Saturday, June 19, 2021
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क्या हम मूढ़तंत्र की ओर बढ़ रहे हैं ?

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हर तरफ गवर्नेंस की विफलता दिख रही है। महंगाई बढ़ रही है, महंगाई भत्ते कम हो रहे हैं, इलाज के अभाव में लोग मर रहे हैं। दो नए वायरस डेल्टा और कप्पा ने लोगों को तबाह करना शुरू कर दिया है। पांच ट्रिलियन की इकोनॉमी के सपने दिखाने वाली सरकार की जीडीपी माइनस 7.3 प्रतिशत तक गिर जाने का अनुमान है। बांग्लादेश तक हमसे आगे निकल गया है। अरुणाचल और लद्दाख में ‘न कभी घुसा था और न घुसा है’, वाला चीन, दक्षिणी छोर पर कुछ ही नॉटिकल मील की दूरी पर श्रीलंका के एक बंदरगाह में मंदारिन में अपने आ जाने की सूचना दे रहा, उसने दुनिया की सबसे प्राचीन माने जाने वाली द्रविड़ सभ्यता और तमिल भाषा को श्रीलंका से बेदखल करने का मन बना लिया है। और सरकार, एक राज्य में चुनाव हार जाने की खीज, एक अनावश्यक मुद्दे को तूल देकर एक रिटायर्ड नौकरशाह का जवाब तलब कर के उतार रही है।

यहीं यह सवाल उठता है कि, आखिर हम किस गवर्नेंस की ओर जा रहे हैं ? क्या हम मूढ़तंत्र यानी काकिस्टोक्रेसी की ओर जा रहे हैं? अनेक शासन पद्धतियों के बीच एक अल्पज्ञात शासन पद्धति है काकिस्टोक्रेसी। इसका अर्थ है, सरकार की एक ऐसी प्रणाली, जो सबसे खराब, कम से कम योग्य या सबसे बेईमान नागरिकों द्वारा संचालित की जाती है। इसे कोई शासन प्रणाली नहीं कही जानी चाहिए, बल्कि इसे किसी भी लोकतांत्रिक प्रणाली के एक ग्रहण काल की तरह कहा जा सकता है, जब हम निकम्मे लोगों द्वारा शासित हो रहे हों तब। यह शब्द 17 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में इस्तेमाल किया गया, जब फ्रांस का लोकतंत्र और इंगलैंड का शासन गड़बड़ाने लगा था। इंग्लैंड ने तो अपनी समृद्ध लोकतांत्रिक परम्परा के कारण खुद को संभाल लिया था, पर फ्रांस खुद को संभाल नहीं पाया था। तब अयोग्य और भ्रष्ट लोगों द्वारा शासित होने के कारण, 1829 में यह शब्द एक अंग्रेजी लेखक द्वारा इस्तेमाल किया गया था। मैंने अपनी समझ से इसका हिंदी नाम मूढ़तंत्र रखा है। मुझे शब्दकोश में इसका शाब्दिक अर्थ नहीं मिला।

इसका शाब्दिक अर्थ यूनानी शब्द काकिस्टोस जिसका मतलब ‘सबसे खराब’ होता है और क्रेटोस यानी ‘नियम’, को मिला कर बनता है, सबसे खराब विधान। ग्रीक परंपरा से आया यह शब्द पहली बार अंग्रेजी में इस्तेमाल किया गया था, फिर राजनीति शास्त्र के विचारकों ने इसे अन्य भाषाओं में भी रूपांतरित कर दिया।

यह कोई मान्य शासन प्रणाली नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र का ही एक विकृत रूप है। लोकतंत्र जब अपनी पटरी से उतरने लगता है और शासन तंत्र में कम पढ़े-लिखे और अयोग्य लोग आने लगते हैं तो व्यवस्था का क्षरण होने लगता है। उस अधोगामी व्यवस्था को नाम दिया गया काकिस्टोक्रेसी। लोकतंत्र में सत्ता की सारी ताकत जनता में निहित है। जनता अपना प्रतिनिधि चुनती है और वे चुने हुए प्रतिनिधि एक संविधान के अंतर्गत देश का शासन चलाते हैं। शासन को सुविधानुसार चलाने के लिए प्रशासनिक तंत्र गठित किया जाता है, जो ब्यूरोक्रेसी के रूप में जाना जाता है। ब्यूरोक्रेसी, सभी प्रशासनिक तंत्र के लिए संबोधित किया जाने वाला शब्द है। जिसने पुलिस, प्रशासन, कर प्रशासन आदि-आदि सभी तंत्र सम्मिलित होते हैं। इसी को संविधान में कार्यपालिका यानी एक्जीक्यूटिव कहा गया है।

ब्यूरोक्रेसी मूलत: सरकार यानी चुने हुए प्रतिनिधियों के मंत्रिमंडल के अधीन उसके दिशा निर्देशों के अनुसार काम करती है। पर ब्यूरोक्रेसी उस मन्त्रिमण्डल का दास नहीं होती है और न ही उनके हर आदेश और निर्देश मानने के लिये बाध्य ही होती है। ब्यूरोक्रेसी का कौन सा तंत्र कैसे और किस प्रक्रिया यानी प्रोसीजर और विधान यानी नियमों उपनियमों के अधीन काम करती है, यह सब संहिताबद्ध है। नौकरशाही से उन्हीं संहिताओं का पालन करने की अपेक्षा की जाती है। पर यहीं पर जब ब्यूरोक्रेसी कमजोर पड़ती है या स्वार्थवश मंत्रिमंडल के हर काम को दासभाव से स्वीकार कर नतमस्तक होने लगती है तो प्रशासन पर इसका बुरा असर पड़ता है और एक अच्छी खासी व्यवस्था पटरी से उतरने लगती है।

लोकतंत्र में जनता का यह सर्वोच्च दायित्व है कि वह जब भी चुने अच्छे और योग्य लोगों को ही चुने और न ही सिर्फ उन्हें चुने, बल्कि उन पर नियंत्रण भी रखे। यह नियंत्रण, अगर चुने हुए प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का कोई प्राविधान संविधान में नहीं है तो, वह मीडिया, स्थानीय प्रतिनिधि पर दबाव, आंदोलन आदि के द्वारा ही रखा जा सकता है और दुनिया भर में जहां-जहां लोकशाही है, जनता अक्सर इन उपायों से अपनी व्यथा और नाराजगी व्यक्त करते हुए नियंत्रण रखती भी है।

इसीलिए दुनिया भर में जहां-जहां भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है, वहां-वहां के संविधान में मौलिक अधिकारों के रूप में अभिव्यक्ति और प्रेस की आजादी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। जनता का यह दायित्व और कर्तव्य भी है कि वह निरन्तर इस अधिकार के प्रति सजग और जागरूक बनी रहे और जिन उम्मीदों से उसने सरकार चुनी है उसे जब भी पूरी होते न देखे तो निडर हो कर आवाज उठाए। इसीलिए लोकतंत्र में विरोध की आवाज को पर्याप्त महत्व दिया है और विरोध कोई हंगामा करने वाले अराजक लोगों का गिरोह नहीं है वह सरकार को जागरूक करने उसे पटरी पर बनाए रखने के उद्देश्य से अवधारित किया गया है। यह बात अलग है कि इसे देशद्रोही कह कर संबोधित करने का फैशन हो गया है।

लोकतंत्र तभी तक मजबूत है जब तक जनता अपने मतदान के अधिकार के प्रति सचेत है और सरकार चुनने के बाद भी इस बात पर सचेत रहे कि चुने हुए प्रतिनिधि उसके लिए, उसके द्वारा चुने गए हैं। पर हम चुन तो लेते हैं पर चुनने के बाद सरकार को ही माई-बाप मानते हुए उसके हर कदम का दुंदुभिवादन करने लगते हैं। यही ठकुरसुहाती भरा दासभाव लोकतंत्र को क्षरित करता है और ऐसे ही लोकतंत्र फिर, धीरे-धीरे मूढ़तंत्र में बदलने लगता है।

एक अच्छा प्रशासक और सरकार कभी भी द्वेषभाव से काम नहीं करती है। पर मोदी सरकार का स्थायी भाव ही द्वेष भाव है। सरकार ने जिस रिटायर्ड अफसर अलपन बंदोपाध्याय को धारा 51, डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के अंतर्गत एक नोटिस जारी किया है, उसमे एक साल की सजा का प्रावधान है। पर केंद्र सरकार को यूपी में महामारी की भयावह दुरवस्था, गंगा में बहते शव, रेत में दफन मुर्दे, उनके कफन घसीटते लोग, आॅक्सीजन की कमी से तड़प-तड़प कर मरते लोग, घर की जमापूंजी बेच कर निजी अस्पतालों में अपना सब कुछ गंवा कर मृतक मरीज लेकर लौटते लोग, चुनाव के दौरान सैकड़ों मरे हुए शिक्षक और कर्मचारी नहीं दिखते हैं क्योंकि यहां वही दल सत्ता में है जो केंद्र में है।


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