- जुलाई से शुरू होगी बरसात, फिर से उफनेंगे शहर के नाले
- हर साल सफाई पर खर्च होते हैं लाखों रुपये, नहीं सुधरते हालात
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: शहर के नालों की हालत किसी से नहीं छुपी है। यहां नालों में गोबर और कूड़ा बहता है, लेकिन नगर निगम की ओर से इसे साफ नहीं किया जाता, जिस कारण बरसात के दिनों में शहरवासियों को परेशान होना पड़ता है। आॅडियन सिनेमा से लेकर कमेला रोड तक नाला सिल्ट, गोबर और कूड़े से अटा पड़ा है, लेकिन अभी तक नगर निगम की ओर से इसकी सफाई की कोई योजना नहीं बनाई गई है। अब कर्मी शुरू हो चुकी है, आने वाले दिनों में बरसात भी होगी, लेकिन अभी तक कोई प्लान तैयार नहीं किया गया है।
हर साल बरसात के आसपास ही नगर निगम की ओर से नालों की सफाई पर ध्यान दिया जाता है। जिस कारण समय कम रहने के कारण नालों की सफाई नहीं हो पाती है और शहरवासियों को जलभराव की समस्या का सामना करना पड़ता है। शहर में सबसे अधिक हालत ओडियन सिनेमा के सामने वाले नाले की है, जो कमेला रोड पर भी होकर गुजर रहा है।

यह नालों हर साल साफ किया जाता है, लेकिन आज तक एक बार भी यह पूरी तरह से साफ नहीं हो पाया है। नाले में कई जगह गोबर इस तरस से जमा है। मानों यहां कोई लिंटर तक डाल रखा हो। कूड़े से कई जगह से नाला अटा पड़ा है। जिस कारण यहां कई बार हादसे तक हो चुके हैं, लेकिन उसके बावजूद इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।
पिलौकड़ी वाले पुल पर जमा है गोबर
पिलौकड़ी पुल के पास नाले की बात करें तो यहां गोबर और कूड़े कारण नाले का बुरा हाल है, लेकिन इसे नगर निगम की ओर से साफ नहीं कराया जाता। हर बार यही हाल पूरे शहर में होता है, लेकिन कुछ जगहों पर तो सफाई हो जाती है, लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता।
जबकि पूरे शहर का गंदा पानी इसी नाले में गिरता है। यहां कूड़ा अटा पड़ा है और कूड़ा बीनने वाले बच्चे इसी के ऊपर होकर आराम से गुजर जाते हैं। क्षेत्रीय लोग और क्षेत्रीय पार्षद भी कई बार इस संबंध में शिकायत कर चुके हैं, लेकिन सफाई कोई नहीं कराई जाती।
हर बार होते हैं लाखों खर्च, सफाई नदारद
नगर निगम की ओर से हर बार लाखों रुपये का बजट नालों और नालियों की सफाई के नाम पर खर्च किया जाता है। इसमें बड़ा घोटाला होता है। अगर नालों को साफ किया जाता तो नालों की यही हालत महज कुछ माह में नहीं हो पाती। हकीकत तो यह है कि नालों की सफाई के नाम पर लाखों रुपये का गोलमाल किया जाता है और अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं होती। अगर अधिकारी हकीकत जानने निकले तो न जाने कितनी हकीकत सामने आये। अगर यह धनराशि सही में नाला सफाई पर खर्च हो तो कभी जलभराव की समस्या खड़ी ही न हो।

