
2014 का नारा याद है? ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार।’ तब पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर भाजपा ने कांग्रेस सरकार को घेरा, रैलियों में बैनर लगे, भाषणों में तंज कसे गए। लोगों को सपना दिखाया गया कि महंगाई से राहत मिलेगी। लेकिन नतीजा क्या हुआ? अगले 10 सालों में जनता की जेब से सीधे 46 लाख करोड़ रुपए सरकार ने वसूले -सिर्फ पेट्रोल और डीजल पर टैक्स लगाकर। अब सरकार इस वसूली को नए स्तर पर ले जाने की तैयारी कर रही है। 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की बिक्री अनिवार्य करने के मामले पर सुनवाई हुई है। सरकार इसके पक्ष में है, क्योंकि नितिन गडकरी के सुपुत्र इथेनॉल की दो सबसे बड़ी कंपनियां चलाते हैं। इस कहानी में कोई बहुत पेंच ओ खम नहीं है। बहुत सीधा सा गणित है।
पेट्रोल से इस वसूली की कहानी शुरू होती है 2013 के मध्य से। तब भाजपानीत यशस्वी सरकार का गठन नहीं हुआ था। और जनता के खाते में 15 लाख रुपए डालने का वादा भी हवाओं ने नहीं उछला था, लेकिन महंगाई की मार को लेकर हवा बनने लगी थी। 2014 में जब सरकार बनी तो इसका ठीक उल्टा हुआ। सरकार ने पेट्रो उत्पाद पर सब्सिडी बंद की और जनता की जेब से टैक्स के जरिए करोड़ों खींच लिए। 2014 में जब मोदी सरकार आई, तब कच्चे तेल (क्रूड आॅयल) की कीमतें औसतन 110 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 50-60 डॉलर पर आ गर्इं थीं। सामान्य आर्थिक नियम कहता है कि अगर कच्चा तेल सस्ता है, तो पेट्रोल-डीजल भी सस्ता होना चाहिए। लेकिन यहां खेल अलग था-सरकार ने बेस प्राइस घटने का फायदा जनता तक नहीं पहुंचने दिया, उल्टा एक्साइज ड्यूटी और टैक्स कई गुना बढ़ा दिए।
2014 में पेट्रोल पर केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी थी सिर्फ 9.20 रुपये प्रति लीटर। 2021 तक यही टैक्स बढ़कर 32.90 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया और इसी तरह डीजल पर टैक्स 3.46 रुपये से बढ़ाकर 31.80 रुपये प्रति लीटर कर दिया। यानी, कच्चा तेल सस्ता हुआ, लेकिन जनता पर बोझ बढ़ता गया।
तेल मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2014 से 2024 के बीच सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स और ड्यूटी से 46 लाख करोड़ रुपये की कमाई की। अकेले 2020-21 में सरकार ने तेल पर टैक्स से 4.55 लाख करोड़ रुपये वसूले। आसानी के लिए इस वसूली को ऐसे समझिए कि यह पैसा उस साल जीएसटी से हुई कुल कमाई से भी ज्यादा था। अब अंदाजा लगाएं कि सरकार नियमों में बदलाव करके टैक्स के जरिए कैसे वसूली कर रही है। पिछले 10 सालों में यह वसूली की रकम लगातार बढ़ती गई, और अंतत: 46 लाख करोड़ तक पहुंच गई। यानी, 15 लाख का वादा तो ‘जुमला’ निकला, लेकिन बदले में सरकार ने हर आदमी की जेब से हजारों-लाखों वसूले हैं। आॅटो से लेकर ट्रक, ट्रैक्टर से लेकर बस-हर चीज पेट्रोल-डीजल पर चलती है। जब पेट्रोल-डीजल महंगे हुए, तो ट्रांसपोर्ट महंगा हुआ। जब ट्रांसपोर्ट महंगा हुआ, तो सब्जी, दूध, दवा, कपड़े-सब महंगे हो गए। यानी महंगाई की सबसे बड़ी जड़ खुद सरकार का लालच बना।
भाजपा ने 2014 में जो वादा किया था कि वे महंगाई कम करेंगे। लेकिन हुआ यह कि महंगाई के खिलाफ नारा लगाकर सत्ता में आए और खुद महंगाई के सबसे बड़े कारण बन गए। ‘विकास’ और ‘डिजिटल इंडिया’ के नारों के बीच, आम आदमी की जेब सरकार का एटीएम बन गई। अब आगे इस वसूली को और तेज करने की तैयारी है। इसमें इथेनॉल को अनिवार्य करते हुए मंत्री पुत्रों को सीधे फायदा पहुंचाया जाना है। इसी में इन सवालों के जवाब भी छुपे हैं कि अगर कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद सरकार ने पेट्रोल-डीजल महंगा रखा, तो यह पैसा कहां गया? क्या यह जनता को राहत देने में इस्तेमाल हुआ? या फिर कॉरपोरेट मित्रों की जेबें भरने और चुनावी शो-आॅफ में खर्च कर दिया गया? 46 लाख करोड़ कोई छोटी रकम नहीं है। इतने पैसे में देश के हर युवा को शिक्षा, हर गरीब को स्वास्थ्य और हर किसान को स्थायी सहायता मिल सकती थी। लेकिन हुआ यह कि सरकार ने इस ‘नई टैक्स वसूली’ को सामान्य बना दिया, जिसे अब नया और बड़ा रूप दिया जाना बाकी है।

