अरविंद कुमार संभव
पिछले कुछ वर्षों से देश में एक एजेंडा सा चल रहा है कि यहां वृहद स्तर पर बहुसंख्यक दलित कमजोर वर्गों का उत्पीड़न किया जा रहा है और उत्पीड़क लोग अल्पसंख्यक सवर्ण समाज से हैं। यह सबकुछ एक टूल किट का हिस्सा जैसा लगता है जिसे समाजवाद और संविधान वाद का कंबल ओढ़ा कर छुपाया जा रहा प्रतीत हो रहा है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि देश में कमजोर वर्गों को मजबूत वर्गों द्वारा परेशान करने की परंपरा रही है।
किंतु अब पहले के कमजोर वर्ग और ताकतवर वर्ग ने अपना स्थान बदल लिया है और जो वर्ग पहले राजनीतिक, आर्थिक तथा शैक्षणिक रूप से अधिक प्रबल थे वे अब मैदान से बाहर हो गये हैं और पहले के कमजोर वर्ग अब संविधान की सहायता से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक रूप से मजबूत होकर मैदान पर काबिज हो चुके हैं। ऐसे में उत्पीड़न का शोर मचाना बहुत ज्यादा कारगर नहीं है। आज पंचायत से लेकर संसद-राष्ट्रपति भवन तक लगभग सत्तर प्रतिशत स्थान इन्हीं तथाकथित कमजोर वर्गों ने घेर रखा है।
सरकारी नौकरियों में पचास से लेकर सत्तर फीसदी आरक्षण इस वर्ग को सुलभ है। इनके समर्थन में ढ़ेरों कानून बने हुए हैं। सरकारी योजनाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा इनके कल्याणार्थ खर्च किया जा रहा है। एक बड़े हिस्से को मुफ़्त राशन, शिक्षा, इलाज सरकार की तरफ से उपलब्ध है ।
देश में हत्या, अपहरण, बलात्कार की प्रतिदिन दर्ज़नो घटनाएं होती हैं। इनको दलित और गैर-दलित में वर्गीकृत करके जातीय चश्मे से देखना समाज, सरकार, मीडिया और न्यायपालिका चारों के लिए शर्मनाक है लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा ही हो रहा है। सोशल मीडिया के जमाने में अत्याचारों के झूठे वीडियो और समाचार गढ़ कर देश की बदनामी करना भी आम हो गया है। खुले आम विभिन्न सामाजिक धार्मिक वर्ग एक दूसरे के पूज्य प्रतीक चिह्नों पर अभद्र टिप्पणी करके देश का माहौल खराब करने में लगे हुए हैं किंतु राजनीतिक फायदा नुकसान देखकर ही सरकार और न्यायपालिका इन सब पर कार्यवाही करने की सोचती है।
आजकल एक रिवाज सा हो गया है कि अच्छा भला संपन्न एक वर्ग अपने आपको पीड़ित और दलित बतलाते हुए कानून का मजाक बनाकर सुविधाएं प्राप्त करना चाहता है। अब के ट्रेंड में ये कथित दलित वर्ग अपने साथ में ओबीसी की जातियों को भी यह कह कर जोड़ लेते हैं कि उनके साथ भी सवर्णों ने अत्याचार किया है। वह यह भूल जाते हैं कि 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने से पहले तक ये ओबीसी वर्ग सामान्य वर्ग का ही हिस्सा था। आरक्षण उन्हें दलित और पीड़ित होने के नाते नहीं अपितु सामाजिक आर्थिक शैक्षणिक जीवन स्तर ऊपर उठाने के लिए दिया गया था जैसे की ईडब्ल्यूएस को बाद में जाकर दिया गया है।
भारत में आजादी के बाद से दलित शब्द अनुसूचित जाति वर्ग ने अपने साथ जोड़ लिया है। ठीक है कि अतीत में उनकी बहुत शिकायतें रही हैं चतुर्वर्ण व्यवस्था से और संविधान ने उसकी क्षतिपूर्ति की भी व्यवस्था की है। लेकिन यह समस्या पूरे भारत की जनसंख्या की तो नहीं है। यदि आंकड़े में देखा जाये तो कानूनी अनुसूची में वर्णित अनुसूचित जाति वर्ग की जनसंख्या देश की जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत है। इनमें से भी कुछ प्रतिशत हिस्सा बौद्ध धर्म में चला गया है जहां कि दावा किया गया है कि जातिवाद और भेदभाव नहीं है। तो देश की लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या जातिगत भेदभाव और कथित उत्पीड़न से मुक्त है और जो छोटा सा हिस्सा पीड़ित होने का दावा करता रहा है उसके संरक्षण के लिए हमारे कानूनों में बहुत ही कठोर उपाय उपलब्ध हैं।
जहां तक आदिवासियों या एसटी समुदाय का मामला है, यह समुदाय मूलत: वनवासी समाज माना गया है जिसकी एक पृथक संस्कृति और परंपराएं रही हैं। संविधान ने इन परंपराओं को सुरक्षित किया है। मूल बात यह है कि एससी समुदाय की तरह इसे किसी बड़े भेदभाव का शिकार कभी भी नहीं होना पड़ा और ये स्वतंत्र रूप से अपने संस्कार और अपनी आजीविका में व्यस्त रहे हैं। पूर्वोत्तर राज्यों, गोवा में अधिकतर और झारखंड में कुछ संख्या में इसमें ईसाई धर्मावलंबी भी शामिल हैं। भारत में इन सबकी औसत जनसंख्या लगभग 8-9 प्रतिशत है और हिंदू धर्मग्रंथों में भी इनके बारे में बड़े सम्मान से उल्लेख किया गया है।
अनुसूचित जाति वर्ग और अंबेडकर की सबसे बड़ी शिकायत अस्पृश्यता के बारे में थी जो तत्कालीन हिंदू समाज में प्रचलित थी और जिसके लिए सबसे ज्यादा दोष ब्राहमण समुदाय और उनके ग्रंथ मनुस्मृति को दिया गया था। वह मनुस्मृति जो कभी चलन में नहीं आयी और जिसे कभी भी क्षत्रिय, वैश्य और कायस्थ समुदाय ने मान्यता नहीं दी। हकीकत में तो वैश्य और कायस्थ वर्ग से तो दलित समाज को कभी कोई शिकायत ही नहीं रही।
इन लोगों ने ज्ञात इतिहास में कभी किसी वर्ग का शोषण नहीं किया। हां, वैश्य वर्ग पर ओबीसी समाज जो वैश्य वर्ग में ही आता है (किसान, व्यापारी, पशुपालक, सरकारी सेवक) को कर्ज देकर ब्याज में शोषण करने के फिल्मी आरोप लगते रहे हैं जो कहीं कहीं सत्य भी हैं। किंतु बैंकों के आ जाने के बाद से इन आरोपों में भी कोई दम नहीं रहा। क्षत्रिय समाज के जागीरदारों पर भी लगान के लिए किसानों पर ज्यादती करने के आरोप लगते थे। हां, उनके राज में कमजोर वर्गों के लिए पक्के मकान बनवाने या विवाह में घोड़ी पर चढ़ने आदि पर किसी किसी क्षेत्र में प्रतिबंध रहता था जो गाहे-बगाहे आज भी कुछ घटनाओं से पता चलता है। पर इसका हिंदू धर्म से कोई संबंध नहीं है। अस्पृश्यता निवारण के लिए सबसे बड़ा अभियान चलाने का श्रेय यदि किसी को दिया जा सकता है तो वह महात्मा गांधी, ब्रह्म समाज और आर्य समाज को जाता है।
अंबेडकर ने ब्राह्मणों और हिंदू मान्यताओं के खिलाफ काफी कुछ लिखा है किंतु यह भी याद रखना होगा कि उनकी प्रारंभिक शिक्षा और उपनाम संस्कार ब्राह्मण गुरु के द्वारा ही हुए और विदेशों में उच्च शिक्षा का प्रबंध क्षत्रिय राजाओं ने किया। स्वयं उन्होंने किसी दलित वर्ग की कन्या से विवाह नहीं करके कथित सवर्ण ब्राह्मण कन्या से विवाह किया ठीक वैसे ही जैसे आधुनिक काल में रामविलास पासवान और उदित राज जैसे स्वघोषित दलित नेताओं ने दलित कन्या की जगह सवर्ण वर्ग में विवाह किया था। ठीक वैसे ही जैसे अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव ने किया है। तो खेल मान्यताओं का नहीं है। खेल नरेटिव सैट करने और राजनीति का है। यह भी सत्य है कि अनुसूचित जाति वर्ग के विकास और कल्याण के लिए सर्वाधिक मेहनत भीमराव अम्बेडकर ने ही की थी और वह आजीवन इसके लिए कार्यरत भी रहे। अत: अनुसूचित जाति वर्ग को यह पूरा हक बनता है कि वे बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर को अपना उद्धारक और संविधान निर्माता समझें और घोषित करें ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मणों को डॉ बी एन राऊ को और कायस्थों को डा राजेन्द्र प्रसाद को संविधान निर्माण का श्रेय देने का अधिकार है।
डॉ अम्बेडकर ने अपनी शिक्षा प्राप्ति में असाधारण मेहनत की थी तथा वह भारत के सबसे अधिक शिक्षित लोगों में से एक थे। संविधान सभा में उनके द्वारा दिए गए विद्वत्ता पूर्ण तर्क़ दस्तावेजों में सुरक्षित हैं।
दलित शब्द के ऐतिहासिक संदर्भ में जाएं तो हिंदू चतुर्वर्ण व्यवस्था में मूल दलित जिन्हें शूद्र कहा गया है उनकी संख्या अन्य तीन वर्गों की तुलना में बहुत कम थी। मूल रूप से चर्मकार, सफाई कर्मी, कसाई , आखेटक और डोम ही शूद्र कहलाते थे। अस्पृश्यता की भावना केवल इनके कार्य-व्यवसाय की वजह से आयी होगी। जन्म की वजह से नहीं। इस वर्ग में अप्रत्याशित बढ़ोतरी महाभारत युद्ध के पश्चात हुई जब भारी संख्या में क्षत्रिय और ओबीसी योद्धा युद्ध में मारे गए और और उनकी स्त्रियों तथा कथित निचले वर्ग के पुरुषों के संसर्ग से उत्पन्न हुर्इं संतानों को प्रथम तीनों वर्गों ने स्वीकार करने से मना कर दिया तथा उन्हें शूद्रोतर या वर्णसंकर जातियों में पांचवें वर्ण के रूप में वर्गीकृत कर दिया।
हमारे सनातन समाज के ब्राह्मण और संत समाज को जमाने को देखते हुए अपनी पुरानी मान्यताओं में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। उन्हें यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि वे मनुस्मृति के उन पृष्ठों या श्लोकों को मान्यता नहीं देते जो इंसान और इंसान में भेद करते हों। हां, जाति व्यवस्था सनातन धर्म का आधार रही है और यह कायम रहेगी बगैर परस्पर मानवीय भेदभाव के। वैसे भी देखा जाए तो कितने ब्राह्मण अब बचे हैं, जो मनुस्मृति में उनके स्वयं के लिए लिखे गए कर्म कर रहे हैं? क्या वेदपाठ करते हैं, संध्या हवन करते हैं, धर्मग्रंथों का अध्ययन किया है, यज्ञोपवीत की मर्यादा का पालन करते हैं, व्यापार, नौकरी, मदिरा, तंबाकू, जुआं, पर-निंदा से दूर हैं, अन्य को नि:शुल्क पढ़ाते हैं, तीर्थाटन करते हैं, दोनों समय स्नान करते हैं, रुपया ब्याज पर नहीं देते हैं? यदि यह सब नहीं है तो फिर क्यों मनुस्मृति और अस्पर्शता से चिपके हुए हैं?
कभी कभी परिस्थितियों को समझने और समझाने के लिए कुछ पढ़ना और मनन करना पड़ता है जिसका आजकल चलन नहीं के बराबर है।

