जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: भीड़ में भी अब वो तन्हा रहती है हर दीवार से उम्मीद लगाए रहती है, वो मां ही है जो दुत्कारे जाने पर भी, बच्चों को सिर्फ दुआ ही देती है। दुनिया में कोई भी ऐसा शब्दकोष नहीं जो आज भी मां को परिभाषित कर सके। मां एक संबोधन मात्र नहीं बल्कि एक पूरी दुनिया है। कहते हैं कि उसकी की गोद से बड़ा कोई स्वर्ग नहीं और उसकी दुआओं से मजबूत कोई कवच नहीं। मां सिर्फ जन्मदात्री नहीं अपितु निराकार जीवन को आकार देने वाली, सहेजने वाली, जीवन की कठिनाइयों से लड़ना सिखाने वाली और हर मुश्किल घड़ी में रक्षक बनकर खड़ी रहने वाली है।
देशाभर में शनिवार को मदर्स डे मनाया जाएगा। कहीं केक काटे जाएंगे, तो कहीं पर मां को उपहार देकर खुश किया जाएगा। मगर शहर का एक कोना ऐसा भी है, जहां पर मां आज भी दरवाजे पर खड़ी होकर नीरस आंखों से अपनों का रास्ता देख रही है। अक्सर आहट होने पर होठों पर मुस्कान और आंखे इंतजार में दरवाजे की ओर टकटकी लगाए देखती है। मगर हर बार मायूसी ही हाथ लगती है। मदर्स डे की पूर्व संध्या पर जनवाणी टीम ने गंगानगर के दादा-दादी निवास वृद्ध आश्रम में मां की पीड़ा सुनी।
बच्चों ने अखबार में निकलवा दिया इश्तेहार
अयोध्या की रहने वाली सरला शुक्ला बताती है कि वह पिछले 10 माह से आश्रम में रह रही है। उनके तीन बेटे और तीन बेटियां हैं। जिनमें से एक बेटे की मृत्यु हो चुकी है। 12 साल पहले पति ने दूसरी शादी कर ली। जिसके पश्चात उन्होंने घर छोड़ दिया था। बीते नौ माह पहले जब वह अपने घर पहुंची तो उन्हें अपने पति की मृत्यु का पता चला। घर पर अपना हिस्सा मांगने गई तो बच्चों ने दुत्कार कर मारपीट कर उनको घर से निकलवा दिया। साथ ही स्थानीय अखबार में भी उनके मृत होने का इश्तेहार निकलवा दिया। उन्होंने बताया की इससे पहले वह गाजियाबाद के राधा आश्रम में रहती थी, अब आश्रम ही उनका सहारा है। तीन हजार रुपये पेंशन सरकार की ओर से मिलती है।
अपने ही खून में खोट
जेलचुंगी निवासी कुंती यादव बताती है कि उनका भरा पूरा परिवार है। वह चार साल से वृद्धाश्रम में रह रही है। उनके दो बेटे और दो बेटी हैं, लेकिन बेटों ने उन्हें यहां रहने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने बताया कि उनका छोटा बेटा और बहू पहले उनसे मिलने आते थे, मगर दो साल से उन्होंने भी आना बंद कर दिया है। उसके बाद उन्होंने कई बार पेंशन भी बनवाने की कोशिश की, मगर नहीं बन पायी। बताया कि अक्सर बड़ी बहू कभी मिलने आ जाती है या फोन पर बात कर लेती है, मगर अपने ही खून में खोट है, सब कर्मों का दोष है।
स्वेच्छा से रह रही वृद्धाश्रम में
मेरठ निवासी कांति देवी ने कहा कि जग में ऐसा कौन है, जिसे अपनों की याद नहीं आती। आज भी हर वक्त घर की याद और ख्याल रहता है। उन्होंने कहा कि मैं पिछले एक साल से वृद्ध आश्रम में रह रही हूं। एक बेटी और दो बेटे हैं, मगर बच्चों और उनके बीच में मतभेद हैं। सब उनसे मिलने आते हैं और वह भी अपने घर मिलने चली जाती है। मगर रिश्तों में पहले जैसी बात नहीं है। इसलिए वो अपनी इच्छा से वृद्ध आश्रम में रह रही है।
कोई साथ निभाने वाला नहीं
कहने को सब रिश्ते हैं, पर साथ निभाने वाला कोई नहीं। मेरठ निवासी मुनेश बताती है कि पिछले एक साल से यहां रह रही है। घर में भरा पूरा परिवार है। घर में पति व दो बेटे और चार बेटी है। मगर घर में न इज्जत होती है और न ही सम्मान, इसलिए वह यहां रह रही है।

