Monday, April 20, 2026
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लघुकथा-एक युग सापेक्ष साहित्यिक विधा

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युग 20-20 क्रि केट का है। युग ट्विटर की माइक्रो ब्लागिंग का है। युग इंस्टेंट अभिव्यक्ति का है। युग क्विक रिस्पांस का है। युग 10 मिनट भर में 20 खबरों का है। यह सब बताने का आशय केवल इतना है कि साहित्य में भी आज पाठक जीवन की विविध व्यस्तताओं के चलते समयाभाव से जूझ रहा है।

पाठक को कहानी का, उपन्यास का आनन्द तो चाहिये पर वह यह सब फटाफट चाहता है। संपादक जी को शाम 6 बजे ज्ञात होता है कि साहित्य के पन्ने पर कार्नर बाक्स खाली है और उसके लिये वे ऐसी सामग्री चाहते हैं जो कैची हो।
इतना ही नहीं, लेखक जी एक घटना से अंतर्मन तक प्रभावित होते हैं, वे उस विसंगति को अपने पाठकों तक पहुंचाने पर मानसिक उद्वेलन से विवश हैं किन्तु उनके पास भी ढेरों काम है। वे लंबी कथा लिख नहीं सकते। यदि उपन्यास लिखने की सोचें तो सोचते ही रह जायें और रचना की भ्रूण हत्या हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में लघुकथा एक युग सापेक्ष साहित्यिक विधा के रूप में उनका सहारा बनती है। लघुकथा संक्षिप्त अभिव्यक्ति की अत्यंत प्रभावशाली विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है।

बीसवीं सदी के अंतिम तीन चार दशकों में लघुकथा प्रतिष्ठित होती गई। मुझे स्मरण है कि 1997 में मेरी पहली लघुकथा दहेज, गेम आफ स्किल, बौना आदि प्रकाशित हुईं थी। तब नई कविता का नेनो स्वरूप क्षणिका के रूप में छपा करता था। लघुकथायें फिलर के रूप में बाक्स में छपती थीं। समय के साथ लघुकथा ने क्षणिका को पीछे छोडकर आज एक महत्वपूर्ण साहित्यिक विधा का स्थान अर्जित कर लिया है। व्यंग्य, ललित निबंध, लघुकथा क्रि येटिव राइटिंग की अपेक्षाकृत नई विधायें हैं। जिनमें भी व्यंग्य तथा लघुकथा का पाठक प्रतिसाद बड़ा है. इन दोनों ही विधाओ के समर्पित लेखकों का संसार भी बड़ा है।

इंटरनेट ने दुनियां भर के लघुकथाकारों को परस्पर एक सूत्र में जोड़ रखा है। लघुकथा के एकल संग्रहों की संख्या अपेक्षाकृत सीमित है, यद्यपि संयुक्त संग्रह बड़ी संख्या में छप रहे हैं। लघुकथा का साहित्यिक भविष्य व्यापक है, क्योंकि परिवेश विसंगतियों से भरा हुआ है। अपने अनुभवों को व्यक्त करने की छटपटाहट एक नैसर्गिक प्रक्रि या है, जो लघुकथाओं की जन्मदात्री है।

राजनीति

अफगानिस्तान व पाकिस्तानी वर्जन के इस्लाम से भारत को सावधान रहना होगा

गौतम चौधरी

देखते ही देखते लोकतांत्रिक अफगानिस्तान, इस्लामिक अमीरात आफ अफगानिस्तान बदल गया है। बोलचाल की भाषा में कहते हैं, नाम तो बस नाम होता है, नाम में क्या रखा है लेकिन यह नाम कोई साधारण नाम नहीं है। नाम के साथ ही पूरी व्यवस्था है यानी अब अफगानिस्तान में वह संविधान लागू है जो आज से लगभग 1500 साल पहले अरब पर शासन करने वालों ने बनाया था। अरबी कानून से भी अफगानिस्तान के आधुनिक शासक तालिबान ने वह तत्व उठाए हैं जो पुरूषों और धार्मिक नेताओं को दैवी शक्ति प्रदान करते हैं।

अब्राहिमवादी सेमेटिक चिंतन में पुरुषों की तुलना में महिलाओं के अधिकार को शून्य बताया गया है। इस चिंतन के व्याख्याकारों का मानना है कि दुनिया को बनाने वाला एक मात्र सुपर पावर गॉड, अल्लाह है। उसी ने पूरी दुनिया बनाई। वह सबसे ताकतवर है और सबका मालिक भी है। इन एकेश्वरवादी चिंतकों का मानना है कि उस महाताकतवर का कोई स्वरूप नहीं है। इस दुनिया को ठीक करने के लिए उसने समय-समय पर आपने बेटे और संदेशवाहकों को धरती पर भेजा। संदेशवाहकों के साथ उसने कुछ नियम कानून भी भेजे जिसे बाद में किताब की तरह बनाया गया। वही किताब इस चिंतन के मानने वालों का कानून बन गया। महाबली परमात्मा ने जितने संदेशवाहक या अपने बेटों को धरती पर भेजा, उनके अनुयायियों ने यही कहा कि बस हमारा नबी ही अंतिम था और उसने जो भी कहा, वह महाबली परमात्मा की आवाज थी। परम आदरणीय अब्राहम, मूसा, ईसा जैसे अनेक संदेश वाहकों के माध्यम से महाबली परमात्मा अपनी बात दुनिया को बताते रहे हैं। उन्हीं बातों में से एक पवित्र कुरान भी है। इस्लाम के अनुयायी इसे अल्लाह का कानून मानते हैं और उसी पर अपना पूरा जीवन न्योछावर कर देते हैं।

अफगानिस्तान अब उसी पवित्र कुरान की आयतों से संचालित हो रहा है। इधर अभी हाल ही में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अपने देश की सुरक्षा पर एक रिपोर्ट पेश की है। उस रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान को यदि किसी से खतरा है तो वह भारत है। पाकिस्तानी हुक्मरानों की यह कोई नई कवायद नहीं है। पाकिस्तान अपने निर्माण काल से ही यह मान कर चल रहा है कि उसका देश पवित्र मुस्लिम भूमि है और भारत हिन्दू राष्ट्र है। भारतीय मानें या न माने लेकिन पाकिस्तान के नेता और चिंतकों के द्वारा साफ-साफ खाका खींचा जा चुका है कि भारत का वर्तमान स्वरूप व अस्तित्व पाकिस्तान के लिए खतरनाक है। इसलिए पाकिस्तान में जबतक यह सोच रहेगी, तबतक वह भारत के सााथ प्रत्यक्ष या परोक्ष लड़ता रहेगा। डॉ. इसरार अहमद, पाकिस्तानी इस्लामिक राष्ट्रवाद के जबरदस्त व्या?याकार रहे हैं। हालांकि कुछ दिन पहले उनकी मौत हो गयी लेकिन उनके तकरीर के कई वीडियो यूट्यूब पर पड़े हैं।

एक जगह वे कहते हैं कि फिलहाल दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो इस्लाम के आदर्श की रक्षा करने में सफल है। यहां तक कि सऊदी अरब भी नहीं। उन्होंने अपनी तकरीर में कहा कि इस्लामिक दुनिया के खलीफा बदलते रहे हैं। किसी जमाने में सऊदी अरब होता था, बाद में तुर्की के औटोमन खड़े हुए और अब आने वाले समय में इसके लिए अफगानिस्तान के खुरासान का एक प्रभावशाली समूह उठ खड़ा होगा और इस्लामिक जगत की खिलाफत यानी नेतृत्व करेगा।

अफगानिस्तान के वर्तमान स्वरूप को गढ़ने में डॉ. इसरार साहब के चिंतन की बड़ी भूमिका ध्यान में आती है। डॉ. इसरार साहब पेशे से डाक्टर थे और उन्होंने इस्लामिक साहित्य का अध्ययन कर दुनिया में इस्लामिक विद्वता का अपना धाक जमा रखा था। पाकिस्तान के अफगान आपरेशन को समझने के लिए डॉ. इसरार साहब की तकरीर को ध्यान से सुनने की जरूरत है।

अब दुनिया के खालिस इस्लाम परसों का आदर्श देश कहीं है तो वह अफगानिस्तान है। उस अफगानिस्तान में क्या-क्या हो रहा है, उसे भी जानने और समझने की जरूरत है। अभी हाल ही में बीबीसी की एक रिपोर्ट आयी है। उसमें बताया गया है कि तालिबान दुनिया को कुछ भी कहे लेकिन वह बेहद चालाकी से पूरे देश में देवबंदी मदरसे के द्वारा व्याख्या किया गया शरीया कानून लागू कर रहा है। महिलाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की कोशिश हो रही है। गैर इस्लाम पर कई प्रकार की पाबंदियां लगा दी गयी है। वे सारे काम बंद कर दिए गए हैं जो देवबंदी मदरसे के द्वारा व्याख्यायित इस्लाम के विरूद्ध है। मसलन पाकिस्तान के द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रस्तुत रिपोर्ट और उसमें हिन्दू भारत के खिलाफ संघर्ष का आह्वान साथ ही अफगानिस्तान में देवबंदी फिरके के इस्लाम का शासन जिसे आदर्श इस्लामिक राज्य का दर्जा प्राप्त हो गया है, उससे भारत के हुक्मरानों को डरने की जरूरत है।

हालांकि इससे चीन, ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों को भी डरना चाहिए लेकिन फिलहाल तो इसकी जद में भारत का आधुनिक लोकतंत्र ही है। हालांकि भारत के वर्तमान लोकतांत्रिक स्वरूप को पुरातनपंथी, यूरोपीय माडल के हिन्दू राष्ट्रवाद से भी खतरा है लेकिन उसे तो ठीक किया जा सकता है लेकिन इस्लाम के नए वर्जन को ध्यान में रखकर भारत को अपनी सुरक्षा नीति विकसित करने की जरूरत है। यही नहीं, भारत में बसे मुसलमानों को भी भारत के लोकतंत्र को बचाने की कोशिश करनी चाहिए। हमारी सुरक्षा और सभी प्रकार की आजादी की ताकत हमारा संविधान हमें प्रदान करता है। अफगानी व पाकिस्तानी वर्जन के इस्लाम का प्रभाव यदि भारत में बढ़ता है तो भारत की पवित्र भूमि पर अशांति की फसल लहराएगी और तब भारत के लोग अंध युग में जीने के लिए अभिशप्त होंगे।

विवेक रंजन


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