- शहीद स्मारक स्थित संग्रहालय में मौजूद है तमाम सबूत
शेखर शर्मा
मेरठ: गणतंत्र दिवस को लेकर चारों ओर उल्लास और जश्न का माहौल है, लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था। आजादी का सूरज देखने के लिए हमारे पूर्वजों को गुलामी की एक लंबी अंधेरी सुरंग से होकर गुजरना पड़ा है। मुल्क की आजादी का जो ख्वाब देखा गया था उसको अमली जामा पहनाने के लिए भारत माता के लालों ने आजादी की इमारत को गढ़ने से पहले उसकी बुनियाद में बजाए पत्थरों के कलम कर अपने सिरों को खपाया है, तब कहीं जाकर आजादी को तामीर किया जा सक। फक्र इस बात का है कि मेरठ की धरती से इसकी शुरूआत की गई और वो दिन था 10 मई 1857 जब एक चिंगारी शोला बनी और पूरे मुल्क में जंगे आजादी की अलख जगा दी थी।
एक चिनगारी जो बनी शोला
10 मई 1857 को मेरठ की धरा से उठी क्रांति की एक चिनगारी जिसने अगले ही कुछ घंटों में पूरे उत्तर भारत स्वतंत्रता की ज्वाला को भड़का दिया था, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की उस महान क्रांति से जुडेÞ तमाम साक्ष्य और एक भरी पूरी विरासत के अवशेष आज भी मेरठ में जहां तहां मौजूद हैं। लेकिन दुखद पहलू यह भी है कि क्रांति धरा की उस समृद्ध विरासत को समेट और सहज कर रखना भूल गए। उस वक्त के गवाह बने कई चिन्ह देखभाल न किए जाने की वजह से खत्म होने की कगार पर हैं।
24 अप्रैल को परेड ग्रांउड में हुकूम उदूली
काली पलटन मंदिर के आसपास का सारा इलाका तीसरी अश्वसेना की बैरक थीं। वहां परेड ग्राउंड भी था। इसी परेड ग्रांड पर 24 अप्रैल को सभी हिन्दुस्तानी सैनिकों को जमा होने के लिए कहा जाता है। कमान अधिकारी कर्नल कारमाइकेल स्मिथ के समक्ष 85 हिन्दुस्तानी सैनिकों ने चर्बी लगे कारतूसों का इस्तेमाल करने से मना कर दिया था।

घटनाक्रम..
परेड ग्राउंड पर जो कुछ हुआ उसकी रिपोर्ट कर्नल कारमाइकेल स्मिथ ने मेजर जनरल विलियम हेनरी हेविट को दी और बताया कि हालात बेहद विस्फोटक हैं…कलकत्ता में बैठे ब्रिटिश हुकूमत के सर्वोच्च फौजी कमांडर मेरठ की घटना को लेकर जांच समिति के गठन का एलान करते हैं। इस बीच 24 मई से 8 मई तक मेरठ छावनी की बैरकों में बेहद रहस्मयी तरीके से आगजनी की घटनाएं होती हैं।
सरकारी भवनों को भी निशाना बनाया जाता है, लेकिन अंग्रेज अफसर इसको खास तवज्जो नहीं देते। 6, 7 व 8 मई 1857 को फौजी अफसरों की बैठकें होती हैं। इनमें कोर्ट मार्शल का हुकूम सुना दिया जाता है। 9 मई को परेड ग्राउंड में सारे हिन्दुस्तानी सिपाहयों को जमा होने को कहा जाता है।
यहां हिन्दुस्तानी सिपाहियों को निहत्थे इस प्रकार खडे होने को कह जाता है ताकि वो सभी अंग्रेजी गोरे सैनिकों के गन प्वाइंट पर रहें। 85 हिन्दुस्तानी सिपाहियों की वर्दी उतारी जाती है। उन्हें हथकड़ी बेड़ियां पहना दी जाती हैं। साथ ही उनको बुरी तरह अपमानित किया जाता है। अंग्रेजी अफसरों की यह करतूत उन पर भारी साबित हुई। 10 मई की रात को हिन्दुस्तानी सैनिकों गदर कर देते हैं।

