Wednesday, March 25, 2026
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जानिए, क्या है अनिवार्य मतदान विधेयक -2022 ? पढ़िए- पूरी जानकारी

जनवाणी ब्यूरो |

नई दिल्ली: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनिवार्य मतदान विधेयक -2022 पर संविधान के अनुच्छेद 117 के तहत विचार करने की अनुशंसा कर दी है। भाजपा सांसद दीपक प्रकाश ने 22 जुलाई को इस बिल को निजी सदस्य विधेयक के तौर पर पेश किया था। इस निजी विधेयक के वित्तीय प्रभाव की वजह से सदन को विचार करने और पारित करने से पहले राष्ट्रपति की संवैधानिक मंजूरी जरूरी थी। जो संविधान के अनुच्छेद-117 के तहत वित्तीय विधेयकों के संबंध में विशेष प्रावधानों से संबंधित है। अब इस बिल पर आने वाले शीतकालीन सत्र में चर्चा हो सकती है।

अनिवार्य मतदान विधेयक -2022 क्या है? इसमें वोट नहीं डालने पर किस तरह की सजा का प्रस्ताव है? जो लगातार वोट देंगे उनके लिए क्या किसी तरह के प्रोत्साहन का भी प्रस्ताव है? इससे पहले कितनी बार इस तरह का बिल पेश हो चुका है? पहले आए बिल का क्या हुआ? पहली बार इस तरह का बिल कौन लेकर आया था?

अनिवार्य मतदान विधेयक -2022 क्या है?

झारखंड भाजपा के अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने 22 जुलाई 2022 को ये निजी विधेयक पेश किया। प्रकाश कहते हैं कि बहुत से प्रयासों के बाद देश में 60 फीसदी से ज्यादा मतदान नहीं होता है। दुनियाभर में ऑस्ट्रेलिया, मेक्सिको, यूनान जैसे कई देश हैं जहां मतदाताओं के लिए मतदान करना अनिवार्य है। प्रकाश के इस बिल में वोट नहीं डालने पर सजा तो लगातार वोट डालने पर प्रोत्साहन का प्रस्ताव है।

क्या इससे पहले भी इस तरह का बिल पेश हो चुका है?

इससे पहले 12 जुलाई 2019 को भाजपा के ही सांसद जनार्दन सिंह सिग्रीवाल ने भी अनिवार्य मतदान विधेयक-2019 बिल पेश किया था। हालांकि, बाद में उन्होंने ये निजी बिल वापस ले लिया था। सिग्रीवाल ने ये तब वापस लिया जब केंद्र सरकार ने कहा इस तरह के प्रावधानों को लागू करना व्यवहारिक नहीं है। उस वक्त के कानून राज्य मंत्री ने इसे लोकतंत्र की भावना के खिलाफ बताया था। इससे पहले भी इस तरह के 16 निजी बिल लोकसभा या राज्यसभा में पेश हो चुके हैं। सभी या तो वापस ले लिए गए या फिर पास नहीं हो सके। दीपक प्रकाश का ये बिल इस तरह का 17वां बिल है।

इस तरह का सबसे पहले बिल 1998 में आया था। उस वक्त के कांग्रेस सांसद टी. सुब्बारामी रेड्डी ने इसे पेश किया था।

क्या था 1998 में पहली बार लाए गए अनिवार्य मतदान विधेयक में?

1998 में पहली बार किसी सांसद ने सदन में अनिवार्य मतदान का निजी विधेयक पेश किया। इस विधेयक को कांग्रेस सांसद टी. सुब्बारामी रेड्डी लेकर आए थे। उस वक्त ईवीएम की जगह बैलट पेपर से मतदान होता था। इस बिल में प्रस्ताव था कि चुनाव आयोग हर चुनाव क्षेत्र में मोबाइल बैलेट वैन की व्यवस्था करेगा। इसमें उन लोगों को वोट डालने की सुविधा होगी जो पोलिंग बूथ पर जाकर वोट डालने की स्थिति में नहीं हैं।

इस बिल में भी वोट नहीं डालने पर सजा और डालने पर प्रोत्साहन का प्रस्ताव था। उस प्रस्ताव में वोट नहीं डालने वाले पर सौ रुपये का जुर्माने या एक दिन की जेल का प्रस्ताव था। अगर जानबूझकर वोट नहीं डाला गया हो तो ऐसे वोटर को दोनों सजाओं का प्रस्ताव था। इसके साथ ही राशन कार्ड जब्त करने, छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने का प्रस्ताव इस बिल में था। अगर वोटर सरकारी कर्मचारी है तो उसे इन सजाओं के साथ ही चार दिन का वेतन काटने और एक साल तक प्रमोशन नहीं देने की सजा का भी प्रस्ताव था।

इस बार पेश किए गए बिल में पहले बिल से कितने अलग प्रस्ताव हैं?

1998 में पेश किए बिल की तरह ही इस बार के बिल में भी मतदान नहीं करने पर वैसी ही सजाओं के प्रस्ताव है। बस उनकी अवधि और मात्रा में इजाफा कर दिया गया है। जैसे- 1998 के बिल में 100 रुपये के जुर्माने का प्रस्ताव था तो इस बिल में 500 रुपये जुर्माने का प्रस्ताव है। 1998 के बिल में एक दिन जेल की बात थी तो इस बिल में दो दिन जेल की बात है। इसी तरह सरकारी कर्मचारियों चार की जगह दस दिन के वेतन काटने और एक की जगह दो साल तक प्रमोशन नहीं करने की सजा की बात है। 1998 में जहां छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने की बात थी। इस बार के बिल में 10 साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराने की बात है।

लगातार वोट देने वालों को क्या कोई प्रोत्साहन भी देने की बात है?

दीपक प्रकाश द्वारा पेश इस बिल के मुताबिक अगर कोई वोटर बिमारी या शारीरिक अक्षमता के बाद भी वोट करता है। कोई वोटर अगर लगातार 15 साल तक सभी चुनावों में वोट डालता है, ऐसे वोटर को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में वरीयता दी जाए।

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