Sunday, May 26, 2024
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हजारों आभासी मित्रों के बीच जानलेवा तन्हाई

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57 6चिट्ठी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहाँ तुम चले गए…इस गीत की पंक्तियों में जाने क्यों एक दर्द एक टूटन सी महसूस होती है। हाल ही में दो ऐसी घटनाएं सुनने में आर्इं जिसने झकझोर कर रख दिया। जिन्होंने सचमुच न किसी से अपना दु:ख कहा और न अपनी तकलीफ बांटी और इस दुनिया से बिना कुछ कहे-सुने चले गए। एक प्रसिद्ध न्यूज चैनल के मीडियाकर्मी जिन्होंने आत्महत्या कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली, आभासी दुनिया में जिसके सैंतीस हजार फॉलोवर्स थे। वो व्यक्ति अंदर से कितना अकेला था कि उसने इतना बड़ा कदम उठा लिया। आभासी दुनिया उसकी मृत्यु से शोक में डूब गई।

किसी ने लिखा, तुम जूझते लड़ते-झगड़ते, चीखते-चिल्लाते पर यूं हारकर मानकर खुद को खत्म कर देना सही फैसला नहीं था। किसी ने कहा कल ही तो बात हुई थी, लगा ही नहीं कि उसके अंदर इतना कुछ चल रहा था। देखने में ठीक-ठाक, एक अच्छी नौकरी एक सुनहरा भविष्य पलकें बिछाए उसका इंतजार कर रहा था, सपनों में रंग भरने की उम्र में उसने फांसी का फंदा चुना आखिर ऐसा क्या हुआ जो उसने ऐसा कदम उठाया।

दूसरी घटना एक लेखिका की हत्या की है, जो अपने ही पति के हाथों मारी गई। सच पूछिए तो आज तो उस का सिर्फ शरीर मरा था, मर तो बहुत पहले ही चुकी थी। इस घटना ने विवाह संस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मित्रों और आभासी दुनिया से एकत्र जानकारी के आधार पर तिरसठ साठ की महिला दो बच्चों की मां, नाती-पोते का सुख उठाने वाली महिला का वैवाहिक जीवन दूर से जितना सुखद दिख रहा था, शायद था नहीं। शायद इसीलिए इस रिश्ते का ये अंत हुआ।

एक लेखक न जाने कितनों की आवाज बन जाता है, पर खुद की आवाज शायद न बन सका या फिर उस आवाज को कोई सुन ही न सका…दु:खद। किसी ने कहा उसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता को पति सहन नही कर सका तो किसी ने कहा इतना लंबा दाम्पत्य जीवन बिताने के बाद अगर पति ने ऐसा कदम उठाया है तो जरूर उसकी भी गलती होगी पर गलती क्या इतनी बड़ी रही होगी कि हत्या कर दी जाए?

इस खबर ने एक बार फिर ये कहने को मजबूर कर दिया कि बेजान रिश्तों की लाश आखिर इंसान कब तक ढोएगा इंसान आखिर कब यह कहने की हिम्मत जुटा पाएगा कि उनके रिश्ते में सिसकियों के सिवा कुछ नहीं बचा है। वैवाहिक वर्षगांठ पर मुस्कुराती हुई तस्वीरों के पीछे के दर्द को आखिर हम आप कहां समझ पाए थे।

उम्र का एक लंबा सफर तय करने के बाद परिपक्वता का चोला ओढ़े इस दम्पति ने रात-दिन के कलह और झगड़ों से परेशान होकर शांति से अलग होने का विकल्प आखिर क्यों नहीं चुना। क्या हत्या करने वाले ही गुनाहगार थे। जुल्म करने वाले के साथ साथ सहने वाला भी बराबर का ही दोषी है।

देखा जाए तो आप और हम भी उतना ही दोषी हैं। हम बड़े आराम से कह देते हैं कि आज के युग मे पड़ोसी ही पड़ोसी को नहीं जानता, पर यह कहते हुए हम यह भूल जाते हैं कि हमारा भी कोई पड़ोसी है और हम भी किसी के पड़ोसी हैं। लोक-लाज और समाज के डर अथवा लिहाज से अंदर ही अंदर घुटते-रिसते रिश्तों को परिणाम इतना भयावह होगा,

शायद किसी ने सोचा होगा पर बंद खिड़कियों के पीछे बेचैन परछाइयों की तड़प को अगर हमने समझ लिया होता या फिर आगे बढ़कर खिड़कियों को खट-खटाकर उनकी बेचैनी का कारण जानने का प्रयास कर लिया होता तो शायद किसी जीवन का अंत ऐसा न होता। क्या इंसानियत के नाते एक प्रयास हमारी तरफ से नहीं होना चाहिए। क्या अपनेपन के मरहम से सहेजने में हमारी भी सहभागिता नहीं हो सकती है?

इन घटनाओं ने एक बार पुन: सोचने को विवश कर दिया है कि अब रिश्ते कितने बोझिल और संवेदनहीन हो गए। जिस पत्नी के साथ इतना लंबा समय गुजारा, उसी की हत्या कर डाली? क्या जीवन के बेहतरीन क्षणों को याद कर वह अपनी अंदर की कटुता और क्रोध पर नियंत्रण नहीं कर सकते थे। विश्वास और समपर्ण के ताने-बाने पर बने रिश्ते की पकड़ क्या इतनी कमजोर थी।

पति के इस कृत्य ने सिर्फ पति-पत्नी के रिश्ते को नहीं, परिवार नाम की व्यवस्था को भी तार-तार कर दिया है। यह घटना किसी भी रूप में माफ करने लायक नहीं है। बेहद दु:खद और निंदा करने वाली इस वीभत्स घटना की गहराई में जा कर सोचना होगा।आज भी औरत ही क्यों सहने को मजबूर है? आखिर वह क्यों नहीं साहस जुटा पाती है?आखिर यह समाज उस हंसते-खिलखिलाते चेहरे के पीछे छिपे मौन की भाषा को क्यों न पढ़ सका?

अब यह सोचना होगा कि इस भरी दुनिया में जब तक वह जिंदा रहे, हम कहां थे। आज उसकी मौत पर सब तमाशा देखने के लिए खड़े हैं। कहते हैं मरने के बाद चार कंधे तो मिल ही जाते हैं, पर जीते जी ये कंधे मिल जाते तो मरना ही क्यों पड़ता। उनके जिंदा रहते कभी किसी ने उनके कंधे पर हाथ रखकर नहीं पूछा कि तुम इतने उदास और परेशान क्यों दिखते हो।

कोई दिक्कत हो तो तुम हमसे साझा कर सकते हो तो शायद उन्हें आज इतना बड़ा कदम न उठाना पड़ता। दुनिया की नजर में भले ही यह आत्महत्या या हत्या कहलाएगी पर क्या सचमुच यह आत्महत्या या हत्या थी? उनकी तो हत्या हुई थी, इन बेगैरत और क्रूर लोगों के हाथों, जिन्होंने जीवित रहते उनसे कभी भी पलट कर नहीं पूछा कि तुम कैसे हो।

तेरह दिन तक लोग उनके दरवाजे पर मातमपुर्सी करने आते रहेंगे। सच पूछिए तो ये उन मृतकों का इस दुनिया के विरुद्ध विरोध है। मरते-मरते भी वह कह गए इस निर्लज्ज दुनिया के खिलाफ लोग काली पट्टी पहनकर विरोध करते हैं और मैं सफेद कफन पहनकर इनका विरोध करता हूं।


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