Tuesday, January 25, 2022
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दिल्ली : क्या कांग्रेस फिर से नहीं लड़ रही चुनाव

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दिल्ली में एक बार फिर चुनावी बिगुल बजने वाला है। नगर निगम के चुनाव में लगभग 6 महीने का समय रह गया जिसके लिए पार्टियां अपना दमखम भरने लगी हैं। विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत करके आम आदमी पार्टी का उत्साह काफी बढ़ा हुआ है, तो वहीं फिलहाल नगर निगम में सत्ता काबिज किए हुए भारतीय जनता पार्टी अपनी जीत के प्रति आश्वासित है। यदि कांग्रेस की बात करें तो वह कहीं भी नजर नही आ रही। कांग्रेस ने बीते दो विधानसभा चुनाव, एक लोकसभा चुनाव व निगम चुनाव लड़ा तो जरूर लेकिन वह सिर्फ दिखाने के लिए ,चूंकि न तो किसी बडेÞ नेता की रैली देखी गई थी और न ही कहीं पोस्टर बाजी। 2019 के विधानसभा व लोकसभा चुनाव में जिस तरह कांग्रेस ने अपना प्रर्दशन किया था, उससे यह तो स्पष्ट हो चुका था कि वह बीजेपी व आम आदमी पार्टी के दमखम के बीच अपनी जीतने की उम्मीद पहले ही छोड़ चुकी थी, लेकिन फिर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए पार्टी ने अपने प्रत्याशी उतारे थे। चुनावों में आम आदमी पार्टी व कांग्रेस ने भले ही अधिकारिक तौर पर गठबंधन की घोषणा नहीं की थी, लेकिन आंतरिक तौर पर उनका गठबंधन स्पष्ट देखने को मिला था।

स्वयं कांग्रेसी नेता व कार्यकर्ता कह रहे थे, हम तो हार ही रहे हैं आप केजरीवाल को वोट दे दो। यह सब आश्चर्यचकित करने वाला मामला था लेकिन कहते हैं कि राजनीति में कब क्या हो जाए कुछ नहीं पता।

सब भली-भांति जानते हैं कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस की नीतियों का इतना बुरी तरह विरोध किया था कि जनता के दिल में कांग्रेसियों के प्रति मन में नफरत भर दी थी।

देश की राजधानी में पहली बार विधानसभा चुनाव 1993 में हुआ था। इससे पहले दिल्ली चंडीगढ़ की तरह केंद्र शासित प्रदेश हुआ करता था, जहां विधानसभा नहीं हुआ करती थी।

दिल्ली को 70 विधानसभा सीटों में वर्गीकरण करते हुए पहली बार हुए चुनाव में बीजेपी ने 49 सीटों पर जीत हासिल करके सरकार बनाई थी और कांग्रेस के खाते में 14 सीटें आई थीं।

इसके अलावा बाकी सीटें छोटे व निर्दलीय दलों को मिली थीं। इस जीत का श्रेय मदनलाल खुराना को गया था और उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया लेकिन कुछ समय बाद किन्हीं कारणों से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद कमान साहिब सिंह वर्मा को मिली, लेकिन अगला चुनाव आते-आते उन्हें भी हटाकर सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री बनाया गया।

इसका कारण यह भी बताया जाता है कि 1998 के चुनाव में कांग्रेस की ओर से कमान शीला दीक्षित को दी गई थी और दो राजनीति में मुकाम हासिल कर चुकी महिलाओं का आमना-सामना कराना था।

लेकिन सुषमा स्वराज भी सरकार पुन: बनाने में असफल रही। राजधानी के सिर शीला का जादू ऐसा चढ़ा का लगातार तीन बार मुख्यमंत्री बनी। अपनी शैली व वर्चस्व के कारण शीला सरकार ने 15 साल तक किसी को अपना किला भेदने नहीं दिया।

इस दौर में बीजेपी संघर्ष करती रही और निगम में अपनी सत्ता काबिज कर ली। पिछले तीन बार से लगातार शानदार जीत के साथ बीजेपी तो अब नगर निगम के चुनाव में कोई नहीं हरा पाया, लेकिन इस बार कुछ निगम के कुछ सीटों पर हुए उपचुनाव में आम आदमी पार्टी ने जीत हासिल की है।

अब मामला यह है कि क्या बीजेपी निगम में अपनी सत्ता को बचा पाएगी? आंकड़ों के हिसाब से तो यह लग रहा है कि यदि कांग्रेस दमखम के साथ चुनाव नहीं लड़ती तो आम आदमी पार्टी बाजी मार सकती है, क्योंकि कांग्रेस के वोट का वर्गीकरण से फायदा बीजेपी को प्रत्यक्ष रूप से फायदा मिल पाएगा।

फिलहाल स्थिति यह है कि कांग्रेस के पुराने दिग्गज नेता भी कांग्रेस का दामन छोड़ कर आम आदमी पार्टी व बीजेपी में जाने लगे हैं। दरअसल, न तो विधानसभा में और न ही लोकसभा में एक भी सीट न मिलने के कारण कांग्रेस अब अपने आप को विपक्ष के रूप में महसूस नहीं करती।

मौजूदा वक्त में दिल्ली में इतने मुद्दे हैं, जिससे कांग्रेस चाहे तो शानदार कमबैक कर सकती है, लेकिन न तो किसी बात विरोध प्रर्दशन दिखता है और न ही मीडिया में बयान।

जग-जाहिर है कि कांग्रेस के कालखंड में दिल्ली ने और दिल्ली वालों ने बहुत तरक्की की है। 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दिल्ली की पूरी तरह तस्वीर बदल गई थी।

शीला सरकार ने राजधानी में पुलों का जाल व पांच सितारा होटल के अलावा कई चीजों का अपग्रेड करके पूरी तरह बदल दिया था।

अपनी तमाम उपलब्धियों के साथ कांग्रेस अपने अस्तित्व को लौटाना चाहे तो यह सबसे बेहतर समय है। अभी चुनाव में लगभग छह महीने हैं और इतने समय में जनता के बीच जाकर एक बार फिर जगह बनाई जा सकती है।

महानगरों की राजनीति में निगम पार्षद का पद सबसे छोटा होता है और यदि कांग्रेस चाहे तो एक बार फिर से अपने आप प्रारंभिक तौर पर स्थापित करके लौट सकती है।

बहरहाल, यदि कांग्रेस इस बार भी दिल्ली में हो रहे निगम चुनावों में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराती तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि आम आदमी पार्टी व कांग्रेस का पर्दे के पीछे गठबंधन हो गया है, लेकिन यहां कांग्रेस को एक बात समझनी होगी कि वो इस बार ताकत व शक्ति प्रदर्शन नहीं दिखाएगी तो दिल्ली से अगले कई वर्षों के लिए उसका अस्तित्व खत्म हो जाएगा।

कई बार राजनीतिक दलों के सामने ऐसी स्थिति आ जाती है कि उसको जिंदा रहने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है और अब यही स्थिति इस बार दिल्ली के निगम चुनावों को लेकर कांग्रेस की बन रही है।

यदि पार्टी के शीर्ष नेताओं ने इस बार गंभीरता नहीं दिखाई तो पार्टी की गंभीरता दिखाने लायक नहीं बचेगी चूंकि सोशल मीडिया के दौर में सबको सब पता रहता है।


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