Tuesday, March 17, 2026
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बच्चे में विनोद प्रियता जगाएं

BALWANI


त उषा जैन ‘शीरीं’ |

जीवन के प्रति कोरा यथार्थवादी दृष्टिकोण जीवन को बोझिल, नीरस, ऊबाऊ और बेमजा बना देता है। छोटी-छोटी बातों की बारीकियों की छानबीन में ऐसे लोग अपना अमूल्य समय गंवा देते हैं। वे स्वयं तो बोर होते ही हैं, दूसरों को भी लपेट लेते हैं। बच्चे को इस मानसिक बीमारी से बचाएं। एक अहम बात जो हम सब को कभी नहीं भूलनी चाहिए वह यह है कि अपने पर हंसना सबसे बढ़िया होता है। बच्चे को विनोदप्रिय होना सिखायें लेकिन दूसरों की हंसी उड़ाना कदापि नहीं। इससे बच्चे को बचाए रखें क्योंकि यह नैतिक पतन की ओर ले जाता है।

जीवन में अगर हंसना मुस्कुराना न होता तो सोचिए जीवन कितना ऊबाऊ होता। इंसान महज रोबोट की तरह ही जीता और बगैर जिन्दगी को शिद्दत से जिए एक दिन संसार से कूच कर जाता। हंसने से उम्र बढ़ती है, ऐसा माना जाता है। चिंता तो चिता समान है। चिंतित रहकर किसी भी समस्या का समाधान नहीं मिलता। कई लोग स्वभाव से ही विनोदी होते हैं, कई हमेशा तनावग्रस्त रहते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या यह महज जीन्स का परिणाम है? लेकिन प्रकृति की कमी को इंसान अपनी सूझ-बूझ से जितना संभव हो, दूर कर सकता है। इसकी शुरूआत बचपन से ही होनी चाहिए। बच्चे के चिड़चिड़े होने के कई कारण हो सकते हैं। उनमें से मां बाप की उसके प्रति लापरवाही ही मुख्य कारण है।

बच्चे में विनोदप्रियता जगाने से पहले आपको स्वयं अपने को देखना है। आप में भी यह गुण भरपूर है या नहीं। नहीं है तो स्वयं को सुधारें। बच्चे को लाड़ दुलार करने में कभी कंजूसी न बरतें। प्यार सिर्फ अहसान ही नहीं होना चाहिए। उसे उजागर भी करें। बच्चे को उछाल, उसे बांहों में, पैरों पर झूला-झुला, गुदगुदी कर उसे भरपूर हंसायें। उसी की तोतली भाषा में बात करने में हर्ज नहीं। इससे बच्चे के साथ ह्यरेपोह्य बनाने में मदद मिलती है।

प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती। प्रशंसा की भूख बालक को भी होती है। शाबाशी देने पर देखेंगे उसके चेहरे पर कैसी चमक आ जाती है। आपका प्रोत्साहन बच्चे में आत्मविश्वास जगाता है। बच्चे की उसके दोस्तों से कभी तुलना न करें। ‘निटू को देखो, कितना होशियार है। एक तुम हो, कभी अच्छे नंबर लाते ही नहीं।’ या ‘गुप्ता जी का अरूण देखो हमेशा खेलकूद में प्राइज लेकर आता है। तुम तो हर काम में पीछे ही रहते हो।’ इस तरह की नकारात्मक बातों व आलोचनाओं से बच्चे में हीन भावना पनपने लगती है। फिर वह हंसना बोलना भूल उदासी से घिर जाता है। अपने पर से मानो उसका विश्वास ही उठने लगता है।

बच्चों को मामूली सी असफलता पर घुडकें डांटें नहीं बल्कि प्यार से समझाएं कि अगर वह थोड़ी मेहनत और करता तो उसका परिणाम कितना सुखद होता। आप अपनी हैसियत के मुताबिक इनाम का वादा भी बच्चे से इन्सेंटिव के रूप में कर सकते हैं। बच्चे का मन जीतना कोई मुश्किल काम नहीं है। इसमें बच्चे के साथ आपका भी उतना ही फायदा है। बच्चे पर रौब छांटने की गलती कभी न करें। उसका अहम् संतुष्ट हो, इसका ध्यान लगातार रखें। याद रखिए, बच्चे में भी अहम् बड़ों से कम नहीं होता।

दो बच्चों की मारपीट, गुत्थमगुत्था को स्वाभाविक रूप से लें। उस पर आपा न खोकर मजाकिया टोन में ही बात कर उन्हें छुड़वाएं। भई राजू सन्नी, तुम फाइटिंग तो बढ़िया कर लेते हो लेकिन देखो किसी की हड्डी पसली न सरक जाए। आओ हम मी लॉर्ड बनकर तुम लोगों का फैसला कर देते हैं। यूं लड़ाई ड्रामे में बदल गई। बच्चे का ध्यान परिवर्तन हो गया।
आपकी कल्पना शक्ति का यह जादू था कि बच्चे में जगा जानवर आपने किस खूबी से पालतू बना लिया। ठीक यही शक्ति आपने बच्चे में भी विकसित करनी है। जीवन के प्रति कोरा यथार्थवादी दृष्टिकोण जीवन को बोझिल, नीरस, ऊबाऊ और बेमजा बना देता है। छोटी-छोटी बातों की बारीकियों की छानबीन में ऐसे लोग अपना अमूल्य समय गंवा देते हैं। वे स्वयं तो बोर होते ही हैं, दूसरों को भी लपेट लेते हैं। बच्चे को इस मानसिक बीमारी से बचाएं।

एक अहम बात जो हम सब को कभी नहीं भूलनी चाहिए वह यह है कि अपने पर हंसना सबसे बढ़िया होता है। बच्चे को विनोदप्रिय होना सिखायें लेकिन दूसरों की हंसी उड़ाना कदापि नहीं। इससे बच्चे को बचाए रखें क्योंकि यह नैतिक पतन की ओर ले जाता है।


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