Sunday, April 12, 2026
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देश की आजादी का पूर्व अमृत वर्ष लेकर आया सत्य संघर्ष

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देश की कैसी नैतिक विडंबना है कि देश के नागरिकों को आजादी के इतिहास का केवल एक पक्ष अंग्रेजी में जिसे देश की अधिकाँश-98 प्रतिशत जनता पढ़ लिख नहीं सकती थी, देश की लाइब्रेरियों के माध्यम से परोसा गया और उसे सहेज कर संरक्षित किया गया ताकि देश आगे भी सत्य का संज्ञान ही न ले सके। शायद यह विश्वयुद्ध के खलनायक हिटलर और उसके मंत्री गोयबल्स की एक झूठ को सौ बार बोलो, वह सत्य लगने लगेगा नीति का भारत के तत्कालीन कुछ अंग्रेजी मानसिकता से ग्रसित और मुस्लिम संस्कृति से प्रभावित अपनी अपनी सोच को श्रेष्ठ समझने की अव्यवहारिक सोच का क्रि यान्वयन था जो भारतीय लोगों जिन्होंने वास्तव में बहादुरी से भारत की आजादी का युद्ध लड़ा था, को दुविधा में डालना और आगामी पीढ़ियों का ब्रेनवाश करना था।

हद तो तब हो गयी जब भारतीय संस्कृति को दूसरे दर्जे पर धकेल कर अंग्रेजी और इस्लामी संस्कृति को पहले स्थान पर स्थापित कर दिया गया और बहुसंख्यक संस्कृति के लोगों की कई पीढ़ियों को यही सब कुछ पढ़े पढ़ाने के लिए विवश किया गया। हमें पढ़ाया गया कि सशस्त्र क्रांतिकारियों का देश की आजादी में कोई योगदान ही नहीं था, वह तो केवल गांधी जी के चरखे और अहिंसा से प्राप्त हुयी थी। सशस्त्र क्रांति के योद्धा देश के दुश्मन थे। उन्हें फांसी पर चढाना नियमानुकूल था। 1857 का क्र ांति युद्ध एक गदर मात्र था। सुभाष बोस एक युद्ध अपराधी थे और उनकी मृत्यु एक विमान दुर्घटना में हुयी थी। मुगलों के आने से पहले देश कच्ची झोपड़ियों का असभ्य देश था। उनके आने के बाद पक्के गुंबदों और किलों से देश सुरक्षित और सुसज्जित हुआ। हमारे वेद चरवाहों के गीत थे। हमारे संस्कृत ग्रन्थ झूठ का पुलिंदा थे और हद तो तब हो जाती है जब हमें विश्वास करने पर विवश किया जाता था यहाँ के मूल निवासी आदिवासी थे और आर्यों ने बाहर से आकर देश पर कब्जा कर अपनी संस्कृति थोप दी।

कुछ महीने पहले जब राष्ट्रवादी फिल्म स्टार कंगना रानावत ने देश की आजादी को मोदी के आने के बाद की बताया तो देश के कांग्रेसी सहित सभी विरोधी दल, तथाकथित लिबरल मीडिया और सारे मोदी विरोधी एक साथ इक_ा होकर कंगना पर टूट पड़े। कंगना तो चिंगारी लगा कर किनारे हो गयी मगर अब तक दम साधे पड़े राष्ट्रवादी इतिहासकारों, लेखकों और सोशल मीडिया के जागरूक नागरिकों को बाहर आने का मौका मिल गया जिनको ये लोग भगवा-भगवा का शोर मचा कर बाहर निकलने ही नहीं देते थे। वे मैदान में आये और जिसके पास जो सत्य था उसे उसने जनता के सामने परोस दिया।

पूरा समाज करवट लेने लगा और एक से एक सत्य सामने आने लगे। जिन महत्वपूर्ण दस्तावेजों को इन लोगों ने छिपा कर रख दिया था, वे भी विभिन्न चैनलों से बाहर निकले और पटल पर आम हुए। इसी क्र म में सत्ता का दस्तावेज भारतीय डोमिनियन का सत्ता हस्तान्तरण के दस्तावेज के रूप में सामने आया। विभिन्न मुकदमों के नाम पर ब्रिटेन से न लाए गये दस्तावेजों की भी तलाश शुरू हुई और उनके आने की संभावनाओं को बल मिला।

इससे पहले सुभाष बोस पर कई फिल्में और लाल बहादुर शास्त्री जी पर कुछ ही दिन पहले ताशकंद फाइल्स नाम की एक फिल्म मीडिया पर आई और इन दोनों विषयों पर अब तक छिपाए गये सत्य को परोस दिया गया। लोगों को असलियत का आंशिक ही सही पता तो लगा। मराठों की वीरता और मुगलों की चालाकियों, धोखेबाजियों, संस्कृति विहीनता और क्रूरता पर भी कुछ फिल्में बनी और कुछ और बन भी रही हैं। देश की आजादी में अपने प्राणों की आहुति देने अजाने वीरों की भी कहानियाँ टुकड़ों में ही सही देश के सामने आईं तो उनकी आँखों के सामने से पर्दा हटा।

सबसे अधिक आँखों के सामने से पर्दा तब हटा जब भारतीय न्यूज चैनलों पर वीर सावरकर और नाथूराम गोडसे पर बहसें शुरू हुयीं। इन बहसों से गोडसे का न्यायालय में दिया भाषण सोशल मीडिया के माध्यम से सामने आया और लोगों को पता चला गांधी जी की मुस्लिम परस्त नीतियों के कारण हिन्दू कितना प्रताड़ित था और उस समय गोडसे के प्रति लोगों में कितना प्रेम और आदर का भाव था। यह सत्य भी सामने आया कि आज भी गोडसे का आदर करने वाले कम नहीं हैं और तो और यह सत्य भी सामने आ गया कि गाँधी जी जिन्हें सारे कांग्रेसी अहिंसा का जीवंत प्रतीक मानते और पूजते रहे हैं, उन्हीं अहिंसक लोगों द्वारा गाँधी जी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में गोडसे बिरादरी के चित्त पावन सैकड़ों ब्राह्मणों का किस तरह नृशंसता से कत्ल किया गया।

यहाँ तक कि छोटे-छोटे बच्चो को भी नहीं छोड़ा गया। गोडसे को फांसी देने के बाद विद्रोह से डरे हुए अहिंसा के पुजारियों ने जेल में ही एक खेत में उसका संस्कार कर दिया और उस जगह का अवशेष मिटाने के लिए जली हुयी मिटटी तक को खोद कर तालाब में भर दिया गया। जगह का नामोनिशान तक नहीं रहने दिया ताकि कोई स्मारक तक न बन सके। यह थी आजाद मुल्क की मानसकिता जो कंगना के शब्दों में दो हजार चौदह तक चली।

अपनी एक कुटिल योजना के तहत इस वर्ग विशेष ने यह प्रचारित कर प्रसिद्ध किया कि वीर सावरकर ने अंग्रेजों से छ: बार माफी मांगी कालापानी की जेल से बाहर आने के लिए जबकि गांधी और नेहरु ने कभी माफी नहीं मांगी। पहली बात तो यह पूर्णत: सत्य नहीं है और अगर किसी योजना के तहत उन्होंने किसी के कहने पर माफीनामे के हर कैदी को उपलब्ध कराए जाने वाले फार्म पर हस्ताक्षर किये भी तो गाँधीकृनेहरु की जेल यात्रओं और वीर सावरकर की जेल यात्र में जमीन आसमान का फर्क था, यह तथ्य भी सामने आया।

गांधी नेहरु को जेलों में जगह न होने के नाम पर आगा खान पैलेस जैसे बड़े बड़े महलों को जेल घोषित कर कैदी नौकरों की फौज के साथ वहां राजनैतिक कैदी के नाम पर शानदार भोजन, अखबार लाइब्रेरी और महिलाओं तक से मिलने की सुविधाओं के साथ जब तब मीटिंगों के नाम पर बाहर लाकर घुमाने की सुविधा उपलब्ध कराने की छूट के साथ अस्पतालों में भर्ती की सुविधा तक उपलब्ध थी जबकि वीर सावरकर 6 गुणा 6 की कोठरी में जिसमें दैनिक कार्यो से निवृत भी होना पड़ता था और उसी में कंकड़ मिली दाल का आधा कटोरी पानी और एक रेत मिले आटे की रोटी खाकर दिन भर में एक गिलास पानी पीकर बैल की जगह कोल्हू को चला कर कोड़े खा-खा कर 1० पाउंड तिल और नारियल का तेल निकालना पड़ता था। दोनों की जेल यात्रओं का यह अंतर भी सोशल मीडिया के माध्यम से जन पटल पर आया।

सावरकर की अनंत पीड़ाओं का अबतक कुछ ही लोगों को पता था। इस नव आजादी के काल में अपनी भाषा में सत्य सामने आ पाया और अभी और भी आ रहा है। हाँ एक बात और हुई है अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस समूह द्वारा जनता में परोसे जा रहे सरासर झूठों और अर्धसत्यों के पुलंदों पर भी रोक लगी है। अब एक कपट कहानी के सामने आते ही उसकी असलियत सामने आ जाती है और उसका प्रखर विरोध शुरू हो जाता है।

राज सक्सेना


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