वीरेन्द्र कुमार पैन्यूली
ब्राजील के अमेजोनियन पोर्ट बेलेम में 10 से 21 नवम्बर 2025 तक जलवायु परिवर्तन पर कॉप 30 यानि कॉन्फ्रेन्स आॅफ द पार्टीज का आयोजन हुआ था। सवाल है कि उससे क्या हासिल हुआ? इस पर लगभग सभी की एक ही राय बनी कि जलवायु दंशों से राहत और पर्यावरणीय न्याय पाना कमजोर और वंचितों के लिये अभी भी मुश्किल है। अभी तो केवल उस सड़क के नक्शे की बात हो रही है, जिससे यहां तक पहुंचा जा सकेगा, पर ये भी तब होगा जब उस पर चलने के लिये सभी प्रभावशाली देश तैयार हों।
निराशा का भाव ज्यादा इसलिये साल रहा है क्योंकि कॉप 30 को बड़े-बड़े विशेषणों से अंलकृत किया गया था, किन्तु नतीजे वही ढाक के तीन पात रहे। इसे कार्यान्वयन कॉप घोषित किया गया था। आशा थी कि जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) का उपयोग कम होने और वित्ते विषयों के लम्बित मामलों पर गंभीर कार्यकारी निर्णय लिये जायेंगे, किन्तु ऐसा नहीं हुआ।
पेट्रो-देशों व तेल-लॉबिस्टों के दबावों के चलते अंतिम दस्तावेज में फॉसिल फ्यूल को नहीं आने दिया गया। हालांकि दो साल पहले कॉप 28 में जीवाश्म ईंधन से हटना व इससे दूरी बनाये रखना तय हो चुका था, परन्तु कॉप 30 ने इस सहमति को भी ढुलमुल कर दिया। इसमें यह तय ही नहीं हुआ कि कैसे जीवाश्म ईंधनों से छुटकारा पाते हुये हरित ऊर्जा अपनाई जाये। निर्धारित दो सप्ताह के भीतर जब ठोस रूप से कुछ हासिल होता न दिखा, तो कुछ देश आक्रोशित हो गये, पर इसका सकारात्मक पहलू यह भी रहा कि देशों के एक बड़े समूह ने अपने आप ही फॉसिल फ्यूल से धीरे-धीरे मुक्त होना तय कर लिया। वे एक सम्मेलन भी करने जा रहे हैं कि कैसे जीवाश्म ईंधन को समाप्त किया जाये।
कॉप 30 से उम्मीदें होना स्वाभाविक था क्योंकि अवसर 2015 के पेरिस समझौते के एक दशक पूरा होने का भी था, किन्तु पहले दिन ही ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डिसिल्वा का आह्वान था कि मानव की निर्भरता जंगलों को काटने व फॉसिल फ्यूल पर कैसे कम हो इसके लिए रोडमैप तैयार किया जाए। इससे साफ था कि जीवाश्म ईंधन को खत्म करने या उससे दूरी बनाने की प्राथमिकता इस सम्मेलन में नहीं रहेगी। अंतत: कॉप 30 में तेल के कम उपयोग पर कोई आगे बढ़ने वाला निर्णय नहीं हुआ। कॉप 30 का आचरण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप जैसा ही रहा जिसमें जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक तथ्यों को नकारा जाता है। फॉसिल फ्यूल को चलते रहने दो, जैसे धरती इनके उत्सर्जनों से गर्म ही नहीं हो रही है, जबकि पेरिस समझौते की डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की सीमा साफ टूटती दिख रही है। हर साल पिछले से ज्यादा गरम होता है।
कॉप 30 के अध्यक्ष राजदूत आंद्रे कोर्रिये दो लागो ने कहा कि मेजबान देश ब्राजील के राष्ट्रपति, अन्य देशों की नागरिक संस्थाओं, वैज्ञानिकों, ऊर्जा विशेषज्ञों आदि से बात कर कॉप 31 में प्रस्तुत करेंगे कि न्यायिक तरीकों से हरित ऊर्जा अपनाकर फॉसिल फ्यूल से कैसे दूर हुआ जा सके। उनका कहना था कि फॉसिल फ्यूल से दूर जाने के रोडमैप के अलावा एक दूसरा रोडमैप भी होगा जो वन-निर्मूलन को रोकने का ही नहीं, बल्कि विपरित दिशा में मोड़ने का तरीका बताएगा। हालांकि अस्सी देश तो इस पर दबाव बना रहे थे कि फॉसिल फ्यूल से दूर जाने का रोडमैप बनाइये, पर स्वयं ब्राजील में इसके विपरीत था। अमेजन वन जिन दुर्दशाओं व पतन से गुजरे हैं वह जगजाहिर है। तेल के लिए वहीं उत्खनन हो रहा है और उसे बैंक सहायता भी ऐन कॉप 30 शुरू होने के पहले दी गई।
वित्त की बात करें तो 2009 में कोपेनहेगन में धनी देशों ने हर साल सौ अरब डालर देने का कहा था। कॉप 26 ग्लासगो में भी ऐडेप्टशन फंड देने की बात की गई थी। कॉप 30 में मल्टीलेट्रल डेवलेपमेंट बैंकों ने पहले ही दिन कहा कि अनुकूलन वित्त 2035 तक तिगुना कर दिया जाएगा। संवेदित होने के लिए फिर से याद कर लेते हैं कि कॉप 27 के समापन के 24 घंटे पहले तक भी कोष के मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई थी।
इन परिप्रेक्ष्यों में सहमति तक पहुंचने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश की ये चेतावनियां भी काम नहीं आईं कि उत्तर और दक्षिण तथा विकसित व विकासशील आर्थिकीयों के लिए एक-दूसरे पर आरोप लगाने का यह उपयुक्त समय नहीं है। ऐसे में विनाश निश्चित है। उनका कहना था कि हम उन देशों को पर्यावरण न्याय से वंचित नहीं कर सकते, जिनकी इस जलवायु आपदा लाने में कोई भूमिका नहीं रही है।
गुटेरेश का आशय सबसे कम विकसित और द्वीपीय देशों से भी था जिनकी जलवायु आपदा बढ़ाने में सबसे कम भूमिका है, किंतु जो जलवायु आपदा की मार सबसे ज्यादा झेलते हैं। लगभग तीन वर्ष पूर्व जलवायु परिवर्तन के आघातों के संदर्भ में 55 कमजोर देशों पर निकली रिपोर्ट में कहा गया था कि पिछले दो दशकों में जलवायु आपदाओं में इन देशों की लगभग 525 अरब डालर की हानि हुई थी। यह उनके तब के सम्मलित जीडीपी का लगभग 20 प्रतिशत था।
अरब से ज्यादा जनता जीवाश्म ईंधनों से चलने वाले प्रोजेक्टों के नजदीक रहती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार इससे पांच किलोमीटर के दायरे में लोगों का स्वास्थ्य खराब हो रहा है व ईको-सिस्टम पर असर पड़ रहा है। कोयला, गैस, तेल के 18,300 से ज्यादा प्रोजेक्ट उन 170 देशों में चल रहे हैं जहां फॉसिल फ्यूल का उपयोग कम नहीं हो रहा है, बल्कि 2030 तक अपने चरम पर पहुंच जायेगा।
अंत में कॉप 30 के रोडमैप से सवाल कि ये किधर जाने का रोडमैप होगा झ्र डेढ़ डिग्री सेल्सियस से कम रहने का या ढाई डिग्री सेल्सियस को फांदने का। निष्कर्ष वही-ढाक के तीन पात। विकासशील व गरीब देश जरूर ये आरोप लगाते रहें कि धनी देशों ने जो ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन वायुमण्डल व अन्यत्र जमा कर दिया है उसके परिणाम वे भुगत रहे हैं, परन्तु अब नव-धनाड्य होते देश भी तो कुछ भिन्न नहीं कर रहे। भारत, ब्राजील, चीन भी इसमें अपवाद नहीं हैं।

