
तकनीक से लैस डिजिटल दौर में समाज, संस्कृति, सरोकार और मानवीयता के सच को साहित्य के दर्पण में तलाशना-तराशना अब सहज-सरल नहीं रहा।।।। जबकि इंटरनेट नेटवर्क से हमें अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचना आसान हो गया है। सूचना तकनीक के माध्यम से लोगों के साथ घुलने-मिलने और जुड़ने-जोड़ने के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं का सोशल मीडिया नेटवर्क एक विशेष उपलब्धि की तरह है। उसमें पन्ने फड़फड़ाने की आवाज की जगह सरकती उंगलियां से पढ़ने-समझने का ऐहसास बिल्कुल अलग होता है। उसकी रोशनी चेहरे को हमेशा चमकाए रहती है, जबकि चेहरा पठनीयता के साथ स्वत: चमकने की कोशिश करता ही रह जाता है। यानी दिमाग में खालीपन बना रहता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि वह पाठक वर्ग विचारों के आदान-प्रदान की सहजता के बावजूद अपनी वैचारिक घुलनशीलता से संतुष्ट नहीं हो पाता है। उसे अपनी प्रबुद्धता में खलल की भी अनुभूति होती है…और फिर वह समाज से जुड़ने से वंचित रह जाता हैं।
दूसरी तरफ सोशल मीडिया नेटवर्क में शब्दों का बना हुआ निर्वाधित बहाव है, नई धारा की वैचारिक सोच में विविधताएं हैं। नए संबंधों को तलाशने की ललक है। तथ्यों के प्रति नया नजरया है। नई सोच की हिम्मत है। ताजगी भी है…यहां तक कि उसमें एक सहज गति के साथ-साथ भाषाओं का मिटा अंतर भी है। हिंदी को मिला यूनिकोड के तकनीक का साथ और वैश्विक विस्तार है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि साहित्य आज के दौर की सामाजिक संवेदनशीलता से उफनते ‘इंटरनेट सोशल मीडिया नेटवर्क’ में एक मजबूत जगह क्यों नहीं बना पा रहा है? साहित्य धुंधला हो गया है या फिर सामाजिक विसंगतियां का कोहरा ही घना हो गया है? विविधताओं से भरे राष्ट्र समाज, रहन-सहन और रिवाज की मौजूदा हालात को समझने में कहां चूक हो रही है? इसी के साथ-साथ यह सवाल भी बार-बार कौंध जाता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं?
वह साहित्य, जो इनदिनों डिजिटल बनकर तैर रहा है, या फिर साहित्यकारों की टुकड़ों में बंटीं तथाकथित मठाधीश साहित्यकारों का अहं और साहुकार बने बैठी टिप्पणीकारों की टोलियां ही इसका जिम्मेदार है?
एक पहलू यह भी है कि आज के समय में हमारा साहित्य न तो रचनाशीलता को सही तरह से पाठकों के सामने रख पा रहा है और न ही साहित्यकार सोशल नेटवर्किंग साइट्स के लोकतंत्रिकरण का सही इस्तेमाल कर पा रहे हैं। जबकि साहित्य की चर्चा खूब हो रही हैं।
साहित्योत्सव मनाए जा रहे हैं। जितने बड़े प्रकाशन समूह का आयोजन उतनी बड़ी तादात में युवाओं की चौंकाने वाली उमड़ी भीड़।।। पुस्तकों के प्रकाशन में भी बढ़ोत्तरी हुई है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर किताबों के मेले लगाए जा रहे हैं। और तो और, साहित्य की विधाओं में प्रयोग भी किए जा रहे हैं। बावजूद इसके सोशल मीडिया नेटवर्क से बने हुए बेडौल साहित्यिक माहौल के कई रंग देखे जा सकते हैं, जो वाट्सएप ग्रुप, फेसबुक लाइव, जूम या मीट गाष्ठियों, काव्य और कहानी पाठों के रूप में दिखे जाते हैं।
गद्य और पद्य की विभिन्न विधाओं में कहानियां, उपन्यास, गीत-गजल आदि के अधिकतर रचनाकार और रचनाओं में समाज से जुड़ाव की कमी साफ तौर पर नजर आती है। रचना का दृष्टिकोण सकारात्मक न होकर उलझाव लिए हुए होता है। समाज की वास्तविक तस्वीर और सच प्रस्तुत करने के नाम पर उस के निष्कर्ष तक शायद ही कोई साहित्यकार पहुंच पाते हैं। जबकि सामयिकता लिए विषयों, मुद्दों और सामाजिक चेतना-संरचना समेत शिक्षा की जमीन का व्यापक विस्तार हुआ है। यहां तक कि अंग्रेजी के साहित्यकार भी हिंदी में आपनी पहचान तलाशने को लालायित रहते हैं। कमी है तो सिर्फ यह कि रचनाओं से अधिक रचनाकारों की चर्चा होने लगी है। रचना की टिप्पणियां रचनाकार के नजरिए से की जाने लगी है।
उस बारे में समीक्षात्मक वक्तव्य साहित्यकारों की पसंद होने का दबाव बना है। अधिकतर साहित्यकारों ने अपनी उम्र को ही रचनाशीलता, श्रेष्ठता और सर्वश्रष्ठता का पैमान मान लिया है। वह अहं यानी इगो के मनोविज्ञान से ग्रसित हो चुके हैं। वे नए रचनाकारों के साथ तालमेल बिठाना तो दूर उनके साथ मंच की साझेदारी और छपने के दरम्यान क्रम पर भी पैनी नजर रखते हैं। एक साहित्यकार ही दूसरे साहित्यकार को छोटा-बड़ा या घटिया, चिरकुट आदि से संबोधित कर उनकी रचनाशीलता पर सवाल उठा देते हैं। साथ ही साहित्यकारों ने खुद को फास्सिट, वामपंथ, समाजवाद, सेक्युलरवादी, जनतांत्रिक, प्रगतिशील आदि…आदि खांचे में डाल लिया है।
यह गंभीर विषय भी बन चुका है कि सोशल साइटों के पेज या वॉल पर लिखी जानी वाली रचनाएं और कागज के पन्नों पर दर्ज साहित्य में किसे प्रभावशाली और स्थायित्व का समझा जाए? यह फर्क ठीक वैसा ही है, जैसे लुप्त होने के कागार पर रॉयल ब्लू स्याही से हस्तलिखित कृति और काले अक्षरों वाले छपे सुंदर दिखने वाले फोंट के साथ किताब के पन्ने…इन दोनों में पाठकों की पठनीयता की अनुभूतियां भिन्न होती हैं। एक में रचना आत्मीयता की भीनी-भीनी खुशबू की तरह पाठक के मन-मस्तिष्क में समा जाती है, जबकि दूसरा ‘बाद में पढ़ लेंगे’ या स्क्राल की तरह चुपके से सरकाने का भाव मन में स्वत: आ जाता है। उस के बाद उसे दोबारा ढूंढ निकालना मुश्किल काम होता है। यानी कि कृत्रिमता और नैसर्गिकता के फर्क का अनुभव अलग-अलग भाव के मनोविज्ञान के साथ जब जागृत हो जाता है तब उन्हें सहेजने-संभालने की चाहत भी बदल जाती है।


