Sunday, June 14, 2026
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गजा युद्ध के पहलू अनेक

Nazariya


TANVIR ZAFARIफलस्तीन के कई क्षेत्रों में इस्लामिक आंदोलन के रूप में सक्रिय संगठन हमास ने जब से इस्राइल पर एक साथ लगभग 7 हजार मिसाइलों की अकल्पनीय वर्षा की है उसके फौरन बाद से ही इस्राइल ने भी युद्ध की घोषणा करते हुए गजा पर ताबड़तोड़ हमले शुरू कर दिए हैं। अमेरिका सहित कई पश्चिमी देश हमास के हमले को आतंकवादी हमला बताते हुए इस्राइल के साथ खड़े हुए हैं। जबकि इस्लामी देश खासकर अरब जगत इस मुद्दे पर बंटा हुआ है। ले दे कर ईरान, सीरिया व लेबनान जैसे देश व वहां का नेतृत्व बिना इस बात की परवाह किए हुए फलस्तीनियों के साथ खड़ा है कि इस्राइल को महाशक्ति अमेरिकी समर्थन हासिल है। इस्राइल तो यह भी आरोप लगा रहा है कि हमास द्वारा इस्राइल पर दागी गयी लगभग 7 हजार मिसाइल व इसके कारण इस्राइल में हुई जान व माल की भारी तबाही के पीछे ईरान का हाथ है। परंतु ईरान ने इस हमले में अपनी संलिप्तता से तो इंकार जरूर किया है, परंतु उसने हमास और फलस्तीनियों के अधिकारों व उनके संघर्ष के प्रति अपना खुला समर्थन पूर्ववत जारी रखने का एलान भी किया है।
वेस्ट बैंक में भी हमास की मौजूदगी है। फिलहाल खंडहर के रूप में परिवर्तित हो चुके गजा को इस्राइली सेना चारों तरफ से घेर कर सैन्य कार्रवाही कर रही है। यहां तक कि उसने हवाई हमले भी किए हैं। इस्राइल ने तो फिलीस्तीनियों से गजा छोड़ कर चले जाने की भी चेतावनी दे डाली है। गौरतलब है की हमास का मुख्यालय भी गजा शहर में ही है जिसे पूरी तरह ध्वस्त करने का संकल्प इस्राइली नेता बेंजमिन नीतिनयाहु ले चुके हैं।
इस पूरे दुर्भाग्यपूर्ण घटना चक्र में केवल मानवता विरोधी युद्ध ही नहीं हो रहा बल्कि पूरा विश्व इस युद्ध व इसके कारणों के विभिन्न पहलुओं को लेकर भी चिंतित है। सबसे बड़ी चिंता इस युद्ध में यह है कि जिस तरह आनन फानन में अमेरिका ने अपनी सैन्य सहायता इस्राइल को सबसे पहले भेजी और उसके वरिष्ठ मंत्री भी इस्राइल आए और गए, उससे एक बात साफ नजर आ रही है कि इस्राइल इस समय यह लड़ाई केवल गजा में हमास नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए ही नहीं लड़ रहा, बल्कि इसके पीछे ईरान को उकसाने की भी पश्चिमी देशों की एक बड़ी साजिश है। तमाम अंतराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद ईरान का प्रगति के पथ पर निरंतर आगे बढ़ते रहना और पूरी तरह आत्म निर्भर बने रहना यहां तक कि सैन्य, विज्ञान व तकनीकी क्षेत्रों में भी शोधात्मक प्रगति करना पश्चिमी देशों को नहीं भा रहा है। यह किसी भी तरह ईरान को युद्ध में खींचना चाहते हैं। वर्तमान गजा युद्ध में भी इन देशों की यही कोशिश है कि गजा पर हो रहे इस्राइली जुल्म और उसे अमेरिकी समर्थन से क्रोधित होकर किसी तरह ईरान भी युद्ध में कूद पड़े। यदि ऐसा होता है तो उसके बाद इस युद्ध की क्या शक्ल होगी इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

दूसरा पहलू इस युद्ध का यह भी है कि इस्राइल व अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देश जो स्वयं शस्त्रों का उत्पादन व व्यवसाय करते हैं, उनके लिए इस तरह के युद्ध ही ‘उचित बाजार’ है। लिहाजा हथियार उत्पादन करने व मुख्यत: इसका व्यवसाय करने वाले देशों की दिलचस्पी शांति या युद्ध रोकने में नहीं, बल्कि युद्ध को और खतरनाक मोड़ तक ले जाने में रहती है। कई शस्त्र उत्पादक देश केवल अनेक देशों की सरकारों को उसके सैन्य प्रयोग के लिये ही हथियार नहीं बेचते बल्कि दुनिया के अनेक आतंकी संगठनों या कथित रूप से मुक्ति संघर्ष में लगे संगठनों को भी हथियार की आपूर्ति करते हैं। अन्यथा सोचिये कि दुनिया के तमाम आतंकी या मुक्ति संग्राम/आंदोलन के नाम पर भूमिगत होकर गुरिल्ला युद्ध करने वाले संगठनों के पास अत्याधुनिक हथियार आने का आखिर दूसरा कौन सा जरिया है? इसी इस्राइल-गजा संघर्ष के बीच दुनिया के सामने वह दस्तावेज भी खूब वायरल हो रहे हैं, जिसमें जर्मनी में हिटलर से सताए गए यहूदी जहाजों में भरकर फलस्तीन में शरण मांग रहे हैं और फलस्तीनी समुद्र तट पर लगे अपने जहाज पर उन्होंने एक बैनर लगा रखा है, जिस पर शरण की भीख मांगते हुये यह लिखा, जर्मनी ने हमारे घर परिवार को तबाह व बर्बाद कर दिया है अब आप हमारी उमीदों को मत कुचलना।

गौर तलब है कि 1941-45 के मध्य जर्मन तानाशाह हिटलर ने लगभग 60 लाख यहूदियों को तरह तरह की यातनाए देकर मार दिया था। यह जर्मनी में कुल यहूदियों की आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा था। कहा जाता है कि बचे यहूदियों को देश से बाहर निकालते समय भी हिटलर ने कहा था कि-मैं चाहता तो इन्हें भी मार देता। मगर मैंने इन्हें जिंदा इसलिये छोड़ दिया ताकि दुनिया देखे कि मैंने इन्हें क्यों मारा। केवल आठ दशकों के अपने शरणार्थी रूपी प्रवास के दौरान जिस तरह यहूदियों ने फलस्तीन की जमीन पर कब्जा करने व इन्हें इनकी जमीन से बेदखल करने तक का षडयंत्र पश्चिमी देशों की मिली जुली साजिश से रचा है, उसे देखकर यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि भविष्य में किसी देश के सताये हुए लोग या असुरक्षा, हिंसा, प्रताड़ना या विद्वेष के शिकार वर्ग या समुदाय विशेष के लोग यदि किसी देश में शरण मांगेंगे तो उस देश को पूरा अधिकार है कि वह फलस्तीन के साथ हुए दुनिया के सबसे बड़े धोखे को मद्देनजर रखते हुये ही कोई निर्णय ले? आज युद्ध के समय फलस्तीन को खुलकर मुस्लिम जगत व अन्य कई देशों का का समर्थन हासिल न हो पाना इस्राइली रणनीति का परिणाम है।


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