Tuesday, March 17, 2026
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अंधविश्वास की गहरी होती जड़ें

Nazariya 22


ARVIND JAY TILAKदेश के सर्वाधिक शिक्षित कहे जाने वाले राज्य केरल के कोच्चि जिले में धनवान बनने की चाहत में एक दंपति द्वारा दो महिलाओं की अलग-अलग बलि रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि जागरुकता और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद भी हमारा समाज अंधविश्वास जैसी बुराइयां से अभिशप्त है। कोच्चि पुलिस-प्रशासन की मानें तो हत्यारोपी दंपति ने तांत्रिक के कहने पर दोनों महिलाओं की बलि के अनुष्ठान को अंजाम दिया। कहा तो यह भी जा रहा है कि दंपति ने बलि के बाद महिलाओं के मांस को भी खाया। यह नृशंसता की पराकाष्ठा है। तांत्रिक ने इश्तहार देकर सार्वजनिक तौर पर दावा किया था कि वह अनुष्ठान के जरिए लोगों को आर्थिक समस्याओं से मुक्ति दिला सकता है। इसी इश्तहार को देखकर दंपत्ति तांत्रिक के झांसे में आए और दोनों महिलाओं की बलि चढ़ा दी। यह पहली बार नहीं है अंधविश्वास में आकर अपनी इच्छापूर्ति के लिए किसी मानव की बलि दी गई है। अभी गत वर्ष पहले ही बिहार राज्य के भागलपुर जिले के पीरपैंथी थाना क्षेत्र में एक व्यक्ति ने अंधविश्वास में आकर तांत्रिक के कहने पर अपनी पत्नी की सूनी कोख भरने के लिए अपने ही 11 वर्षीय भतीजे की बलि चढ़ा दी। इसी तरह उत्तर प्रदेश राज्य के सीतापुर जिले के कुसेपा दहेली गांव में एक दम्पति ने तांत्रिक की सलाह पर अपनी बच्ची की बलि चढ़ायी। आए दिन इस तरह की खबरें लोगों को विचलित करती रहती हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि देश में अंधविश्वास की जडें बेहद मजबूत हैं। नतीजा हर वर्ष हजारों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है। कभी धनवान बनने व संतान पाने के लिए बलि चढ़ायी जा रही है तो कभी डायन और भूत-प्रेत के नाम पर जान लिया जा रहा है।

अंधविश्वास से जुड़ी ऐसी अधिकतर घटनाएं शैक्षिक रुप से पिछड़े और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित क्षेत्रों में ही देखने को मिलती हैं। दरअसल ये लोग बीमारी और अस्वस्थता के अलावा संतान न होने का मूल कारण समझने के बजाए इसे भूत-प्रेत और डायन का प्रभाव मानते हैं। शैक्षिक रुप से पिछड़े व आदिवासी बहुल राज्य झारखंड की ही बात करें तो यहां अंधविश्वास की जड़ें काफी गहरी हैं। नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां 20 वर्षों में 1300 से अधिक महिलाओं को डायन के नाम पर मार डाला गया है। डायन कुप्रथा पर काम कर रही स्वयंसेवी संस्थाओं की मानें तो गांव वाले ही महिलाओं को डायन के रूप में चिंहित करते हैं और फिर मौत की नींद सुला देते हैं। चूंकि अपराधी इसलिए पकड़ में नहीं आते हैं कि इन घटनाओं को अंजाम देने में पूरा गांव शामिल होता है। लिहाजा अपराधी की पहचान कर पाना बेहद मुश्किल होता है। गत वर्ष पहले देहरादून की एक गैर सरकारी संस्था ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में तकरीबन हर साल दो सैकड़ा से अधिक महिलाओं की हत्या डायन के नाम पर होती है। लिटिगेशन एंड एनटाइटिलमेंट केंद्र के अनुसार डायन बताकर महिलाओं की हत्या के मामले में झारखंड के अलावा आंध्रपदेश, हरियाणा और उड़ीसा राज्य भी पीछे नहीं है। आंध्रप्रदेश राज्य में हर साल 30 से अधिक महिलाओं की हत्या डायन के नाम पर होती है। इसी तरह हरियाणा और उड़ीसा राज्य में 25 से 30 और 24 से 28 महिलाओं की हत्या सिर्फ अंधविश्वास और जादू-टोने के नाम पर होती है। एक आंकड़े के मुताबिक विगत डेढ़ दशकों में देश में डायन के नाम पर 2500 से अधिक महिलाओं की हत्या हो चुकी है।
एक ओर महिलाएं पंचायतों से लेकर संसद और विधानसभाओं में अपनी अहम सहभागीता से नित नए बुलंदियों को छू रही हैं वही अंधविश्वास के नाम पर उनकी निर्ममतापूर्वक हत्या हो रही है। मानसिक रूप से बीमार लोग कभी संतान प्राप्ति के लिए उनकी बलि चढ़ा रहे हैं तो कभी डायन के नाम पर। यह कृत्य राष्ट्र को शर्मसार करने वाला है। कई बार देखा जाता है कि पुलिस की मौजुदगी में ही महिलाओं को डायन बताकर उनके साथ बदसलूकी की जाती है। पुलिस-प्रशासन इन घटनाओं को तब गंभीरता से लेता है जब मीडिया या स्वयंसेवी संस्थाएं आगे आती हैं। हालात तब और बदतर हो जाता है जब पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रों में लगने वाली पंचायतें बैखौफ होकर अपने फैसले सुनाते हुए किसी भी महिला को डायन करार दे देती हैं और समाज का पढ़ा लिखा तबका भी उनका विरोध करने के बजाए उन्हें अपना मौन समर्थन देता नजर आता है। इन अंधविश्वास की घटनाओं के पीछे सामाजिक रुढ़िवादिता तो है ही साथ ही कानून के अनुपालन में कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण है। ऐसी महिलाओं को भी डायन करार देकर मौत के घाट उतारा जा रहा है जिनके परिजन नहीं है और उनके पास संपत्ति है। अगर कहा जाए कि डायन की आड़ में संपत्ति हड़पने और नरबलि के पीछे दुश्मनी साधने का खेल भी चल रहा है। उचित होगा कि कानून के साथ-साथ जनजागरुकता का प्रचार-प्रसार किया जाए। साथ ही ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों को भी चिंहिंत कर दंडित किया जाए। समाज में ऐसे लोगों को रहने का हक नहीं जो अपना मतलब साधने के लिए अंधविश्वासों को खाद-पानी मुहैया कराएं। भारतीय जनमानस को समझना होगा कि अंधविश्वासों को खत्म करने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की ही नहीं है। इसे उखाड़ फेंकने के लिए समाज को भी आगे आना होगा। सरकार और स्वयंसेवी संस्थाएं पिछड़े और सुविधाहीन क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करे। इससे मानव बलि और डायन के नाम पर हत्या जैसी अप्रिय घटनाओं पर रोक लगेगी और समाज अंधविश्वास से मुक्त होगा।


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