Saturday, March 14, 2026
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त्योहारों को शालीनता से मनाने की जरूरत

NAZARIYA


YOGESH KUMAR SONI 2देश में चारों ओर गणेश चुतुर्थी व विसर्जन की धूम है । सभी लोग बहुत खुशी के साथ हर छोटे-बड़े पर्व को अपनी प्रथाओं के साथ जीते व मनाते हैं। लेकिन दुख तब होता है जब खुशी वाला माहौल मातम में बदल जाता है। बीते कई वर्षों से पूरे देश में गणेश विसर्जन के दौरान लोगों के डूबने व मरने की खबरें आर्इं। बीते शनिवार दिल्ली के सोनिया विहार के दूसरे पुश्ते पर विसर्जन के दौरान तीन बच्चों की मौत हो गई। इसके अलावा भी देशभर से ऐसी कई खबरें आ रही हैं। मन में सवाल सवाल यही है कि इन मौतों का जिम्मेदार आखिर कौन है? हम इसमें शासन-प्रशासन को फेल बताएं तो भी काम नही चलेगा, क्योंकि स्वयं लोग भी इसके सीधे तौर पर पूर्ण रूप से जिम्मेदार हैं। जहां भी मूर्ति का विसर्जन होता है, वहां लोग अधिक संख्या में पहुंचते हैंऔर इस दौरान नाच-गाना बहुत होता है, एक दूसरे पर गुलाल लगाते हैं। ज्यादा मस्ती करने व धक्का मुक्की के कारण वह गलती कर देते हैं, जिससे उनकी मौत हो जाती है और ऐसा नहीं कि वहां बंदोबस्त की कोई कमी होती है लेकिन ज्यादा भीड़ व लापरवाही उन पर भारी प़ड़ जाती है।

ऐसी स्थिति छठ पूजा, होली व अन्य कई तरह के उत्सवों पर देखने को मिलती है। यह हमेशा से तकलीफ क विषय रहा है, जब कोई भी इंसान बेमौत या लापरवाही की वजह से मौत के आगोश में चला जाता है। अचानक व अल्प आयु में मौत से पूरा घर बर्बाद सा हो जाता है।

ऐसी घटनाओं से बहुत ज्यादा आश्चर्य इसलिए भी होता है क्योंकि हर बार इस तरह के हादसे होते हैं जिससे हम आज भी सबक सीखने को तैयार नहीं हैं।

यदि इस मामले में कोई सलाह या ज्ञान देना भी चाहे तो लोगों यह लगता है मानों उसने, उनके धर्म या आस्था पर वार कर दिया हो।

हम यह नहीं कहते कि त्यौहार अपनी प्रथा के हिसाब से न मनाएं, बिल्कुल मनाइए लेकिन सुरक्षा के साथ, क्योंकि प्रशासन आपको सुविधा दे सकता है, लेकिन आपको अपनी सुरक्षा का जिम्मा तो स्वयं ही लेना पड़ेगा।

कुछ वर्षों पुरानी बात है। विसर्जन के समय एक व्यक्ति की मौत हो गई थी, जो अपना घर चलाने वाला एक मात्र इंसान था।

उसकी मौत के चंद दिनों बाद ही गम में उसके माता-पिता की मौत हो गई थी। पत्नी भारी डिप्रेशन में चली गई थी, जिससे वह पूर्ण रुप से पागल हो चुकी थी और दोनों बच्चों की जिंदगी विरान हो गई।

यह सिर्फ एक ही व्यक्ति की कहानी से समझाने का प्रयास किया गया है इसके अलावा तमाम ऐसे उदाहरण हैं, जिससे आपका दिल और रुह कांप सकती है।

हमें यह समझना चाहिए कि पहले नदी, तालाब व गंगा, यमुना व अन्य जल स्थल तमाम जगह मिल जाते थे और लोग भी कम होते थे, जिससे कोई भी काम करने में परेशानी नहीं होती थी लेकिन अब दोनों चीजें विपरीत स्थिति में चली गई।

पहला तो पानी वाली जगह कम हो गई, दूसरा जनसंख्या अधिक हो गई, जिससे हादसों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

यदि महानगरों के परिवेश की बात करें तो यहां हादसों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी इसलिए हो रही है, क्योंकि जल स्थल बेहद कम होते चले गए और लोग इतने बढ़ चुके हैं की आदमी के ऊपर आदमी चढ़ा रहता है। हर कोई जल्दी में रहता है। काम भी सारे करने हैं और धैर्य नाम की चीज बिल्कुल गायब है।

हम इस लेख के माध्यम से किसी की आस्था को आघात नहीं पहुंचा रहे, लेकिन महानगरों में मूर्ति विसर्जन से अब नदियों में फैलता प्रदूषण मानव जीवन के लिए खतरा बनता जा रहा है, जिससे हमारी मौजूदा व आने वाली पीढ़ी भारी संकट में पढ़ने वाली है।

केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड के मुताबिक यमुना में अमोनिया का जलस्तर 0.5 होना चाहिए, लेकिन विसर्जन या नदी के अधिक प्रयोग के बाद 1.5 से ज्यादा हो जाता है जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

यमुना में कई चरणों में करोड़ों रुपये लगाकर सफाई का काम किया जाता है, लेकिन गंदगी के अलावा प्लास्टर आफ पैरिस से बनी मूर्तियों से इतनी गंदगी हो जाती है, जिससे वह पानी किसी भी योग्य नही रह जाता।

एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक अब लोग नदियों को नाले की तरह प्रयोग करते हैं क्योंकि अब प्लास्टिक, पूजा सामग्री, खाद्य सामग्री, कॉस्मेटिक सामान के अलावा महिलाओं द्वारा पीरियडस के दिनों प्रयोग किए पैड्स तक मिलने लगे।

वैसे तो हम गंगा, जमुना को मईया कहकर इनको पूजते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि हम आस्था के साथ खुद से कितना बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं।

लेकिन कुछ लोगों ने बदलते परिवेश में एक अच्छी तरकीब निकाली है। एक मौहल्ले के लिए कई लोग मिलकर मंदिर में मिट्टी के गणेश जी को स्थापित करके फिर विसर्जन के समय पूरे एरिया का चक्कर लगाकर जिस प्रक्रिया को ‘नगर फेरी’ बोलते हैं। इसके बाद एक पानी भरी बाल्टी में उनको डुबाकर पानी में मिला देते हैं।

इसके बाद उस पानी को सभी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बांट लेते हैं और सभी अपने पेड़-पौधे या गमले में डाल लेते हैं। कुछ पंडित, बुजुर्गों या धर्मगुरुओं द्वारा बदलाव की नई प्रकिया लोगों को बहुत भा रही हैं क्योंकि इससे न तो प्रदूषण होता है और न किसी की जान जाती है।

यदि आज हम परिस्थितियों के हिसाब से नहीं बदले तो आने वाले कल में उस स्थिति में आ जाएंगे, जिससे निकलना बेहद कठिन हो जाएगा।

अपने लिए न सही कम से कम आने वाली पीढ़ी को यदि आज के युग की तकनीकी या सुझाव समझा गए तो भविष्य अच्छा आने की उम्मीद बनी रह सकती है।

यदि थोडी सी समझदारी के साथ अपने त्यौहार व प्रथाओं को मनाया जाए और किसी काम को सुगमता के साथ किया जाए तो उसकी अपनी आस्था पर चोट नहीं समझनी चाहिए चूंकि जब खुशी का माहौल गम में बदलता है तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता।


SAMVAD

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