Wednesday, May 27, 2026
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हादसों की जद में क्यों हैं अस्पताल

SAMVAD 2


KRISHNA PRATAP SINGH 2अभी देशवासी महाराष्ट्र में नासिक नगर निगम के जाकिर हुसैन अस्पताल में आक्सीजन टैंक में लीकेज से निपटने की कार्रवाई में चौबीस मरीजों के जान से हाथ धोने के हादसे का शोक ठीक से सह भी नहीं पाए थे कि उसके पालघर जिले के विरार स्थित चार मंजिले विजयवल्लभ कोविड केयर अस्पताल के आईसीयू में आग लगने से तेरह मरीजों की मौत हो गई है। शुक्रवार को सुबह लगभग तीन बजे हुए इस अग्निकांड के बाद अस्पताल के 21 मरीजों को गम्भीरावस्था में दूसरे अस्पतालों में ले जाना पड़ा है। इनमें से किसी भी हादसे का किसी भी तरह से बचाव नहीं किया जा सकता। यह कहकर भी नहीं कि कोरोना की महामारी से जूझती देश की स्वास्थ्य व्यवस्था उसकी अभूतपूर्व चुनौती से जूझती हुई इस कदर हलकान है कि इस हादसे में जाने गंवाने वालों और उनके परिजनों के साथ ही उसके प्रति भी थोड़े सहानुभूति पूर्ण ढंग से सोचा जाना चाहिए। यकीनन जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है, ‘यह हृदयविदारक है।’ इस अर्थ में तो और भी हृदयविदारक कि नासिक के अस्पताल के जिस आक्सीजन भंडारण टैंक में हुए लीकेज ने कहर बरपाया, उसका रख-रखाव एक निजी कंपनी के जिम्मे था। यानी उस निजी क्षेत्र के जिम्मे, जो आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंखों का तारा बना हुआ है और जिसे वे आजकल देश के हजार मर्जों की एकमात्र दवा बताया करते हैं।

अगर वह दवा ऐसी जानलेवा है, जो साफ है कि है ही, तो कहना होगा कि देश के मर्ज ही उससे भले हैं। फिर भी विडम्बना देखिये कि जहां एक ओर देश के विभिन्न राज्यों के अनेक अस्पतालों में मरीज आक्सीजन की कमी से जानें गंवा रहे हैं, इस अस्पताल में उसके लीकेज से दो दर्जन और विरार के अस्पताल में अग्निकांड में एक दर्जन से ज्यादा जानें चली जाने की शर्म किसी भी स्तर पर महसूस नहीं की जा रही। उलटे नाना प्रकार के बहानों से उसकी गंभीरता को कम करने की कोशिशें ही की जा रही हैं।

इसके कारणों की तफ्तीश करें तो देश की स्वास्थ्य व्यवस्था के प्रति किसी की सहानुभूति हो या नहीं, निजी क्षेत्र के प्रति दल और विचारधारा का भेद किए बिना समूचा सत्ता प्रतिष्ठान कितनी सदाशयता रखता है, इस हादसे के सन्दर्भ में इसे इस तरह समझा जा सकता है कि नासिक के जिलाधिकारी सूरज मांढरे ने उक्त हादसे के फौरन बाद उक्त टैंक के रखरखाव में आपराधिक लापरवाही के लिए उक्त निजी कम्पनी के कारकुनों पर कार्रवाई सुनिश्चित करने के बजाय यह कहना ज्यादा जरूरी समझा कि वह तो कम्पनी के टेकनीशियनों ने समय रहते टैंक के वाल्व को बन्द कर दिया, जिससे बाकी मरीजों को बचाया जा सका, वरना त्रासदी और बड़ी होती।

अगर जिलाधिकारी यह कहना चाहते हैं कि बच गए मरीजों को इसको लेकर कंपनी का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उसने उनकी जानें बख्श दीं तो कौन कह सकता है कि इस सरकारी संवेदनहीनता का अंत कहां होगा और तब तक हम उसकी कितनी कीमत चुका चुके होंगे? इसे यों समझ सकते हैं कि पालघर का विरार स्थित विजयवल्लभ अस्पताल भी, जिसमें अग्निकांड में तेरह मरीजों की जान गई है, निजी ही है। पिछले महीने मुंबई के भांडुप में जिस कोरोना अस्पताल में अग्निकांड में दस मरीजों की जान चली गई थी, वह भी निजी ही था। कुछ दिनों बाद ही उसके संचालन की अनुमति की अवधि समाप्त होने वाली थी। इसके नाते वहां अव्यवस्था का ऐसा आलम था कि अस्पताल की इमारत में ही चल रहे मॉल में लगी आग को लेकर तब तक गंभीरता नहीं बरती गई, जब तक कि वह फैलकर अस्पताल तक नहीं आ पहुंची। आ पहुंची तब भी अफरातफरी के बीच मरीजों की जानें बचाने के लिए कुछ नहीं किया जा सका, क्योंकि पहले से ऐसे किसी हादसे से निपटने की तैयारी ही नहीं थी। तब अस्पताल का प्रशासन ही नहीं, दमकल और स्थानीय प्रशासन भी लापरवाह सिद्ध हुए थे।

जहां तक मुआवजे और जांच का संबन्ध है, हर हादसे के बाद उनकी बाबत सरकारों द्वारा ऐसे एलान किए ही जाते हैं। इसलिए जरूरी यह था कि उद्धव समझते कि ऐसे मामलों में बड़े से बड़ा मुआवजा भी वास्तविक क्षतिपूर्ति नहीं होता। तब तो और भी नहीं, जब अस्पतालों की लापरवाही ऐसे मरीजों को मौत की नींद सुला दे रही हो, जो अपने प्राण संकट में पाकर उसे बचाने के लिए उसकी शरण में आए रहे हों। यकीनन, बेहतर होता कि उद्धव अपनी ओर से पहल करके उन लोगों से माफी मांगते, जिन्होंने उनके राज्य में हुए इस तरह के किसी भी हादसे में अपने परिजनों को खोया है। लेकिन इसके उलट, यकीनन, असुविधाजनक सवालों से बचने के लिए अब वे कह रहे हैं कि इन हादसों को लेकर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। जैसे कि राजनीति इतना गर्हित कर्म हो कि उसे देश के लोगों के जीवन-मरण के प्रश्नों से दूर ही रखा जाना श्रेयस्कर हो। या कि वह हंसी-ठट्ठे के लिए ही हुआ करती हो।

दरअसल, इन दिनों देश के केंद्र से लेकर प्रदेशों तक में जो भी और जिस भी दल या विचारधारा की सरकारें हैं, वे खुद तो अपने सारे फैसलों में भरपूर राजनीति करती रहती हैं, लेकिन जब भी किसी मामले में उनसे तल्ख सवाल पूछे जाने लगते हैं, वे राजनीति न किये जाने का राग अलापने लगती हैं। लेकिन राजनीति न करने की उद्धव की बात मान ली जाए तो भी क्या राजनीति न करने के नाम पर ऐसे सवाल पूछने से बचा जाना चाहिए कि क्यों उनके राज्य के अस्पतालों में भी ऐसे जानलेवा हादसे कोई नई बात नहीं रह गए हैं? क्या उन्हें ऐसा कहकर इस सवाल के जवाब से कन्नी काटने की इजाजत दी जा सकती है कि इस तरह के हादसे अकेले उन्हीं के राज्य में नहीं, गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी हो रहे हैं?

जहां भी हो रहे हैं, वहां की सरकारों को इस सवाल के सामने क्यों नहीं किया जाना चाहिए कि उनके अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा के मानकों को तवज्जो न देकर इतनी लापरवाही क्यों बरती जाती है? आक्सीजन टैंक में लीकेज का तो खैर यह अपनी तरह का पहला ही मामला है, लेकिन क्यों अस्पतालों में अग्निकांडों में मरीजों की जानें जाना आम होता जा रहा है? अगर इसलिए कि इन अस्पतालों में इलाज के लिए जाने व भर्ती होने वालों में ज्यादातर आमजन होते हैं, क्योंकि निजी क्षेत्र की कृपा से अभिजनों को भारी खर्चे पर सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों में इलाज कराने की सहूलियत उपलब्ध है, तब तो यह सवाल और गंभीर हो जाता है और ऐसे हादसों के पीछे की मानवीय चूकों को भी अमानवीय माने जाने की जरूरत जताता है। इस अर्थ में और कि बड़े अस्पतालों में ऐसे हादसों से बचाव की जिम्मेदारी में उसके प्रशासन के साथ स्थानीय प्रशासन का भी साझा होता है। वे मिलकर भी अस्पतालों को हादसों के घरों में तब्दील होने से नहीं रोक पा रहे तो उन्हें इसको लेकर बेशर्म होने के बजाय उसकी शर्म में साझा ही करना चाहिए।


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