Saturday, May 16, 2026
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…तो ऐतिहासिक छपरौली भी नहीं तोड़ पाई पिछला रिकॉर्ड

  • छपरौली में 2017 में 62.95 प्रतिशत हुआ था मतदान, इस बार मतदान प्रतिशत रहा कम
  • बड़ौत और बागपत विधानसभा सीटों पर पिछले रिकॉर्ड को तोड़ा, बागपत सबसे आगे रहा

जनवाणी संवाददाता  |

बागपत: ऐतिहासिक छपरौली के मतदाताओं में इस बार 2017 के मुकाबले ज्यादा उत्साह नजर नहीं आया। क्योंकि 2017 में छपरौली विधानसभा सीट पर 62.95 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि इस बार 0.58 प्रतिशत कम ही हुआ है।

इस बार 62.37 प्रतिशत मतदान हुआ है। देखा जाए तो बागपत व बड़ौत के मतदाताओं ने प्रतिशत जरूर बढ़ाया है। बड़ौत सीट पर भी पिछले चुनाव के सापेक्ष ज्यादा रूचि नहीं दिखी और 1.09 प्रतिशत ज्यादा ही वोट डाली गई। बड़ौत सीट पर पिछले चुनाव में 64.29 प्रतिशत वोटिंग हुआ था, जबकि इस बार 65.30 प्रतिशत हुआ है। बागपत के मतदाताओं ने जरूर अधिक रूचि दिखाई और 2.39 प्रतिशत अधिक वोटिंग की।

छपरौली का कम मतदान किस पार्टी को नुकसान कर सकता है, इसका परिणाम 10 मार्च को आएगा, लेकिन बागपत सीट का बंपर मतदान जरूर प्रत्याशी के लिए फायदा भी हो सकता है और टेंशन का भी हो सकता है।

विधानसभा चुनाव के रण में राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशियों ने खूब जोर आजमाइश की और घर-घर जाकर अपने पक्ष में अधिक से अधिक वोट की अपील की। प्रत्याशियों की ओर से तमाम बंदोबस्त भी बूथ तक वोटरों को ले जाने के लिए किए गए थे।

प्रशासन ने भी मतदाताओं को जागरूक करने के लिए अभियान चलाया था और वोट प्रतिशत बढ़ाने के लिए मशक्कत की, लेकिन ज्यादा प्रभाव नहीं रहा। जिस सीट पर सभी की निगाहें टिकी थी उस सीट पर वोट प्रतिशत 2017 के मुकाबले कम ही रहा। यहां बात हो रही है ऐतिहासिक सीट छपरौली की। छपरौली के मतदाताओं में 2017 के मुकाबले 2022 के चुनाव में भी अधिक रूचि नहीं दिखी।

इतना जरूर है कि 2017 और 2022 के चुनाव के वोट प्रतिशत में ज्यादा अंतर नहीं आया। यानी जो उन्हीं मतदाताओं की रूचि दिखी जिनकी 2017 में रही थी। छपरौली में 2017 में 62.95 प्रतिशत वोटिंग हुआ था, जबकि इस बार 62.37 प्रतिशत वोटिंग हुआ है। यानी इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले 0.58 प्रतिशत कम हुआ है। यहां कम वोट प्रतिशत समझ से परे है।

यह रालोद-सपा गठबंधन को फायदा पहुंचाएगा या फिर भाजपा के लिए फायदे का सौदा बनेगा, इसका परिणाम तो 10 मार्च को आएगा, लेकिन गुणाभाग जरूर प्रत्याशियों को चिंतित कर सकता है। इसके अलावा बागपत व बड़ौत सीट के मतदाताओं ने जरूर थोड़ी रूचि अधिक दिखाई है।

बड़ौत के मतदाताओं ने भी पिछले चुनाव के सापेक्ष ज्यादा रूचि नहीं दिखाई। 2017 में बड़ौत विधानसभा सीट पर 64.29 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि इस बार 65.30 प्रतिशत मतदान हुआ है। यहां महज 1.09 प्रतिशत मतदान ही बढ़ा है।

इस सीट पर मतदान प्रतिशत बढ़ना, किसके लिए फायदा करेगा, इसका परिणाम बाद में आएगा, लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि गठबंधन को भी इस बार बंपर वोट मिले हैं और भाजपा के वोट बैंक में भी बढ़ोत्तरी की उम्मीद लगाई जा रही है।

कौन अधिक ले गया, यह तो परिणाम ही बताएंगे? अब बात बागपत विधानसभा सीट की करें तो यहां के मतदाताओं में सबसे अधिक रूचि दिखाई दी। बागपत सीट पर 2017 में 65.91 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि इस बार यहां 68.30 प्रतिशत मतदान हुआ है। यहां 2.39 प्रतिशत अधिक मतदान हुआ है।

बागपत सीट का बंपर मतदान गठबंधन का फायदा देगा या भाजपा के लिए सौगात होगा, यह तो परिणाम ही बताएगा, लेकिन गठबंधन इसे अपना फायदा मानकर चल रहा है। राजनीतिक गलियारों में गुणाभाग के आंकड़ों को लगाया जा रहा है।

बंपर मतदान से जीत के आंकड़े भी फिट किए जा रहे हैं। बागपत व बड़ौत में मतदान प्रतिशत बढ़ाने में प्रत्याशी कामयाब हुए और प्रशासन भी हुआ, लेकिन छपरौली में न प्रत्याशियों की भागदौड़ काम आई और न ही प्रशासन की जागरूकता का असर दिखा। वहां मतदान प्रतिशत बढ़ने के बजाय कम ही दिखा। अब देखना यह है कि तीनों सीटों पर हुआ मतदान किसके सिर पर विजयी ताज पहनाता है?

जिले का नहीं बन पाया रिकॉर्ड

चुनाव से पहले प्रशासन ने 80 प्रतिशत से ऊपर मतदान का लक्ष्य रखा था। क्योंकि 2017 के चुनाव मेें 64.4 प्रतिशत मतदान हुआ था। जिसके बढ़ाने के लिए खूब जोर आजमाइश की गई। माध्यमिक शिक्षा विभाग को विशेष रूप से लगाया गया था।

मतदाताओं को फोन करके वोट डालने तक की जुगत लगाई गई। प्रत्याशियों की ओर से भी प्रबंध किए गए, लेकिन ज्यादा प्रतिशत नहीं बढ़ा। इस बार 65.42 प्रतिशत ही मतदान हुआ।

यानी इस बार एक प्रतिशत मतदान ही बढ़ाया जा सका है। इतनी भागदौड़ के बाद भी ज्यादा मतदान प्रतिशत नहीं बढ़ा। हालांकि पिछले चुनाव का रिकॉर्ड जरूर टूटा है, लेकिन ऐतिहासिक रिकॉर्ड बनाने के लिए मतदाताओं में रूचि नहीं दिखी।

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