Tuesday, March 17, 2026
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खुशफहमी को गले लगा लो

किसी बात को लेकर किसी प्रकार की गलतफहमी जीवन को बोझिल बना देती है। लेकिन अपुन अलग ही मिट्टी के बने हुए हैं। जिसके चलते गलतफहमी तो कभी पालते ही नहीं है। इसके एवज में हर किसी अच्छी-बुरी बात पर केवल और केवल खुशफहमी पालकर सुख चैन से जिंदगी बसर करते हैं। दरअसल अपनी सोच अत्यंत सकारात्मक है। राह चलते छोटी-बड़ी ठोकर भी लग लग जाए तो जिंदगी सलामत है, यही सोच कर आनंदित हो जाते हैं। हालांकि वर्तमान दौर में क्या तो व्यक्तिगत, क्या सामाजिक और क्या तो राष्ट्रीय, हर स्तर पर चहुंओर नकारात्मक वातावरण व्याप्त है। ऐसी स्थिति में आम आदमी निरंतर बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार के चलते रोती कलपती मुद्रा में है।

इस संदर्भ में चतुर सुजान ने कहा है कि जब चाशनी में डूब कर ही मरना लिखा हो, तो क्यों न चाशनी में डूबे रहने का आनंद लिया जाएं। यह बात अपुन के दिल में इस कदर पैठ कर गई है कि बैठे ठाले अनहोनी होने पर यही मानता हूं कि इतने पर ही बला टली। अन्यथा कहीं और भी बड़ी अनहोनी होने पर मेरा क्या होता ? यकीन मानिए, जो कोई मेरी राह पर चल सकेंगे, जिंदगी का सच्चा आनंद लेकर ही रहेंगे। खैर, अपनी खुशफहमी पालने की आदत के चलते अपुन तो यह भी मानने लगे हैं कि यह सारा संसार ही अपना है। संसार में भाग दौड़ कर रहे तमाम लोगों को अपने-अपने काम में हमने ही नियुक्त कर रखा है। शायद आप कल्पना नहीं कर सकते कि इसी तर्ज पर केवल और केवल खुशफहमी पालकर आप भी तीन लोक के स्वामी तक बन सकते हैं।

कहीं किसी बात पर आहत या प्रताड़ित होने पर पर्याप्त संवैधानिक प्रावधान होने के बावजूद इतनी लंबी प्रक्रिया के दौर से गुजरना होता है कि जिसका जवाब नहीं ! लेकिन अपुन तमाम तरह की विसंगति एवं विरोधाभासों के चलते यह मानकर चलते हैं कि यह सब तो बदलते जमाने का ट्रेंड है। इसलिए हालात से समझौता करना अपुन ने सीख लिया है। यही एक वजह है कि हर किसी गंभीर से गंभीर बात को भी अपुन बहुत हल्के-फुल्के अंदाज में लिया करते हैं। इसके चलते दिल और दिमाग में किसी किस्म का तनाव नहीं होता। और बहुत ही सुख चैनपूर्वक जिंदगी बसर होने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। सच कहूं, इस जमाने में जो बिंदास है वही खास है। बाकी सब तो भीड़ का हिस्सा है।

बिन मांगी सलाह भी यदि मिले तो उसे खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए। अन्यथा आजकल के जमाने में किसी को क्या पड़ी है जो औरों का अच्छा सोचे? अब ऐसा है कि रोने के तो जमाने में हजारों हजार कारण है। ऐसे में किस-किस बात पर रोएं? कब तक रोएं? और इस देवदुर्लभ माने जाने वाले मानव भव को अकारथ क्यों जाने दें? दरअसल हम व्यवस्था नहीं बदल सकते, जमाने के दस्तूर में कोई परिवर्तन नहीं कर सकते, हालात से समझौता करना हमारी नियति है। एक तरफ कुआं है तो एक तरफ खाई। आदमी कहां जाएं? किससे फरियाद करें? कब तक फरियाद करें? ऐसे अनगिनत सवाल ही सवाल है। तो क्यों न खुशफहमी को गले लगाकर जिएं !

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