Friday, March 20, 2026
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प्राइमरी शिक्षा: दावे बड़े, जमीनी हकीकत कुछ और…

  • छोटे बच्चे आज भी जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर, स्कूलों में नहीं शौचालयों की व्यवस्था

जनवाणी संवाददाता |

मेरठ: योगी सरकार प्रदेश में शिक्षा विभाग में सुधार के लाख दावे कर रही हैं,लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। जनवाणी टीम द्वारा चलाई गई मुहिम के द्वारा बेसिक शिक्षा विभाग से संचालित स्कूलों में देखने को मिला है कि न तो छात्र-छात्राओं के पास पूरी किताबें पहुंची है और न ही यूनिफार्म। इतना ही नहीं इन स्कूलों में बेसिक सुविधाएं तक मौजूद नहीं है। ऐसे में कैसे पढ़ेगा इंडिया और कैसे बढ़ेगा इंडिया।

बता दें कि जिले में सरकारी प्राथमिक शिक्षा का बुरा हाल है। प्रदेश में योगी सरकार आने के बाद कक्षा एक से आठवीं तक के सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को सुधारने की बात कही गई थी, लेकिन जिला स्तर पर बैठे शिक्षाधिकारियों द्वारा न तो स्कूलों में जाकर शिक्षण व्यवस्था को परखा जा रहा है और न ही स्कूलों की बदहाल व्यवस्था में सुधार के लिए कोई प्रयास हो रहा है।

जिले के स्कूलों की बात करे तो 1406 परिषदीय विद्यालय यहां मौजूद है। जिसमें 910 प्राइमरी, 432 उच्च प्राथमिक और कक्षा 8 तक के 132 विद्यालय है। जिनमें 129196 छात्र-छात्राएं पंजीकृत है। कोरोना के कारण दो साल से कक्षा एक से आठवीं तक के विद्यालय बंद चल रहे थे, लेकिन एक सितंबर से इन विद्यालय को खोल दिया गया था।

गौर करने वाली बात यह है कि अभी तक छात्र-छात्राओं को बेसिक शिक्षा विभाग किताबें तक मुहिया नहीं करा पाया है। इतना ही नहीं विद्यालयों के शिक्षक भी मानते है कि शिक्षा विभाग की कमी के कारण स्कूलों को बेसिक सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही है।

योगी सरकार द्वारा शिक्षा व्यवस्था को लगातार बेहतर बनाने के दमाम दावों के बीच बदहाल शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर कागजी आंकड़ों से कुछ अलग दिखाई दे रही है। सरकारी स्कूलों को पब्लिक स्कूलों से टक्कर देने के विभागीय दावें हवाई साबित हो रहे है। ऐसे में इन स्कूलों में शिक्षा ग्रहण कर रहे बच्चों के भविष्य का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

छतों में लगी है दीमक

केसरगंज स्थित कंपोजिट विद्यालय व राजकीय कन्या जूनियर हाईस्कूल समेत लिसाड़ी गेट में पढ़ने वाले कई स्कूलों की छत से कही तो बरसात में पानी टपकता है तो कही स्कूल की छतों में दीमक लग चुकी है। दीवारों में बरसात के कारण सिलन आ चुकी है और ऐसे में दीवारे पेंट छोड़ रही है।

वहीं स्कूलों में सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति न होने की वजह से साफ-सफाई भी नहीं हो पा रही है। विद्यालय प्रांगण में लंबी-लंबी घास खड़ी हुई है और पानी भी भरा हुआ है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा रहा है कि सरकार का स्कूल चलो अभियान व सर्व शिक्षा अभियान कितना सफल होगा।

छात्रों को बैठने के लिए फर्नीचर तक नहीं

जहां दर्जनों स्कूलों में चारदीवारी नहीं है। वहीं कक्षा छह से आठवीं तक के स्कूलों के लिए तो सरकार की ओर से फर्नीचर की व्यवस्था की गई हैं,लेकिन कक्षा एक से पांच तक के स्कूलों में फर्नीचर की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। इसलिए इन स्कूलों के छात्र-छात्राओं को आज भी टाट की पट्टी बैठकर पढ़ना पढ़ रहा है।

कक्षा छह से आठ तक के स्कूलों में फर्नीचर व्यवस्था होने के बाद भी कुछ विद्यालय के छात्र आज भी बिना फर्नीचर के बैठकर पढ़ाई करने के लिए मजबूर है। क्योंकि वहां बजट आने के बाद भी फर्नीचर की व्यवस्था नहीं की गई है।

समय से पहले बंद हो जाते है विद्यालय

जिले में बेसिक शिक्षा विभाग के दो बड़े अधिकारी बैठते है एडी बेसिक और बीएसए मगर उसके बावजूद शहर के कक्षा एक से आठ तक के स्कूलों की हालत खराब है। यदि बेसिक शिक्षा विभाग के स्कूलों के निरीक्षण के लिए साल दो साल में कोई अधिकारी या मंत्री आता भी है तो उनकों गिने चुने स्कूलों का भ्रमण करा शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बता दिया जाता हैं।

शहरी स्कूलों का हाल खराब है तो उसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्र में पढ़ने वाले स्कूलों के क्या हालात होंगे। अधिकारी प्रतिदिन कार्यालय में तो बैठते है,लेकिन उनके पास कुर्सी से उठकर विद्यालयों में जाकर निरीक्षण करने तक का समय नहीं है।

जिसका फायदा शिक्षक भी उठा रहे है और समय से पहले ही विद्यालयों की छुट्टी कर दी जाती है या फिर छात्र-छात्राएं कक्षाएं में न बैठकर बाहर खेलते नजर आते है।

इनका है कहना

बेसिक शिक्षाधिकार योगेंद्र कुमार का कहना है कि स्कूलों का निरीक्षण किया जा रहा है। लापरवाही मिलने पर कार्रवाई भी हो रही है। सरकार की योजनाओं का लाभ भी छात्र-छात्राओं तक पहुंचाया जा रहा है।

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