Thursday, March 19, 2026
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बच्चों को किताबों से दोस्ती के लिए प्रेरित किया जाए

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10 20बालकों में पुस्तकों के प्रति रुचि नहीं है तो उनके प्रति वितृष्णा भी नहीं है। बालक यदि अच्छी किताबों से दोस्ती कर लेता है तो किताबें सचमुच एक सच्चे दोस्त की तरह जीवन भर साथ देती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों के आस-पास इस तरह का वातावरण निर्मित किया जाए कि वे स्वत: पुस्तकों की और आकृष्ट हों, उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित हों। इसके लिए अभिभावकों, शिक्षकों, लेखकों, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं स्वयमसेवी संस्थाओं द्वारा गांवों, शहरों में बालसाहित्य की गोष्ठियाँ आयोजित की जाएं। यदि हम चाहते हैं कि देश का भविष्य उज्ज्वल हो तो हमें बालकों के व्यक्तित्व विकास की ओर ध्यान देना होगा क्योंकि आज के बच्चे ही कल देश के कर्णधार होंगे। बच्चों का जिज्ञासु मन कल्पना की उड़ान भरता है। उसके शांत मन में उथल-पुथल भी जारी रहती है। मन में उठते स्वभाविक सवालों अथवा जिज्ञासाओं का समाधान आवश्यक है। यदि उनकी जिज्ञासाएं शांत नहीं होती हैं तो परिणामत: बच्चे के व्यक्तित्व के स्वतंत्र विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। बालमन और जिज्ञासा एक-दूसरे के पूरक शब्द ही हैं। जिज्ञासा का सीधा संबंध कौतूहल से है। उम्र बढ़ने के साथ ही हर गुत्थी को सुलझाने में लगाना बाल्यावस्था की मुलप्रवृति है।

आज गांव से लेकर शहरों तक मोबाइल, टीवी, कम्प्यूटर, इंटरनेट ने बच्चों ओर बड़ों को अपने जाल में ऐसा जकड़ लिया है कि वे इसी में अपनी खुशियां ढूंढने में लगे हैं। बच्चे तो जब देखो तब मोबाइल, टीवी या कम्प्यूटर स्क्रीन से चिपके ही नजर आते हैं। नतीजतन उन्हें प्रतिदिन कई क्रूरता और हिंसा भरे दृश्य देखने को मिल रहे हैं। निरन्तर इस तरह के दृश्यों को देखते हुए बच्चे संवेदनशून्य हो रहे हैं। वे हिंसक, आक्रामक, एकाकी और चिड़चिड़े हो रहे हैं। बच्चों ने बाहर मैदानों में खेलना छोड़ दिया है। रिश्तों का सम्मान करना उनके मन से समाप्त होता जा रहा है।

बच्चों के दिलों में उतरती हिंसा, बढ़ते अवसाद और खोते जा रहे मानवीय मूल्यों को नियंत्रित करने वाले नैतिक और मानवीय दायित्वों का न कोई अर्थ रह गया है न कोई संदर्भ। पैसा कमाकर सारी सुख-सुविधाएं जुटा लेने की एक अंधी दौड़ जारी है। अभिभावकों के पास बच्चों के लिए समय नहीं है। बच्चे घर में रहते हुए भी अकेले हैं। स्नेह और मार्गदर्शन के अभाव में उनमें नकारात्मक भाव खूब विकसित हो रहे हैं।

ऐसे माहौल में हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि बच्चों का विचार तंत्र समुचित तरीके से विकसित हो। उनमें सोचने, समझने, अच्छे संस्कार पाने के लिए सद्साहित्य को पढ़ने के लिए ललक पैदा हो। भले ही शहरी बच्चों का एक वर्ग इंटरनेट व अन्य माध्यमों से ज्ञानार्जन कर रहा है पर आज भी देश के आम बच्चे ज्ञानार्जन करने, मनोरंजन हेतु और भावी चुनौतियों का सामना करने योग्य बनने के लिए पुस्तकों पर ही निर्भर हैं।

आज चैनलों पर, पत्र- पत्रिकाओं में, बालसाहित्य की गोष्ठियों और बाल कल्याण के आयोजनों में यह बहस अक्सर होती है कि नये समय और नये तकनीकी- विस्फोट ने बच्चों के लिए विचलित होने की परिस्थितियां पैदा की हैं। अब समय का चक्र पीछे तो नहीं मोड़ा जा सकता है। कम्प्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट, टीवी, सिनेमा आदि के जरिये जो तरह-तरह की दुनिया खुलती है, उसमें सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के भाव हैं। यहीं पर अभिभावक, शिक्षकों और बाल साहित्य के रचनाकारों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

बच्चे अगर अच्छा बाल साहित्य पढ़ते हैं तो उनका मनोरंजन ही नहीं होता, बल्कि इससे उनके शारीरिक व मानसिक विकास में भी सहायता मिलती है। कोर्स की किताबें पढ़ने से बच्चों का बाह्य विकास होता है परन्तु अच्छा बाल साहित्य पढ़ने से उनका आंतरिक विकास होता है। बालकों को नर से नारायण बनाने में बालसाहित्य की प्रमुख भूमिका रहती है। विश्व में बाल साहित्य नए नए विषयों के साथ आ रहा है। समय आ गया है कि बच्चों की कहानियां बदली जाएं। नई कहानियां बनाई जाए, सुनाई जाए औ? खोजी जाए – ताकि हमारे बच्चे तेजी से बदलती दुनिया की नई जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हो सकें। वर्तमान परिवेश में श्रेष्ठ और उपयोगी बाल साहित्य की पहचान भी आवश्यक हैं।

बालसाहित्य से आशय बच्चों के लिए लिखा जाने वाला, बाल मनोविज्ञान की समझ के साथ बालमन की अभिव्यक्ति करने वाला साहित्य है। बाल साहित्य वही कहा जाएगा, जिसमें बालकों के कोमल मन के साथ-साथ उनके परिवेश की यथार्थ अभिव्यक्ति हुई हो। जिसे बालक सहज रूप से पसंद करे। बाल साहित्य के महत्व को लेकर दुनियाभर के विद्वानों ने इतना कुछ कहा और लिखा है, अगर उसी को याद करने लगें तो और कुछ कहने सुनने का समय ही नहीं बचेगा।

सबका सार यही है कि बाल साहित्य हमारी अमूल्य निधि हैं और उसे पढ़कर तथा संजोकर ही हमारी आनेवाली पीढ़ी समृद्ध बन सकेगी। बालसाहित्य के सृजन, सरोकार एवं लेखकीय जिम्मेदारी पर भी रचनाकारों को नए तरीकों से विचार करना होगा। बालसाहित्य पर देश की भावी पीढ़ी का भविष्य अवलम्बित है। बाल साहित्य सृजन जिम्मेदारी भरा कार्य है।

सबसे पहली आवश्यकता पठन-पाठन की परंपरा को एक आंदोलन के रूप में पुनर्जिवित करने की है। नई पुस्तकें पढ़ने के लिए बच्चों को प्रेरित व पुरस्कृत किया जाए। वहीं अच्छे लेखकों, इस क्षेत्र में नि:स्वार्थ भाव से कार्य करने वाले व्यक्तियों, संस्थाओं को सम्मानित किया जाए।

बालसाहित्य के रूप में संजोए गए शिशु गीत, लोरियों, बालगीत, कविता, कहानियां, नाटक, संस्मरण, यात्रा वृतांत, लोक कथाएं रूपी अमूल्य धरोहर काल कवलित न हो जाए। आने वाली पीढ़ी के हाथों यह संपदा हमें सुरक्षित सौंपनी है?


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