Thursday, February 12, 2026
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साहस और मुक्ति

SAMVADबुद्ध एक गांव में ठहरे थे। उस राज्य के राजा का बड़ा प्रसिद्ध हाथी था, जो बूढ़ा हो चला था। उसने बड़े बड़े युद्ध लड़े और जीते थे। एक दिन हाथी तालाब पर पानी पीने गया और कीचड़ में फंस गया। बूढ़ा हो गया था, जितनी चेष्टा करता उतना कीचड़ में फंसता जाता। राज महल खबर पहुंची। उस हाथी का जो बूढ़ा महावत था वह तो कभी का अवकाश-प्राप्त हो गया था।

नए महावत भेजे गए, उन्होंने उसे बड़े बड़े भालों आदि से चुभा कर , निकालने की कोशिश की लेकिन हाथी तो वैसे ही बूढ़ा था, इनकी चोट और मार पीट में और शिथिल हो, मरणासन्न हो गया। इतना साहसी हाथी, इस छोटी सी कीचड़ से नहीं निकल पा रहा है? उसकी आंख से आंसू बह रहे हैं। राजा भी बहुत दुखी हो गया। राजा ने हाथी के पुराने महावत को यह सोच कर बुलाने का आदेश दिया कि शायद उसे कुछ राज पता हो। वह बूढ़ा महावत आया।

बुद्ध के शिष्य भी इकट्ठे हो गए वहां। वह हंसा, और उसने कहा, यह क्या कर रहे हो? उसे मार डालोगे? हटो। और उसने कहा युद्ध का नगाड़ा बजाओ। उसने किनारे पर रखकर युद्ध का नगाड़ा बजवाया। युद्ध का नगाड़ा बजना था कि हाथी एक छलांग में बाहर आ गया। एक क्षण की देर न लगी। वह भूल गया कि मैं बूढ़ा हूं, कमजोर हूं। हाथी फिर जवान हो गया।

बुद्ध के शिष्यों ने आकर बुद्ध को कहा, भगवान एक अभूतपूर्व चमत्कार देखा। बुद्ध ने कहा, अभूतपूर्व कुछ भी नहीं है। तुममें से भी मेरी पुकार सुनकर वे ही निकल पाएंगे, जो सूरमा हैं। यही तो मैं भी कर रहा हूं नासमझों! तुम कीचड़ में फंसे हो और मैं रणभेरी बजा रहा हूं। तुममें से जो हिम्मतवर हैं, जिनमें थोड़ी सी भी क्षमता है, साहस है, वे इस जीवन रूपी कीचड़ से निकल आएंगे।
                                                                                               प्रस्तुति : राजेंद्र कुमार शर्मा


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