जनवाणी ब्यूरो |
नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारत निर्वाचन आयोग एक बार फिर विपक्ष के निशाने पर है। 65 लाख मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाए जाने के फैसले के बाद सियासी हलचल तेज हो गई है। विपक्ष इसे ‘वोट चोरी’ की साजिश बता रहा है, तो वहीं चुनाव आयोग इसे कानूनी प्रक्रिया के तहत किया गया सुधार बता रहा है।
जानें क्या है पूरा मामला?
बिहार में मतदाता विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम के तहत भारत निर्वाचन आयोग ने 1 अगस्त को घोषणा की थी कि 65 लाख मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाया गया है। जिनमे शामिल थे, मृत मतदाता, स्थायी तौर पर क्षेत्र छोड़ चुके मतदाता, दो जगहों पर नाम वाले मतदाता,क्षेत्र में अब न रहने वाले मतदाता। इस सूची के सार्वजनिक होते ही विपक्ष ने आरोप लगाया कि ये एक सुनियोजित ‘वोट कटौती’ की योजना है।
सुप्रीम कोर्ट की दखल और आयोग की सफाई
विपक्षी आरोपों के चलते मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया, जिसने आयोग को आदेश दिया कि “हटाए गए 65 लाख मतदाताओं की सूची सार्वजनिक की जाए।”
चुनाव आयोग ने आदेश का पालन करते हुए 18 अगस्त को यह सूची अपने मतदाता सेवा पोर्टल पर अपलोड कर दी 🔗 https://ceoelection.bihar.gov.in/index.html
कैसे देखें सूची?
EPIC नंबर से सर्च करें – किसी एक मतदाता का विवरण देखने के लिए।
विधानसभा और भाग संख्या से – पूरे बूथ के हटाए गए वोटरों की सूची डाउनलोड करें।
इस सूची से किसे फायदा?
विशेषज्ञों की मानें तो यह सूची आम जनता के लिए व्यावहारिक नहीं है। राजनीतिक दलों को संतुष्ट करने के लिए जारी की गई है। अगर कोई दल वास्तव में इस सूची का उपयोग करना चाहे, तो उन्हें हर मतदान केंद्र की सूची डाउनलोड कर फिजिकल वेरीफिकेशन करना होगा।
राजनीतिक दलों की निष्क्रियता
हालांकि, यह विडंबना है कि पुनरीक्षण के समय 1,60,813 BLA (Booth Level Agents) लगाए गए थे। फिर भी 1 अगस्त से 15 अगस्त तक एक भी राजनीतिक दल ने दावा-आपत्ति नहीं दी। अब 12 दिनों में फिजिकल वेरीफिकेशन कर प्रतिक्रिया देना लगभग असंभव है।
28,370 मतदाता खुद कर चुके हैं दावा-आपत्ति
अब तक 28,370 नागरिकों ने खुद दावा-आपत्ति दर्ज कराई है।
इनमें कुछ ‘मृत’ घोषित लोग जीवित पाए गए हैं।
ये वही खामियां हैं जिनकी ओर मीडिया और विशेषज्ञों ने पहले ही इशारा किया था, खासकर जब BLO बिना जांच के हस्ताक्षर कर फॉर्म जमा कर रहे थे।
विशेषज्ञों की राय
चाणक्या इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा का कहना है “यह सूची सिर्फ विपक्ष के हंगामे को शांत करने के लिए जारी की गई है, न कि मतदाताओं की मदद के लिए। आयोग ने विपक्ष के हाथ से मुद्दा छीन लिया है।”

