
अगर अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष चलता रहता है, तो इसका असर विश्व अर्थव्यवस्था के साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। भले ही भारत इस युद्ध में भाग न ले या ले, लेकिन ऊर्जा जैसे कच्चा तेल, रसोई गैस, सीएनजी, व्यापार, आपूर्ति श्रंखला के बाधित होने,और महंगाई से भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचेगा और देश की विकास की गति बाधित होगी।
22 मार्च 2026 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 709.76 अरब अमेरिकी डॉलर के स्तर पर था। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने की वजह से डॉलर अधिक खर्च हो रहा है, साथ ही रिजर्व बैंक रुपये को स्थिर रखने के लिए डॉलर की लगातार बिक्री कर रहा है, क्योंकि वैश्विक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भारतीय मुद्रा पर दबाव बना हुआ है। 13 मार्च 2026 को समाप्त सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में 7.052 अरब डॉलर की तेज गिरावट दर्ज की गई थी। उससे पहले, 6 मार्च 2026 को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार में 11.68 अरब डॉलर की बड़ी गिरावट दर्ज हुई थी। उल्लेखनीय है कि फरवरी 2026 के मध्य में, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 725 अरब डॉलर से अधिक के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था।
वैश्विक अनिश्चितता और युद्ध के दुष्परिणामों के कारण, मार्च तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने लगभग 8 अरब डॉलर, यानी करीब 83,000 करोड़ रुपये, भारतीय शेयर बाजार से निकाल लिए हैं। रुपये के कमजोर होने के कारण, विदेशी निवेशक अपने पैसे सुरक्षित रखने के लिए भारत जैसे उभरते बाजार से पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश कर रहे हैं। इस बिकवाली से रुपये कमजोर हो रहा है। स्ट्रेट आफ होर्मुज वह समुद्री मार्ग है, जिसके माध्यम से दुनिया का 20 प्रतिशत और भारत का लगभग आधा तेल गुजरता है। ईरान और इस्राइल के बीच बढ़ते तनाव के कारण इस रूट पर आपूर्ति बाधित हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक समुद्री बंद रहेगा, तब तक रुपये की कीमत में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। इस बीच, भारतीय रिजर्व बैंक लगातार विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर रुपये की गिरावट को रोकने का प्रयास कर रहा है।
रुपये की कमजोरी के कई दुष्परिणाम हैं। इसकी कमजोर होने से भारत में आयात महंगे हो जाएंगे, जैसे क्रूड आयल और इलेक्ट्रॉनिक आइटम, जिनमें मोबाइल और लैपटॉप भी शामिल हैं। आयात महंगा होने से देश के चालू खाता घाटे में इजाफा होगा। जिन कंपनियों ने विदेश से कर्ज लिया है, उन्हें चुकाने के लिए ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ेगी। इससे विदेश में पढ़ाई का खर्च भी बढ़ेगा, और यह भारत की आर्थिक विकास दर को प्रभावित कर सकता है। लगातार बढ़ती कच्चे तेल की कीमत महंगाई को बढ़ाएंगी और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएंगी। इससे भारतीय रिजर्व बैंक के लिए नीतिगत ब्याज दरों में कटौती करना भी मुश्किल हो जाएगा, जिससे विकास दर में कमी आयेगी, कर्ज दर में इजाफा होगा, आर्थिक गतिविधियों में कमी आयेगी और महंगाई में वृद्धि होगी।
किसी भी देश की मुद्रा का मूल्य मुख्य रूप से उसके अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग और आपूर्ति पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, यदि भारत को अधिक सामान, जैसे कच्चा तेल, मंगवाना हो, तो उसे अधिक डॉलर की आवश्यकता होगी। इस मांग के बढ़ने पर डॉलर की कीमत बढ़ेगी और वह महंगा हो जाएगा, जिससे रुपया कमजोर हो जाएगा। इसके अलावा, मुद्रा की कीमत का निर्धारण देश की महंगाई दर, ब्याज दरें और विदेशी निवेशकों का भरोसा भी करता है। जब महंगाई कम रहेगी, तो आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलेगा और अर्थव्यवस्था स्थिर रहने पर विदेशी निवेशक भारत में निवेश करेंगे, जिससे डॉलर की आमद बढ़ेगी और रुपया मजबूत होगा। आसान शब्दों में, दुनिया में जिस मुद्रा की मांग अधिक और आपूर्ति कम होगी, उसकी कीमत भी उतनी ही अधिक होगी।
रसोई गैस संकट और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण देश में महंगाई का खतरा गहरा गया है। महंगाई विकास का मुख्य रुकावट है, क्योंकि इसकी बढ़ोतरी से लोग बचत नहीं कर पाएंगे, जिससे बैंक में जमा कम होंगे और बैंकों को महंगी ब्याज दर पर कर्ज देना पड़ेगा। इससे कर्ज की लागत बढ़ेगी और उधारी की मात्रा घटेगी। परिणामस्वरूप, व्यापारिक पूंजी की कमी से उत्पादन में गिरावट आएगी, जिससे आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती आ सकती है और विकास की गति धीमी हो जाएगी। अंत में कहा जा सकता है कि युद्ध के कारण भारत में उर्वरक, तेल और रसोई गैस की कमी हो गई है। शिपिंग मार्गों में रुकावट कई जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति में बाधा डाल रही है। इन बाधाओं से महंगाई बढ़ी है, विदेशी मुद्रा भंडार गिरा है, रुपए की कीमत कमजोर पड़ी है, और शेयर बाजार में अनिश्चितता आई है।

