Thursday, March 19, 2026
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21वीं सदी में दहेज के लिए उत्पीड़न शर्मनाक

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एनसीआरबी की ‘भारत में अपराध 2023’ रिपोर्ट में कहा गया है कि 2023 में दहेज निषेध अधिनियम के तहत 15,489 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2022 और 2021 में यह संख्या क्रमश: 13,479 और 13,568 थी। आंकड़ों के अनुसार हत्या, दुष्कर्म, दहेज हत्या और दंगे के 1.45 लाख केस 2014 में दर्ज किए गए थे, जबकि 2023 में इनमें केवल 1.02 लाख केस ही दर्ज किये गए, जो 2004 में दर्ज 1.18 लाख केस से भी कम है। इसी हफ्ते एनसीआरबी ने भारत में अपराधों का 2023 की रिपोर्ट जारी की है। 2004 में देश में दुष्कर्म के 18,233 मामले दर्ज किये गए, जो 2014 में दोगुना बढ़कर 36,735 हो गए। जबकि एनडीए सरकार के दौरान अगले नौ सालों में इसमें 19 फीसद की गिरावट आई और 2023 में कुल 29,670 मामले दर्ज किये गए।

21वीं सदी को ज्ञान की सदी कहा जा रहा है और हम रूढ़िवादी सोलहवीं सदी में जी रहे हैं। लड़कियों के साथ यदि परिवार व्यवस्था में भेदभाव होता है और भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति बढ़ती है, तो उसके मूल में भी दहेज का अभिशाप ही है। लगातार खचीर्ली होती उच्च शिक्षा व्यवस्था में बेटियों की शिक्षा पर बड़ा खर्च करने के बाद यदि मां-बाप को दहेज देना पड़ता है तो यह शर्मनाक स्थिति है। हालांकि, पिछले कुछ समय से पारिवारिक विवाद व अन्य कारकों को दहेज का मामला बनाने के कुछ मामले अदालतों की चिंता का भी विषय रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद समाज में दहेज के लिये उत्पीड़न की घटनाएं कटु सत्य है। यह भी एनसीआरबी की रिपोर्ट का यथार्थ है कि देश में हर रोज दहेज के लिये हत्याएं दर्ज हो रही हैं। बेटियों को पढ़ाने तथा सरकारों द्वारा उनके सशक्तिकरण के तमाम प्रयासों के बावजूद दहेज का दानव यदि अट्टहास कर रहा है तो यह हमारे समाज की असफलता ही कही जाएगी।

विडंबना यह है कि दहेज उत्पीड़न के ज्यादातर मामले बड़े हिंदी प्रदेशों में सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 से 2023 तक उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले बढ़े हैं। वर्ष 2021 में महिला अपराधों की संख्या 56083 थी, जो वर्ष 2022 में बढ़कर 65743 हो गई। प्रदेश में वर्ष 2023 में 33 महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म व दुष्कर्म के बाद हत्या के मामले दर्ज किए गए। इसी तरह 3556 महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामले दर्ज हुए। इनमें 301 नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले सामने आए। दुष्कर्म के प्रयास के 140 केस दर्ज हुए। यूपी के बाद बिहार दूसरे नंबर पर है।

रिपोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक, राजधानी दिल्ली में 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 13,000 से अधिक मामले सामने आए। 2022 में 14,158 मामले थे और 2021 में 13,982 मामले दर्ज किए गए थे। दिल्ली ने 19 मेट्रो शहरों में दहेज हत्या और बलात्कार के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए हैं। हालांकि, रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि दिल्ली में प्रति लाख आबादी के परिप्रेक्ष्य में अपराध दर 14.4 प्रतिशत रही, जो इंदौर और जयपुर से कम है।
भारत का संविधान समानता के अधिकार की गारंटी देता है और महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करने तथा उनके समग्र सशक्तिकरण को सुनिश्चित करने के लिए राज्य द्वारा सकारात्मक हस्तक्षेप का भी प्रावधान करता है। संवैधानिक प्रावधानों में व्यक्त दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए, भारतीय दंड संहिता, 1860, दहेज निषेध अधिनियम, 1961, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 और बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 जैसे विभिन्न कानून बनाए गए हैं, जो महिलाओं के समक्ष लैंगिक असमानता, भेदभाव और हिंसा के मुद्दों को संबोधित करते हैं।

भारत सरकार ने हिंसा प्रभावित महिलाओं के लिए वन स्टॉप सेंटर, टोल फ्री टेलीफोनिक शॉर्ट कोड 181 पर चलने वाली महिला हेल्पलाइन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, कठिन परिस्थितियों या अभाव का सामना करने वाली महिलाओं के लिए स्वाधार गृह, आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली जो आपातकालीन प्रतिक्रिया के लिए एक अखिल भारतीय एकल नंबर 112, मोबाइल ऐप आधारित प्रणाली है, 8 शहरों में सुरक्षित शहर परियोजनाएं, जांच अधिकारियों, अभियोजन अधिकारियों और चिकित्सा अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रम, पुलिस स्टेशनों पर महिला सहायता डेस्क की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण आदि सहित विभिन्न योजनाएं और परियोजनाएं शुरू की हैं।

समाज में उपभोक्तावादी सोच के चलते भी दहेज की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल रहा है। हमें विचार करना होगा कि समाज में दहेज के संकट की जड़ों पर कैसे प्रहार किया जाए। राष्ट्र का विकास तब तक एकांगी ही रहेगा, जब तक आधी दुनिया को समाज में सम्मानजनक स्थान नहीं मिलता। दहेज के मामलों में न्याय भी शीघ्र देने की आवश्यकता है।

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