आज के दौर में विज्ञान ने खूब तरक्की कर ली है। ऐसे में मनुष्य की औसत उम्र बढ़ गई है। उम्र के बढ़ने के साथ कुछ बीमारियां भी साथ आती हैं। समझदारी के साथ इन रोगों का मुकाबला करते हुए बुढ़ापे को स्वस्थ बनाए रखा जा सकता है।
नरेंद्र देवांगन
बुढ़ापे की बीमारियां उम्र के हिसाब से आती हैं। अगर बुढ़ापे में समय-समय पर डॉक्टरी जांच कराई जाए और बीमारियों का इलाज शुरूआती दौर में ही कर लिया जाए तो इन बीमारियों के प्रभाव को कम किया जा सकता है। बुढ़ापे की ज्यादातर बीमारियां बचपन और युवावस्था में शरीर की अनदेखी के कारण होती हैं। कुछ बीमारियां शरीर के अंगों की शिथिलता और उनमें आने वाले बदलावों के कारण होती हैं। इनका शुरूआत से ही ध्यान रखा जाए तो बुढ़ापे के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
बुढ़ापे में पेट की बीमारियां बहुत होती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण पाचन प्रक्रिया का कमजोर होना होता है। आंत में खाने को पचाने की क्षमता कम हो जाती है, जिससे एसिडिटी बनने लगती है। कई बार इन सब वजहों से पेप्टिक अल्सर हो जाता है। इसमें पेट का दर्द तेज हो जाता है। पेट की बीमारियों में दूसरी बड़ी बीमारी कब्ज की होती है। बुढ़ापे में शरीर चलने-फिरने में शिथिलता का अनुभव करता है जिसकी वजह से खाना ठीक से हजम नहीं होता। इसके साथ ही खाने में फाइबर की मात्रा कम होने से भी कब्ज की बीमारी हो जाती है। कब्ज अगर लंबे समय तक बना रहे तो बवासीर की बीमारी भी परेशान करती है।
मधुमेह रोग बुढ़ापे की सबसे बड़ी बीमारी के रूप में सामने आ रहा है। काम न करने, मोटापा बढ़ने, मानसिक तनाव, स्टेरॉयड दवाएं खाने के कुप्रभाव के चलते मधुमेह का रोग हो जाता है। मधुमेह के चलते आंखों में अंधापन, किडनी, हृदयाघात और पक्षाघात यानी लकवा का रोग हो जाता है। हृदयाघात बुढ़ापे की दूसरी बड़ी परेशानी है। हृदय में रक्त की आपूर्ति करने वाली धमनियों में बहने वाला रक्त बाधित होने लगता है जिसकी वजह से सीने में दर्द की शिकायत होती है। यह दर्द बाईं भुजा की ओर से शुरू होकर कंधे की तरफ बढ़ता जाता है। दर्द के साथ तेजी से पसीना शरीर से निकलने लगता है। कई बार जब दिमाग तक रक्त नहीं पहुंच पाता तो पक्षाघात का अटैक हो जाता है।
हाई ब्लड प्रेशर बुढ़ापे में बहुत परेशान करता है। कई बार हाई ब्लड प्रेशर हाईपर टेंशन बन जाता है जिसके कारण सिरदर्द, जी मिचलाना, सांस फूलना और पैरों में सूजन जैसी परेशानियां आ जाती हैं।
अन्य तकलीफें
मोतियाबिंद बुढ़ापे में आंखों की रोशनी को छीनने का काम करता है। इसके साथ ही, याददाश्त का कमजोर होना और कानों में सुनने की शक्ति का कमजोर होना आम परेशानियां हैं। किडनी की परेशानी साफ पानी न मिलने के चलते होती है। किडनी की सक्रियता कमजोर होने से किडनी रोग बढ़ जाते हैं।
बुढ़ापे के दिनों में शरीर में हार्मोंस कम होने लगते हैं। इससे शरीर के तमाम अंगों की सक्रियता शिथिल होने लगती है। इसके चलते जुबान में स्वाद लेने की क्षमता कमजोर होने लगती है। हार्मोंस के कम होने के चलते शरीर की त्वचा ढीली होने लगती है। त्वचा पर झांइयां और दाग-धब्बे पड़ने लगते हैं। इससे चेहरे पर हल्के-हल्के रोएं आने लगते हैं।
कैसे करें बचाव
’ खाने में फाइबर युक्त भोजन करें। इससे पेट के रोग कम हो सकेंगे।
’ नियमित व्यायाम करें। आधे से एक घंटे तक शरीर की ताकत के अनुसार तेज चाल में चलें।
’ एक फल और एक गिलास दूध का सेवन जरूर करें।
’ साल में एक बार अपने पूरे शरीर की जांच जरूर कराएं। रक्त की जांच में ही बहुत सारी बीमारियों का पता चल जाता है।
’ बुढ़ापे में दवाएं खाने से शरीर पर बुरा प्रभाव जल्दी होता है। इसलिए दवाएं खाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
पौष्टिक भोजन लें
’ पौष्टिक तत्वों वाले आहार लेना बेहद आवश्यक है। उम्र बढ़ने के साथ पौष्टिकता का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। जख्मों और टूटी हड्डी के ठीक होने और ऐसी अन्य समस्याओं के मौके पर अधिक प्रोटीन की आवश्यकता होती है। तंतुओं की सघनता बनाए रखने, मांसपेशियों की मजबूती और रोग प्रतिरोधक क्षमता को कायम रखने के लिए आहारीय प्रोटीन लेते रहना चाहिए।
’ उम्र बढ़ने से फ्रैंडली बैक्टीरिया पाचन तंत्र से कम हो जाते हैं। इससे पाचन तंत्र के संक्र मण और गड़बड्यिों की समस्या हो सकती है। इसलिए वृद्धावस्था के दौरान आहार में सेहतमंद बैक्टीरिया वाले तत्व शामिल किए जाने चाहिए।
नियमित व्यायाम करें
’ रोज व्यायाम करना सभी के लिए जरूरी है। सैर करना, स्थिर व्यायाम, बागबानी आदि ऐसी गतिविधियां हैं जो ऊर्जा को संचारित करती हैं और मांसपेशियों व जोड़ों को कार्यरत बनाए रखती हैं। इससे पाचन तंत्र भी ठीक रहता है।
’ उम्रदराज लोगों के लिए विशेष कसरतें होती हैं जो उन्हें तंदुरूस्त भी रखती हैं और गिरने से भी बचाती हैं। साथ ही, केवल पौष्टिकता से ही बुजुर्गों की देखभाल न करें बल्कि प्यार, दुलार व रिश्तों की गरमाहट के साथ उनका ख्याल रखें।
आहार संतुलित हो
’ कई बार उम्र के साथ लोगों की शारीरिक गतिविधियां तो कम हो जाती हैं लेकिन उनके खाने की आदत जवानी वाली ही रहती है। इस वजह से ज्यादा पोषण हो जाता है।
’ वजन बढ़ने से दिल के रोग, आर्थराइटिस और डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाता है। ज्यादा आहार लेने के बावजूद उनको उचित पोषण नहीं मिलता।
’ बुजुर्गों द्वारा आहार में फैट के ज्यादा सेवन से कोलोन का कैंसर, पैंक्रि याज और प्रोस्टेट की समस्या हो सकती है।
’ असंतुलित खानपान से ब्लडप्रेशर, ब्लड लिपिड में बढ़ोतरी, ग्लूकोज को पचाने की क्षमता में कमी के चलते कोरोनरी हार्ट डिजीज हो सकती हैं।
’ आहार से जुड़ी अन्य बीमारियों में कार्डियोवैस्कुलर और सेरेब्रोवैस्कुलर विकार, डायबिटीज और आस्टियोपोरोसिस भी शामिल हैं। माइक्रो पोषक तत्व हमें सेहतमंद और छूत के रोगों से बचाने में मदद करते हैं। बुजुर्गों में कम खाने या एक जैसा खाना लगातार खाते रहने से माइक्र ो पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। उम्र बढ़ने के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है जिससे समस्याएं और बढ़ जाती हैं।

