Saturday, March 14, 2026
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कर्म से मुक्ति

Amritvani 21


यदि व्यक्ति सोचे कि जब अच्छे-बुरे हर कर्म का फल भोगना ही पड़ेगा तो फिर क्यों न कर्म ही करना बंद कर दूं। जब कर्म ही नहीं करूंगा, तब फल भी नहीं मिलेगा और मैं मुक्त हो जाऊंगा। यह सोच बिल्कुल गलत है, बिना कर्म के तो कोई भी प्राणी रह नहीं सकता। अगर शरीर से कर्म नहीं करोगे तो मन से कर लोगे। फल तो दोनों का ही मिलेगा। व्यक्ति कर्म न करने से मुक्त नहीं हो सकता, बल्कि कर्म करके ही मुक्त हो सकता है। सवाल यह उठता है कि फिर कौन-सा कर्म किया जाए, जिसका फल न मिले। इसे गीता में निष्काम कर्म कहा गया है। निष्काम कर्म का मतलब है मन प्रभु में लीन हो और शरीर रोजमर्रा के काम में। कर्म न करने से तो पूरा समाज आलसी हो जाएगा और सामाजिक व्यवस्था बिखर जाएगी। इसलिए समाज के लिए उदाहरण बनने के लिए ही सही, कर्म तो करना ही है। योगी कर्मठ होता है, कर्मों से भाग कर संन्यास नहीं लेता, बल्कि कर्म करने की भावना को बदल देता है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं कि राजा जनक आदि भी कर्मों में निष्काम भाव लाकर योगी बन गए। हमें भी काम करने के तरीके में पवित्रता व मन की शुद्धि को बढ़ाना होगा। ऐसा करने से हम कर्म से नहीं बांधेंगे। इससे हमें शांति, आराम और हल्कापन महसूस होगा।

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय:।
लोकसङ्गहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि।।

राजा जनक जैसों ने भी कर्म (निष्काम कर्म) से ही सिद्धि को पाया था। इसलिए सामान्य लोगों को उदाहरण देने के लिए भी तुम्हें कर्म करना चाहिए। सार यह है कि कर्म बिना कुछ हो ही नहीं सकता, इसलिए कर्म तो अनिवार्य है।


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