एक विशेष संवाददाता के अनुसार दुनिया के तमाम संगठनों को पीछे छोड़ते हुए हाल ही में एक ऐतिहासिक आयोजन हुआ। जगह का खुलासा सुरक्षा कारणों से नहीं किया गया। कहा जा रहा है कि मीटिंग एक पुराने रेलवे डिब्बे में हुई थी। यह था ‘अंतरराष्ट्रीय जेब कतरा संगठन’ का वार्षिक महासम्मेलन! कार्यक्रम की शुरुआत अध्यक्ष ‘जॉली पिकपॉकेट’ ने अपने दोनों हाथ जेबों में डालकर की। उन्होंने भावुक स्वर में कहा- भाइयो और बहनो! हमारा पुश्तैनी धंधा खतरे में है। पहले हम जेब काटते थे तो हमें कलाकार समझा जाता था। अब सब हमें अपराधी कहते हैं। अपराधी तो वे हैं जो करोड़ों का घोटाला करते हैं और उद्घाटन समारोहों में रिबन काटते घूमते हैं। हम बेचारे तो बस जेब काटते हैं। तालियों की गड़गड़ाहट इतनी तेज थी कि पास से गुजरती पुलिस जीप को शक हो गया। तब आयोजकों ने तुरंत नारा लगाया- पकड़ में न आएगा, जेब कतरा जीत जाएगा।
दिल्ली चैप्टर के सचिव ने रोते हुए कहा-आजकल किसकी जेब काटें? सबके पास गूगल पे और फोन पे है। जेब में नकदी होती ही नहीं। हम तो अब खाली नोटिफिकेशन काटने का अभ्यास कर रहे हैं। टोक्यो से आए प्रतिनिधि ने जोड़ा- यहां तक कि बच्चों की पैंट पर भी चैन और बटन लगे हैं। जेब तक पहुंचने से पहले ही पूरा सिर फंस जाता है। न्यूयॉर्क वाले कतरज्ञ ने सबसे बड़ा संकट बताया-सब जगह सीसीटीवी। अब तो जेब काटने से पहले खुद की शक्ल न्यूज चैनल पर दिखने लगती है। मुंबई चैप्टर के प्रवक्ता ने तड़पते स्वर में कहा-हमारी रोजी-रोटी छीनने वाले असली कतरक हैं अफसर और नेता! हम दस-बीस काटते हैं तो जेल। वे अरबों काटते हैं तो जेल की जगह चुनावी रैलियां काटते हैं। हमें पुलिस पकड़ती है, उन्हें सिक्योरिटी गार्ड सलाम करते हैं। यह खुला भेदभाव है।
संगठन के महासचिव ने मांगे रखीं-जेब कतरों को राष्ट्रीय धरोहर कलाकार घोषित किया जाए। बेरोजगारी भत्ता मिलते ही हम सरकार की जेब काटना बंद कर देंगे। मोबाइल वॉलेट और आॅनलाइन लेन-देन पर ‘जेब कतरा टैक्स’ लगाया जाए। संपूर्ण सभा ने खड़े होकर ‘कट गया, कट गया! उसका जेब कट गया!’ के नारे के बीच यह प्रस्ताव पारित किया। अचानक बिजली चली गई। अंधेरे में कुछ सेकंड खामोशी रही। रोशनी आई तो अध्यक्ष की जेब से पर्स गायब। अध्यक्ष मुस्कुराए- वाह! अब भी बिरादरी जिंदा है। यही है असली फील्ड ट्रेनिंग। पीछे से किसी ने ठहाका लगाया- साहब! पर्स तो शायद कोई अफसर उठा ले गया होगा और मोबाइल नेता जी!
सभा का अंत राष्ट्रीय नारे से हुआ- जेब उनकी, कला हमारी, अफसर-नेता दूर हटाओ! बाहर निकलते ही कुछ जेब कतरे पुलिस के हत्थे चढ़ गए। पूछताछ में उन्होंने कहा- हम तो बस अपने संगठन की खबर अखबार में छपवाने के लिए आए थे। स्वयं जेबकतरे ने पुलिस के हाथों जेब कटाई तब उसकी पुलिस से जान छूटी।

