने की पहल करने से हम बेखबर क्यों हैं? नए जमाने के इस तकनीकी बदलाव के साइड इफेक्ट से पैरेंट्स की बढ़ती बेचैनी का समाधान कैसे निकाला जाना चाहिए? इसकी आड़ में साइबर क्राइम को निरंकुश होने से कैसे रोका जा सकता है?
इंटरनेट, इंस्टा, एफबी, रिल्स, वायरल, शेयर, अपलोड, डेटा, लाइव, लाइक, सब्सक्राइब, अपलोड जैसे शब्द इन दिनों बच्चों की जुबान पर आम हो चुके हैं। चाहे वे महानगर, नगर, कस्बाई या फिर गांव के ही क्यों हों। मोबइाल पर उनकी नजरें एकाग्रता के साथ गड़ी होने का मतलब है वे इंगेज हैं। उनकी ये इंगेजमेंट उन बातों में है, जिसे अभी—अभी किसी कंटेंट डेवलपर, यूट्यूबर या इंटरनेट मीडिया ने क्रिएट किया है। ये रिल्स के डेढ़ मिनट वाले वीडियो, लाइव के सीन, वीडियो कॉलिंग या ग्रुप में खेले जाने वाले गेम्स हो सकते हैं। इनसे किशोरों में ऐसी लत लग चुकी है, जिससे उनका मेंटल हेल्थ तेजी से प्रभावित हो रहा है। इनके साथ—साथ दूसरी समस्याएं भी जुड़ गई हैं। उनकी न केवल मेधा क्षमता, बौधिकता, कौशलता और सीखने—समझने की नैसर्गिक क्षमता प्रभावित हो रही है, बल्कि मस्तिष्क में एक साथ घुसपैठ करने वाली बातें उसकी नसों को जैसे—तैसे तोड़ने—मरोड़ने लगी हैं। सहज संवेदनशीलता का मनोविज्ञान बिगड़ने से भी नहीं बच पाया है। यह सब छद्म रूप से माता—पिता को भी चिंता में डाल दिया है।

इंटरनेट से डिजिटल हो चुकी जिंदगी में टेक्नोलॉजी से मिली सहुलियतें कई रूप में दखल दे चुकी हैं, लेकिन इसके बेजा इस्तेमाल में हम चूकने भी लगे हैं। इसने बच्चों को तेजी से अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सातवीं—आठवीं कक्षा के बच्चे तक इसकी जद में आ चुके हैं। उनके लिए अब पढ़े और सुने जानेवाले कंटेंट से कहीं अधिक देखे जाने वाले कंटेंट महत्वपूर्ण हो गए हैं। मेट्रो में कान्वेंट के वे बच्चे एआई जनित चैटजीपीटी और बार्डएआई का उपयोग होमवर्क के लिए करने लगे हैं। ऐसा कर वे घर—परिवार और दोस्तों के बीच अपनी डिजिटल स्मार्टनेस की चर्चा से फूले नहीं समाते हैं। कुछ नया करने की जिद में ग्रामीण बच्चों के लिए कंटेंट क्रिएशन रेडीमेड होने के साथ—साथ मनोरंजक भी बन गया है। जबकि इनसे काफी हद तक उनकी रचनात्मकता और अभ्यास प्रभावित हो गया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि उनकी मेधाशक्ति और याद्दाश्त की स्वाभाविक क्षमता कुंद होने जैसी स्थति में कब आ जाए इसका वे अंदाजा ही नहीं लगा पा रहे हैं। यानी मेटा ने अपने उत्पादों के जरिए ऐसी ललक पैदा कर दी है, जिससे दिमाग में तीब्रता से उत्तेजना बढ़ाने और एक झटके में ही शिथिल करने जैसे दुष्प्रभाव की घुसपैठ हो गई है। यह स्थिति भारतीय परिवार और समाज समेत विकसित देशों की भी है। अगर इनसे कोई बेखबर है, तो एप्स, वेबसाइटें, कंटेंट क्रिएटर, एआई की सुविधाओं से लैस सॉफ्टवेयर और विभिन्न तरह गजेट्स आदि की कंपिनियां, जिसके जरिए इंटरनेट मीडिया की पैकेजिंग की गई है।

मेटा में दर्जनों कंपनियों की भागीदारी है। सभी अपने—अपने व्यावसायिक लाभ से जुड़े हैं। करोड़ों के इन्वेस्टमेंट कर उनकी नजर मुनाफे पर है। उन्होंने युवाओं समेत बच्चों को जिस तरह से टार्गेट किया है, वही उनके अडिक्ट होने का मूल कारण भी है, जो एक डिजिटल चुनौती बनकर सामाने आया है। मेटा के प्रोडक्ट बच्चों को कई स्तर से प्रभावित करते हैं। उदाहरण के तौर पर शुरूआत रील्स बनाने से होती है और वे इसे लेकर आतिउत्साह से भरे होते हैं। लाइक, शेयर और फॉलो करने की अति महत्वाकांक्षा के साथ इसे बारबार चेक करने लगते हैं। कई बार तो इसकी बारंबारता इंटरनेट की लेटेंसी रेट से भी अधिक हो जाती है। यहीं से उसके दिमाग का रसायन असंतुलित होकर शरीर के दूसरे अंगों को भी अपनी चपेट में ले लेता है, और तब डिप्रेशन से लेकर अराजक हलचल पैदा करने वाली मन:स्थिति बन जाती है।

सवाल है कि इससे निपटने की किसकी कैसी तैयारी है? जबकि अमेरिका में मानसिक स्वास्थ्य संकट का हवाला देते हुए मेटा पर तीन दर्जन से अधिक मुकदमे दर्ज किए जा चुके हैं। आॅकलैंड, कैलिफोर्निया की संघीय अदालत में दायर किए गए शिकायत में कैलिफोर्निया और इलिनोइस सहित सभी राज्यों ने आरोप लगाया है कि फेसबुक और वीडियो—फोटो प्लेटफार्म इंस्टाग्राम की पेरेंट कंपनी मेटा ने इनके महत्वपूर्ण खतरों के बारे में लोगों को बार-बार गुमराह किया है। उसने जानबूझकर छोटे बच्चों और किशोरों को लत लगाई है और सोशल मीडिया को अनिवार्य और उपयोग साबित किया है। यह शिकायत वाकायदा रिसर्च के बाद की गई है, जिसमें कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म के उपयोग से अवसाद, चिंता, अनिद्रा, शिक्षा और दैनिक जीवन में हस्तक्षेप के अलावा कई अन्य नकारात्मक परिणामों के नतीजे जुड़े हैं। हालांकि इससे पहले भी मेटा पर कई देशों में कानूनी कार्रवाई की है, लेकिन यह मुकदमा नया है, जिसमें बच्चों के मिजाज को बदलने का सीधा आरोप है। उल्लेखनीय है कि बाइटडांस का टिकटॉक और गूगल के यूट्यूब पर भी सोशल मीडिया की लत के बारे में बच्चों और स्कूल की ओर से सैकड़ों मुकदमे दायर किए जा चुके हैं।

भारत के संदर्भ में इस समस्या को लेकर कोई पहल नहीं की गई है, जबकि दूसरी तरफ बच्चों में इंटरनेट मीडिया इस्तेमाल करने की किसी भी तरह की कोई पाबंदी नहीं है। यह उसके, पैरेंट्स और स्कूल प्रशासन के स्वविवेक पर निर्भर करता है कि मेटे का किस तरह से कितना प्रयोग में लाए। सरकार की आरे से भी मेटा के खिलाफ आवाज उठाने की कोई पहल नहीं की गई है।


janwani address 7

spot_imgspot_img

Subscribe

Related articles

Gold Silver Price Today: सर्राफा बाजार में नरमी, सोना ₹2,360 और चांदी ₹9,050 तक टूटी

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी तनाव...

Delhi Budget 2026: सीएम रेखा गुप्ता ने पेश किया ‘हरित बजट’, विकास और पर्यावरण में संतुलन पर जोर

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा की कार्यवाही मंगलवार...

Share Market: शेयर बाजार में तेजी का रंग, सेंसेक्स 1,516 अंक उछला, निफ्टी 22,899 पार

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार मंगलवार को...

LPG Rate Today: एलपीजी सिलिंडर के आज के रेट, सप्लाई संकट के बीच क्या बढ़ेंगे दाम?

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: देशभर में घरेलू और कमर्शियल...

Delhi Bomb Threat: दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष को बम धमकी, CM और केंद्रीय नेताओं के नाम भी शामिल

जनवाणी ब्यूरो | नई दिल्ली: दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता...
spot_imgspot_img