
इस भौतिक संसार में सभी प्राणी अपनी-अपनी तरह से जीवन जीते हैं। मनुष्य भी साथ ही पशु-पक्षी, कीट पतंगे भी। मनुष्य योनि समस्त योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। संसार के सभी प्राणियों में मनुष्य को बौद्धिक रूपी संपदा का कोष भी प्राप्त है। मनुष्य हमेशा से अपने आर्दश को लेकर प्रतिमान स्थापित करने में लगा रहता है। मनुष्य जीवन क्षणिक है फिर भी अपने चिंतन, सतकर्म से एक अच्छा एवं आदर्श जीवन जीने की इच्छा होती है। कहते हैं, जिस जीवन में अच्छी तरह से जीने की क्षमता नहीं है, वह जीवन, जीवन ही नहीं है। मनुष्य को आदर्श जीवन जीने के लिए उसमे कुछ गुणों का होना नितांत आवश्यक है। मुख तेजपूर्ण, शरीर शक्तिमान, जिव्हा मृदु वचन बोलने वाली, निर्मल नेत्र, निश्छल मन, दानी हाथ, शांत चेतन, कल्याण की भावना, क्रूर कर्म, कुमार्ग गमन से दूर रहने वाली इंद्रियां, अपवित्र काम से घृणा करने वाली तथा निग्राही और नियंत्रित हो। कहते हैं, मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही खुद को पाता है।
इसलिए हमारे चिंतन में अच्छे विचारों का आगमन, दृढ़ता हो, स्वार्थ की भावना न हो, ईर्ष्या, क्रोध, लालच न हो, पूरी तरह से हमारी ज्ञानेंद्रिया आत्मसंयमी हों। इसके साथ एक आदर्श जीवन में त्याग, क्षमा, दया-विनय, विवेक, अहिंसा, सत्यमार्गी आदि गुणों का समाहित होना चाहिए।मननशील, चिंतनशील अथवा ज्ञानात्मक जीवन, नैतिक सद्गुण आदर्श जीवन है। एक आदर्श व्यक्ति दृढ़ संकल्प प्रकृति का होता है। वह अपने जीवन में श्रेष्ठ शांतप्रद, आनंदमय जीवन व्यतीत करता है, साथ ही भविष्य उसका उज्जवल होता है। आदर्शवादी होना आवश्यक है, वरना पशु- पक्षियों और मानव में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। प्रस्तुति : अजय प्रताप तिवारी


