Saturday, January 22, 2022
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शाकाहार महज आहार का मामला नहीं

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इक्कीसवीं सदी की तीसरी दहाई की शुरुआत में कोई भारत के भविष्य के बारे में कुछ बात करना चाहें, दुनिया के इस सबसे ‘बड़े जनतंत्र’ के बारे में कोई भविष्यवाणी करना चाहे तो क्या कह सकता है? दिल्ली से बमुश्किल 150-160 किलोमीटर दूर मथुरा शहर का सूरतेहाल बहुत कुछ संकेत दे सकता है। चंद रोज पहले लगभग 4.5 लाख आबादी के इस शहर में-जहां मुसलमानों की आबादी 18 फीसदी है और दलितों की आबादी लगभग 20 फीसदी है, सूबे के मुख्यमंत्रा योगी आदित्यनाथ ने खुद कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव के मौके पर उन्होंने मीट के व्यापार पर पाबंदी की घोषणा की तथा साथ ही मद्य के व्यापार को भी पाबंदी के दायरे में रखा। कहा गया कि जनता की मांग पर यह किया गया है। अब इस ऐलान के दस दिन बाद सरकार की तरफ से यह नोटिफिकेशन जारी हुआ है कि मथुरा-वृंदावन म्युनिसिपल कारपोरेशन के 70 में से 22 वार्ड ‘पवित्र तीर्थ स्थल’ के दायरे में आएंगे, जहां यह पाबंदी लागू होगी। एक अग्रणी अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट उजागर करती है कि किस तरह स्थानीय अधिकारियों को इस योजना पर अमल करने में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि कथित तौर पर ऐलान के पहले इसके बारे में कोई योजना भी नहीं बनाई गई है।

फिलवक्त यह नहीं बताया जा सकता कि वे तमाम लोग जो इस आकस्मिक कदम से बेरोजगार होंगे या उन्हें अपना व्यापार समेटना पड़ेगा, उनका क्या हाल होगा? आप गौर करेंगे कि यह किसी खास समुदाय विशेष का मामला नहीं है, न केवल मीट के धंधे में शामिल लोग इससे प्रभावित होंगे बल्कि होटलों में आटा तथा अन्य सामान पहुंचाने वाले दुकानदार भी प्रभावित होंगे। क्या वह इस बात में सुकून पा सकेंगे कि उन्हें ‘दूध बेचने की’ सलाह मिली है।

जाहिर है इस कदम से न केवल शहर की अच्छी खासी आबादी के लिए-जो मीट तथा अन्य गैरशाकाहारी चीजों का सेवन करती है-अपने आसपास में अपनी पसंद का भोजन मिलने में दिक्कत होगी।

क्या इसे एक तरह से ‘अपनी पसंद का भोजन करने के लोगों के अधिकार के अतिक्रमण’ के तौर पर देखा जा सकता है और बहुसंख्यक समाज के एक अल्पमत अलबत्ता मुखर तबके के नजरिये को शेष आबादी पर लागू करने के तौर पर समझा जा सकता है।

भारत की जनता का अब तक का सबसे आधिकारिक सर्वेक्षण जिसे ‘पीपुल आफ इंडिया सर्वे’ कहा गया था, जिसे एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया के तत्वावधान में अंजाम दिया गया, वह 1993 में पूरा हुआ था।

आठ साला इस अध्ययन का संचालन सर्वे के महानिदेशक कुमार सुरेश सिंह ने किया था, जिन्होंने भारत के हर समुदाय की हर रिवाज, हर रस्म का गहराई से अध्ययन किया।

सर्वेक्षण के अंत में सर्वे आफ इंडिया की टीम ने पाया कि देश में मौजूद 4,635 समुदायों में से 88 फीसदी मांसाहारी हैं।

वर्ष 2006 में सेंटर फॉर द स्टडी आफ डेवलपिंग सोसायटीज के तहत ‘हिंदू-सीएनएन-आईबीएन’ के सर्वेक्षण ने भी एंथ्रोपॉलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया के उपरोक्त अध्ययन की ताईद की थी और बताया था कि भारत का बहुमत सामिष भोजन करता है।

यह तथ्य भी उजागर हुआ था कि भारत के 31 फीसदी लोग ही निरामिष अर्थात शाकाहारी भोजन करते हैं। अगर हम नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़ों पर गौर करें, तो यही प्रवृत्ति दिखती है, जैसा कि यह सर्वेक्षण बताता है कि भले ही इस सर्वेक्षण के तहत अब तक महज 18 राज्यों की रिपोर्ट आई है, हम यह देख सकते हैं कि इन 18 राज्यों में से 15 राज्यों के 80 फीसदी लोग अंडा मांस तथा अन्य सामिष भोजन लेते हैं।

फिलवक्त आलम यह है कि अब तक भाजपा शासित 13 राज्यों में स्कूलों के मिड डे मील में अंडे को शामिल नहीं किया गया है।

हम याद कर सकते हैं कि किस तरह मध्यप्रदेश में सत्तासीन शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने मिड डे मील में अंडे देने का विरोध किया था और कहा था कि इसके बजाय बच्चों को केले दिए जाएं जबकि यह स्पष्ट था कि केले नाशवान होते हैं।

वैसे एक ऐसे मुल्क में जो विश्व भूख सूचकांक में सब सहारन मुल्कों से होड़ लेता दिखता है, जहां आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी चिरकालिक भूख का शिकार है और जो दुनिया के ‘वैश्विक भूख सूचकांक में 131 में नम्बर पर स्थित है’, यह बेहद क्रूर कदम है कि लोगों को विशिष्ट अन्न खाने से वंचित किया जाए।

बच्चे जो देश का भविष्य कहलाते हैं उन्हें सस्ते प्रोटीन के एकमात्र स्रोत अंडे से वंचित किया जाए, जबकि आहार विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते रहते हैं कि स्कूली बच्चों के मिड डे मील में अंडों को अनिवार्य किया जाए।

अंत में इस विरोधाभासपूर्ण स्थिति को कैसे समझा जाए कि जबकि भारत का बहुलांश सामिष भोजन पसंद करता है, जमीनी स्तर पर शाकाहार भोजन में कोई खास वृद्धि नहीं हुई है, लेकिन आज की तारीख में भी भारत में ऊपर से लागू शाकाहारवाद को वैधता मिलने में कोई दिक्कत नहीं होती।

क्या इसका ताल्लुक ‘शाकाहार करने वालों के बीच-जिनमें से बहुलांश ऊंची जातियों का है-बढ़ती दावेदारी की परिघटना से है।

यह दावेदारी ‘शुद्धता’ और ‘स्वीकार्यता’को लेकर बढ़ती आक्रामकता से है जिसके चलते ‘बीफ, पोर्क और अन्य सामिष पदार्थों की विश्वविद्यालयों, कैन्टीनों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर निरंतर उपस्थिति के प्रति अपना गुस्सा प्रगट करने से है या उसके प्रति पूरी तरह असहिष्णु होने से है।

आर्टिकल 14 का आलेख इस संदर्भ में गौरतलब है कि किस तरह ऊपर से लागू शाकाहारवाद-जिसे कानून एवं नीति की शक्ल प्रदान की जा रही है-किस तरह ‘संविधान के खिलाफ’ है और वह इस बात पर भी रोशनी डालता है कि कि यह प्रस्ताव ‘माइनोरिटेरीयन’अर्थात अल्पमतवादी है तथा ‘प्रभावी सवर्ण हिंदुओं में शाकाहारवाद के प्रति बढ़ते रूझान से संबंधित है।

बहरहाल, आला अदालत ने अपने एक अहम फैसले में निजता के अधिकार को मनुष्य के बुनियादी अधिकारों में शामिल किया था, तो फिर क्या यह कहना अनुचित होगा कि कौन क्या खाए या नहीं खाए, ऐसे फैसले आला अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले की मूल भावना की तौहीन करते हैं!


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