Monday, March 16, 2026
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चुनाव आयोग बनाम सुप्रीम कोर्ट

भारत का लोकतंत्र उसकी जनता से संचालित होता है। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार दिया है कि वह देश की नीतियों और शासन व्यवस्था को प्रभावित कर सके— अपने मताधिकार के माध्यम से। लेकिन जब नागरिकों को उनके ही अधिकारों से वंचित करने की कोशिश की जाती है, तब लोकतंत्र एक ऐसे प्रश्नचिह्न के सामने खड़ा होता है, जहां पहचान, दस्तावेज और प्रक्रिया, व्यक्ति के अधिकार पर भारी पड़ने लगती है। बिहार में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की घोषणा के बाद ठीक ऐसा ही देखने को मिला। मुद्दा 10 जुलाई 2025 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय की दहलीज तक जा पहुंचा।

इस पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत चुनाव आयोग ने 7.9 करोड़ मतदाताओं की नागरिकता को पुन: सत्यापित करने की पहल की। आयोग ने यह तर्क दिया कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए यह कदम जरूरी है, और इसके लिए 11 नए दस्तावेजों की सूची जारी की गई, जिसमें आधार कार्ड और वोटर आईडी को बाहर रखा गया। यह कदम संविधान और लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध प्रतीत हुआ। सवाल यह नहीं था कि सूची की सफाई क्यों की जा रही है, सवाल यह था कि जिन नागरिकों के नाम वर्षों से सूची में दर्ज हैं, और जो अनेक बार मतदान कर चुके हैं, वे अब पुन: नागरिकता सिद्ध करने को बाध्य क्यों किए जा रहे हैं? इस पर सुप्रीम कोर्ट में कई विपक्षी दलों, संगठनों और याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई। याचिकाओं में कहा गया कि यह पूरी प्रक्रिया उन तबकों को मताधिकार से वंचित करने की कोशिश है, जो पहले से ही समाज के हाशिए पर हैं—जैसे गरीब, प्रवासी मजदूर, अल्पसंख्यक, महिलाएं और सीमावर्ती क्षेत्रों के नागरिक। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ—न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची—ने चुनाव आयोग से तीखे सवाल पूछे और यह स्पष्ट किया कि नागरिकता का निर्धारण आयोग का अधिकार क्षेत्र नहीं है। चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने यह तर्क दिया कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन जब जस्टिस धूलिया ने यह सवाल किया कि क्या चुनाव आयोग अब गृह मंत्रालय का कार्य कर रहा है, तो यह पूरी बहस एक नए आयाम की ओर मुड़ गई। न्यायमूर्ति बागची ने अपनी टिप्पणी में गहरी चिंता प्रकट करते हुए कहा कि यदि आयोग की यह प्रक्रिया लागू होती है, तो वह व्यक्ति, जो मतदाता सूची में पहले से दर्ज है, लेकिन आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकता, उसे अपील करनी होगी, प्रक्रिया से गुजरना होगा और तब तक वह आगामी चुनावों में मतदान से वंचित रह जाएगा। यह एक व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार से वंचित करने जैसा है।

सवाल यह भी है कि मतदान का अधिकार किसे प्राप्त है और इसकी शर्तें क्या हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 यह कहता है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक, जिसकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक है, और जो चुनाव के दिन भारत के किसी निर्वाचन क्षेत्र में निवास करता है, उसे मतदान का अधिकार प्राप्त है। पहले यह आयु 21 वर्ष थी, लेकिन 1988 में 61वें संविधान संशोधन द्वारा इसे घटाकर 18 वर्ष किया गया। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 325 यह स्पष्ट करता है कि किसी भी व्यक्ति को जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जा सकता। समानता और जीवन के मौलिक अधिकार भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार प्रदान करता है। यदि किसी वर्ग विशेष को दस्तावेजों के नाम पर मतदाता सूची से हटाया जा रहा है, तो यह अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड, जिनके आधार पर वर्षों से नागरिक सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहे हैं, अब उन्हें ही नागरिकता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा। जब सरकार पासपोर्ट, बैंक खाता, सब्सिडी, स्कूल एडमिशन और अन्य सेवाओं में आधार को मान्यता देती है, तो फिर मतदान के समय वही आधार अस्वीकार क्यों किया जा रहा है? यह विरोधाभास नागरिकों के अधिकारों पर एक मनमानी कार्रवाई का संकेत देता है। वास्तव में चुनाव आयोग द्वारा जारी यह प्रक्रिया न केवल तकनीकी दृष्टि से बल्कि संवैधानिक दृष्टिकोण से भी संकटपूर्ण है। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि आयोग द्वारा निर्धारित दस्तावेजों की सूची व्यावहारिक नहीं है और देश के अधिकांश गरीब, ग्रामीण, प्रवासी नागरिक इस सूची को पूरा नहीं कर सकते। ऐसे में यह प्रक्रिया अल्पसंख्यकों, दलितों, घुमंतू जातियों और सीमावर्ती समुदायों को मताधिकार से वंचित कर सकती है। लोकतंत्र में यह सबसे गंभीर अपराधों में से एक माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस प्रक्रिया पर फिलहाल रोक नहीं लगाई, लेकिन यह स्पष्ट किया कि आयोग को पारदर्शिता बनाए रखनी होगी। नागरिकों को पर्याप्त समय, सूचना और सुविधा दी जानी चाहिए ताकि वे अपने अधिकार की रक्षा कर सकें। अदालत ने कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता जरूरी है, लेकिन वह इतनी कठोर प्रक्रिया के माध्यम से नहीं होनी चाहिए कि लोग अपने ही देश में अजनबी बना दिए जाएं।

संविधान के अनुच्छेद 325 कहता है कि ‘राज्य किसी व्यक्ति को केवल धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर मतदाता सूची में नाम दर्ज करने या न करने से वंचित नहीं कर सकता।’ ऐसे में यदि कोई व्यक्ति केवल इस आधार पर सूची से बाहर कर दिया जाता है कि वह अपने गांव से बाहर कार्यरत है, या उसके पास पारंपरिक दस्तावेज नहीं हैं, तो यह न केवल असंवैधानिक है, बल्कि लोकतंत्र के साथ अन्याय भी है। इस पूरी सुनवाई ने यह सिद्ध कर दिया कि चुनाव केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि संवैधानिक मूल्यों, नागरिक स्वतंत्रताओं और राजनीतिक शक्ति संतुलन की गहराई से जुड़ा मुद्दा है। मतदाता सूची का संशोधन आवश्यक हो सकता है, लेकिन यह उस पारदर्शिता, समावेशिता और संवेदनशीलता के साथ किया जाना चाहिए जो भारतीय लोकतंत्र की आत्मा है। यदि इस प्रक्रिया के चलते एक भी योग्य नागरिक मतदाता सूची से बाहर हो जाए, तो वह केवल एक तकनीकी गलती नहीं बल्कि लोकतंत्र पर सीधा आघात होगा।

10 जुलाई की सुनवाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि न्यायपालिका केवल कानूनी निगरानीकर्ता नहीं बल्कि लोकतंत्र की नैतिक आत्मा भी है। जब कार्यपालिका या निर्वाचन संस्थाएं किसी वर्ग विशेष के अधिकारों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रहार करती हैं, तो न्यायपालिका का कर्तव्य बनता है कि वह संविधान की रक्षा में अडिग खड़ी हो। यह सुनवाई न केवल बिहार या 2025 के चुनावों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह आने वाले वर्षों में देशभर की चुनावी प्रक्रियाओं, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक विवेक को आकार देने वाली एक ऐतिहासिक घटना के रूप में याद की जाएगी।

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