Monday, April 13, 2026
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ईश्वर शुभ करता है

 

 

Sanskar 4


यदि हमारे किसी भी कार्य की सफलता में विलम्ब हो रहा हो, तो उसे भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए। जिस प्रकार हम अपने बच्चों को उत्तम से उत्तम वस्तुएं देने का प्रयास करते हैं, उसी प्रकार वह मालिक भी अपने बच्चों को वही देता है जो उनके लिए उत्तम होता है। ईमानदारी से अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी चाहिए और उस परमपिता परमात्मा की कृपा के लिए हर पल, हर क्षण उसका स्मरण करते रहना चाहिए।

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बाजार में जिस भी अच्छी, नई व सुंदर वस्तु को मनुष्य देखता है, उसे उसी क्षण से पाने का प्रयास करने लगता है। यह तो आवश्यक नहीं कि मनुष्य उस वस्तु को प्राप्त कर ही ले। ईश्वर मनुष्य को जीवन में वही सब कुछ देता है जो उसके लिए उचित होता है। वह अपनी सन्तान हम मनुष्यों का सदा ही हित चाहता है। इसलिए जो हमारे लिए हितकर होता है, वह बिना कहे प्रसन्न होकर समयानुसार हम मनुष्यों को दे देता है। मनुष्य को उसका मनचाहा सब कुछ सदा ही प्राप्त हो जाए, यह भी आवश्यक नही होता।

मनुष्य सदा ही ईश्वर से कुछ-न-कुछ मांगता रहता है पर उसे वह हर वस्तु नहीं मिल सकती जिसकी वह कामना करता है। इस संसार में हम भौतिक माता-पिता अपने बच्चों के लिए सब प्रकार के साधन जुटाते रहते हैं परन्तु वह उन्हें नहीं दिलवाते जो हमारे हिसाब से उनकी नाजायज मांग होती है। उसके लिए वे चाहे कितने हाथ-पैर पटक लें, कितना ही रोना-धोना क्यों न कर लें। उनकी इच्छा को पूरा नहीं किया जाता।

इस विषय से सम्बन्धित एक बोधकथा कुछ समय पहले पढ़ी थी। आप भी इस पर विचार कीजिए। कुछ संशोधन के साथ कथा प्रस्तुत कर रही हूं जो इस प्रकार है-

कहते हैं एक बार स्वर्ग से घोषणा हुई, भगवान सेब बांटने आ रहे हैं। आप सब लोग तैयार हो जाइए।
सभी लोग भगवान से प्रसाद लेने के लिए तैयार होकर लाइन लगाकर खड़े हो गए। एक छोटी बच्ची बहुत उत्सुक थी क्योंकि वह पहली बार भगवान को देखने जा रही थी। एक बड़े और सुंदर सेब के साथ-साथ भगवान के दर्शन की कल्पना से ही वह खुश हो रही थी। अन्त में प्रतीक्षा समाप्त हुई। बहुत लंबी कतार में जब उसका नंबर आया तो भगवान ने उसे एक बड़ा और लाल रंग का सेब दिया लेकिन जैसे ही वह सेब पकड़कर लाइन से बाहर निकली, उसका सेब हाथ से छूटकर कीचड़ में गिर गया।

बच्ची उदास हो गई कि भगवान का दिया हुआ प्रसाद व्यर्थ हो गया। अब उसे दुबारा से लाइन में लगना पड़ेगा। दूसरी लाइन पहले से भी लंबी थी लेकिन कोई और रास्ता भी तो नहीं था। सब लोग ईमानदारी से अपनी-अपनी बारी से सेब लेकर जा रहे थे। अब वह बच्ची फिर से लाइन में लगी और अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगी। आधी कतार को सेब मिलने के बाद सेब खत्म होने लगे। अब तो वह बच्ची बहुत निराश हो गई। उसने सोचा कि उसकी बारी आने तक तो सभी सेब खत्म हो जाएँगे लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि भगवान के भण्डार कभी खाली नहीं होते। जब तक उसकी बारी आई, तब तक और नए सेब आ गए थे।

भगवान तो अंतरयामी होते हैं। बच्ची के मन की बात जान गए। उन्होंने इस बार बच्ची को सेब देकर कहा, पिछली बार वाला सेब एक तरफ से सड़ चुका था। तुम्हारे लिए सही नहीं था इसलिए मैंने ही उसे तुम्हारे हाथों गिरवा दिया था। दूसरी तरफ लंबी कतार में तुम्हें इसलिए लगाया क्योंकि नए सेब अभी पेडों पर थे। उनके आने में समय बाकी था। इसलिए तुम्हें अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ी। ये सेब अधिक लाल, सुन्दर और तुम्हारे लिए उपयुक्त है।

भगवान की यह बात सुनकर बच्ची बहुत ही सन्तुष्ट हो गई। वह अपने हिस्से का सेब लेकर वहाँ से चली गई।
इसी प्रकार यदि हमारे किसी भी कार्य की सफलता में विलम्ब हो रहा हो, तो उसे भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए। जिस प्रकार हम अपने बच्चों को उत्तम से उत्तम वस्तुएं देने का प्रयास करते हैं, उसी प्रकार वह मालिक भी अपने बच्चों को वही देता है जो उनके लिए उत्तम होता है। ईमानदारी से अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी चाहिए और उस परमपिता परमात्मा की कृपा के लिए हर पल, हर क्षण उसका स्मरण करते रहना चाहिए।

वह मालिक परम न्यायकारी है। वह सबके साथ समानता का व्यवहार करता है। हमारे द्वारा किए गए शुभाशुभ कर्मों के अनुसार वह यथासमय हम जीवों को उनका फल देता रहता है। उस पर अविश्वास नहीं करना चाहिए बल्कि अपने कर्मों की शुचिता की ओर ध्यान देना चाहिए। किसी कवि ने हमें समझाते हुए कहा है-
ईश्वर: यत करोति शोभनमेव करोति।

अर्थात ईश्वर जो करता है, हमारे भले के लिए ही करता है। इसलिए उस पर आस्था बनाए रखनी चाहिए।

चंद्र प्रभा सूद


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