Thursday, October 15, 2026
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टैक्स सीमा का चरम आ चुका

SAMVAD


31 40आगामी एक फरवरी को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण राजग सरकार की दूसरी पारी का आखिरी पूर्ण बजट प्रस्तुत करेंगी। भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले काफी समय से स्टैगफ्लेशन के दौर से गुजर रही है। महंगाई और बेरोजगारी एक साथ बढ़ रही हैं। रिजर्व बैंक अपनी पॉलिसी दरों में परिवर्तन कर महंगाई पर नियंत्रण पाने की लगातार कोशिश में लगा है। अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत लोग एवं रोजगार की तलाश में भारी संख्या में युवा वर्ग वित्तमंत्री से मंदी के जख्मों पर मरहम लगाने की आस लगाए हुए हैं। जीएसटी के आंकड़ों को देखें तो लगता है कि मांग लगातार बढ़ रही है। यदि मांग बढ़ रही है तो फिर स्टैगफ्लेशन कैसे अपनी जड़ें जमाए हुए है? यानी अर्थव्यवस्था में मांग में कमी के साथ कीमतें बढ़ रही हैं। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी नहीं मानी जाती। सामान्य परिस्थितियों में मांग कम होने से कीमतें भी कम होनी चाहिएं, क्योंकि मांग कारण है, परिणाम नहीं।

आंकड़ों के अनुसार भारत के उपभोक्ता बाजार में उत्पादन में कमी आई है। एक अनुमान के अनुसार अप्रैल 2022 से अक्टूबर , 2022 के बीच कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में 6.6 परसेंट की कमी देखने को मिली है। दूसरी तरफ जीएसटी का संग्रह बढ़ रहा है। इसका अर्थ है कि जीएसटी संग्रह में वृद्धि महंगाई बढ़ने की वजह से हो रही है न कि मांग में वृद्धि के कारण। कुछ आवश्यक वस्तुओं जैसे-सब्सिडाइज्ड फर्टिलाइजर, मोबाइल, टूथपेस्ट आदि की महंगाई का उनकी मांग पर कोई असर नहीं होता है। स्टैगफ्लेशन की रौशनी में बजट का गणित बहुत पेचीदा होगा।

वर्ष 2021 में केंद्र सरकार का घाटा 5 दशक के सर्वोच्च स्तर पर था। आगामी बजट का नरेटिव रिफॉर्म पर आधारित होना चाहिए। राजकोषीय प्रबंधन को अनुशासित करने के लिए सरकार को आम लोगों के ऊपर अतिरिक्त बोझ डाले बिना अपनी आय में वृद्धि करने एवं अनुत्पादक व्यय पर लगाम कसने के उपाय खोजने के प्रयास करने होंगे। पूंजीगत व्यय को समर्थन देकर सार्वजनिक व्यय की उत्पादकता बढ़ाने पर बजट में फोकस होना चाहिए। टैक्स और घरेलू बचत दो ऐसे उपाय हैं जिन पर सरकार के व्यय का आकार निर्भर करता है। आम लोगों पर टैक्स लगाने की सीमा का चरम आ चुका है। आम लोगों को अधिकतम टैक्स लगाकर निचोड़ सा लिया है। भारत में टैक्स किसी भी तरह से कम नहीं हैं।

सरकार पहले कमाई पर टैक्स, फिर खपत पर टैक्स, और यदि खपत के बाद कुछ बच जाए तो फिर बचत पर टैक्स। यानी हर कोने से सरकार टैक्स लगा रही है। जो कुछ बचे हुए हिस्से थे, जैसे- यूलिप, प्रोविडेंट फंड आदि, उन पर भी टैक्स लगा दिए। नतीजतन सरकार अपनी कमाई के 100 रुपये में 53 रुपए टैक्स से ले रही है। यहां एक बात जरूर ध्यान में रखनी है कि टैक्स का मतलब केवल इनकम टैक्स ही नहीं है। देश का गरीब से गरीब व्यक्ति भी अप्रत्यक्ष रूप में टैक्स का भुगतान करता है। कुल घरेलू बचत का लगभग 50-55 प्रतिशत सरकार कर्ज के रूप में ले लेती है।

भारत में वित्तीय बचत, जिनका 51 प्रतिशत बैंक जमा से, 19 प्रतिशत बीमा से, 13 प्रतिशत छोटी बचतों से, 14 प्रतिशत शेयर और म्यूचुअल फंड से और शेष 3 प्रतिशत अन्य छोटी बचतों से आता है, का उपयोग सरकार अपना घाटा पूरा करने में करती है। भारत में कुल 100 रुपए की वित्तीय बचतों में से 51 रुपए सरकार अपना घाटा पूरा करने में लगा रही है। लगभग 200 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था (जीडीपी) में 38-40 लाख करोड़ रुपए का घाटा केंद्र और राज्य सरकारों का है।

इतना तो केंद्र सरकार के कुल बजट का आकार भी नहीं है। आने वाले समय में सरकार अपना घाटा पूरा करने के लिए बहुत सारी ऐसी चीजों की कीमतें बढ़ाएगी जैसे-टोल व बिजली की दरें, भूमि पंजीकरण शुल्क, विकास के नाम पर नए सेस, आदि।

निवेश और रोजगार, विकास के दो बड़े इंजन हैं। लेकिन सरकार के इतने विराट बजट, जो आम लोगों से टैक्स लगाकर एवं उनकी बचत लेकर बनता है, में से निवेश और रोजगार में योगदान नाम मात्र का रहता है। अर्थव्यवस्था में जितनी पूंजी की आवश्यकता है उसका मात्र 5 प्रतिशत सरकार के बजट से पूंजीगत व्यय के रूप में खर्च होता है। कुल रोजगार का मात्र 5 प्रतिशत सरकार से मिलता है। सरकारी उपक्रमों की यदि बात करें तो सरकारों की कार्य प्रणाली ने उनमें से अधिकांश को इस हाल में पहुंचा कर रख दिया है कि अब उनमें विनिवेश के अतिरिक्त कोई अन्य लाभदायक विकल्प नहीं रहा।

अधिकांश सरकारी कंपनियों में सरकार, जो हमारी बचतों का व्यय करती है, उससे इतना भी रिटर्न नहीं मिल पाता कि यदि वही पैसा हम बैंक में जमा करा दें तो उससे मिलने वाला रिटर्न/ब्याज भी उससे ज्यादा होगा। इसलिए इन सरकारी कंपनियों को बेचने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है। इन्हें बेचने से सरकार को रिसोर्स ही नहीं मिलते बल्कि उनमें निवेश होने वाली पूंजी की भी बचत होती है, क्योंकि सरकार को उन कंपनियों को चलाने के लिए भी पूंजी लगानी पड़ती है।

विनिवेश हमारी सरकारों के बजट का एक स्थायी अंग बन चुका है। इसके अलावा सरकारों के पास संसाधन जुटाने का कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। टैक्स पहले ही अपनी चरम सीमा को लांघ चुके हैं। मंदी के इस दौर में यदि और अधिक टैक्स लगाएंगे तो परिस्थितियां और अधिक विकट होकर हाथ से निकल जाएंगी। दूसरी तरफ मंदी के इस दौर में बचत भी आप कितनी बढ़ा सकते हैं, जब आय ही 20 से 25 प्रतिशत तक कम हो गई है।

ये दोनों सच सरकार को स्वीकार हो गए हैं। सरकारी सेल की सरकार के पास आपात स्थिति है। इसके अतिरिक्त संसाधन जुटाने का कोई विकल्प ही नहीं बचा है। लेकिन हर वर्ष सरकार अपने विनिवेश लक्ष्य को हासिल करने से चूक जाती है। आने वाले बजट में भी सरकार अतिरिक्त संसाधन जुटाने के लिए विनिवेश के नए लक्ष्य लेकर आएगी।
सरकारों (केंद्र और राज्य) के ऊपर अनुत्पादक सार्वजानिक व्यय (जैसे सरकारी विज्ञापन, सरकारी अमले की मेंटेनेंस आदि) को कम करने का दबाव समाज की तरफ से भी होना चाहिए।

अगर सरकारों के ऊपर सार्वजानिक व्यय को कम करने का दबाव नहीं बनाएंगे तो आने वाले समय में सरकारें, सरकारी परिसंपत्तियों को बेचकर प्राप्त आय को भी खर्च कर देंगी। सरकारी व्यवस्था एक डायनासोर की तरह है। कोई भी व्यवस्था जब तक आत्म निर्भर नहीं हो सकती जब तक कि अपनी स्वयं की जमीन मजबूत न हो। इतने बड़े राजकोषीय घाटे के साथ सरकार के आत्मनिर्भरता के नए मतलब के कोई मायने नहीं हैं।


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