- कोरोना काल के बाद से मानसिक रोगियों की संख्या में बड़ा इजाफा
- मेडिकल के मानसिक रोग विभाग में आने वाले रोगियों में दिखे अजीब लक्षण
जनवाणी संवाददाता |
मेरठ: दो साल से अधिक समय से पूरे देश में कोरोना ने अपनी जड़े जमा रखी हैै, इसका असर न सिर्फ लोगों के आर्थिक हालातों पर पड़ा है बल्कि शारीरिक व मानसिक रूप से भी इसने लोगों पर गंभीर असर डाला है। पिछले तीन महीनों से मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में ऐसे मरीजों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, जो अलग-अलग तरह की बीमारियों से ग्रस्त है।
लाला लाजपत रॉय मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में पिछले कुछ महीनों से मरीजों की संख्या में 30 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। वहीं, इस दौरान ऐसे लक्षणों के मरीजों की संख्या बढ़ी है जो कोरोना काल से पहले नाम मात्र के होते थे। सिरदर्द की शिकायत, नींद न आना, मन न लगना, अकेले रहने का मन करना, डर लगना व बीमारी लगने का डर जैसी समस्याओं को लेकर बड़ी संख्या में मरीज मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग में पहुंच रहे हैं।
मानसिक रोग से ग्रस्त मरीजों में सरदर्द की शिकायत बेहद आम है, इसके पीछे वजह यह होती है कि मरीज किसी भी बात के बारे में अधिक सोचने लगता है। साथ ही गर्मी के मौसम में भी सिरदर्द के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी होना आम बात है। मनोरोगी विभाग के डाक्टर ऐसे मरीजों का काउंंसिलिंग के जरिए आसानी से इलाज कर देते हैं। नींद न आना, कोरोना काल में लगे लॉकडाउन के कारण लोग काफी दिनों तक अपने घरों में ही रहे।
ऐसे में वह घर में रहते हुए ज्यादा मेहनत वाले काम नहीं करते थे। इसी वजह से लोगों को शारीरिक थकान नहीं होती थी और उनमें नींद न आने की समस्या घर कर गई। इसी तरह मन न लगना, जैसी समस्या को लेकर भी मरीज आ रहे हैं। यह समस्या 40 साल से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा नजर आ रही है। इससे पीड़ित मरीज बार-बार अपनी एक्टिविटी बदला रहता है। साथ ही वह कहीं पर भी अपने आप को संतुष्ट नहीं पाता है।
अकेले रहने का मन करना, यह एक ऐसी समस्या है जो 60 साल से अधिक उम्र के लोगों में अधिक नजर आ रही है। ऐसे लोग अक्सर दूसरे लोगों से दूर रहने के साथ अपने परिवार के सदस्यों से भी दूरी बनाने लगते हैं। इन लोगों में यह धारणा घर कर लेती है कि वह अकेले रहेेंगे तो ठीक रहेंगे।
यदि कोई उनके साथ रहेगा तो वह अपने को सुरक्षित नहीं मानते। इसी तरह किसी से बीमारी लगने का डर मन में रहने वाले मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है, ऐसे मरीज खुद को साफ रखने में ही जुटे रहते हैं। बार-बार हाथ धोना, कपड़े बदलना, नहाना, घर में बार-बार सफाई करना आदि कार्य करने लगते हैं। यहां तक कि किसी को छूने से भी बचने लगते हैं।
डिप्रेशन, इंजाइटी और मनोरोग बाध्यता (ओसीडी) ग्रस्त होते हैं मरीज
मेडिकल कॉलेज की मानसिक रोग विभाग की डा. चित्राक्ष सिंह का कहना है कि कोरोना के बाद से मनोरोगियों की संंख्या बढ़ी है। इनमें से कई मरीज तो केवल कोरोना के बाद ही सामने आए है, जैसे इंजाइटी के मरीज। इन मरीजों को डर लगना व बीमारी लगनें का खतरा मन में लगातार बने रहने की शिकायत होती है।
हालांकि यह बीमारी कोई नई नहीं है, लेकिन पिछले कुछ महीनों में इसके मरीजों की संख्या बढ़ी है। इसी तरह डिप्रेशन के मरीजों की संख्या भी बढ़ी है, इनमें ज्यादातर वह मरीज है। जिन्होंने कोरोना काल में अपने काम-धंधे खो दिए हैं। इसको लेकर वह तनाव में रहते हैं। सबसे अधिक संख्या मनोग्रसित बाध्यता (ओसीडी) के मरीजों की है, यह ऐसे मरीज होते हैं, जो हमेशा अपने आप को किसी बीमारी से बचाने के लिए साफ रखने का प्रयास करते रहते हैं।
चाहे यह मरीज अपने घरों में ही क्यों न रहे, लेकिन इनके मन में खुद को साफ रखने की भावना लगातार बनी रहती है। डाक्टर ऐसे मरीजों को रिलेक्सेशन थैरेपी देते हैं। इसके बाद उनकी काउंसिलिंग की जाती है। जिसमें मरीजों को लगातार समझाया जाता है कि वह किसी अवसाद से ग्रस्त है, जो वह सोच रहे हैं, वास्तव में वेसा नहीं है। इसके बाद मरीजों को दवाइयां दी जाती है।

